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Bhagavad Gita Chapter 2

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Bhagavad Gita chapter 2

 

 

 

सांख्ययोग ~ अध्याय दो

 

01-10 अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद

11-30 गीताशास्त्रका अवतरण

31-38 क्षत्रिय धर्म और युद्ध करने की आवश्यकता का वर्णन

39-53 कर्मयोग विषय का उपदेश

54-72 स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा

 

 

 

Bhagavad Gita Chapter 2
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अथ द्वितीयोऽध्यायः ~ सांख्ययोग

 

01-10 अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद

 

संजय उवाच

तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।

विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥2.1॥

 

संजयः उवाच;-संजय ने कहा; तम्-उसे, अर्जुन को; कृपया-करुणा के साथ; आविष्टम–अभिभूत; अश्रु-पूर्ण-आसुओं से भरे; आकुल-निराश; ईक्षणम्-नेत्र; विषीदन्तम्-शोकाकुल; इदम्-ये; वाक्यम्-शब्द; उवाच-कहा;

 

संजय ने कहा-करुणा से अभिभूत, मन से शोकाकुल और अश्रुओं से भरे नेत्रों वाले अर्जुन को देख कर श्रीकृष्ण ने निम्नवर्णित शब्द कहे।।2.1।।

 

श्रीभगवानुवाच।

कुतस्तवा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥2.2॥

 

श्रीभगवान् उवाच-परमात्मा श्रीकृष्ण ने कहा; कुत:-कहाँ से; त्वा-तुमको; कश्मलम् मोह -अज्ञान; इदम्-यह; विषमे – इस संकटकाल में; समुपस्थितम्-उत्पन्न हुआ; अनार्य-अशिष्ट जन; जुष्टम् -आचरण योग्य; अस्वर्ग्यम -उच्च लोकों की ओर न ले जाने वाला; अकीर्तिकरम्-अपयश का कारण; अर्जुन-अर्जुन।

 

परमात्मा श्रीकृष्ण ने कहाः मेरे प्रिय अर्जुन! इस संकट की घड़ी में तुम्हारे भीतर यह विमोह कैसे उत्पन्न हुआ? यह सम्माननीय लोगों के अनुकूल नहीं है। इससे उच्च लोकों की प्राप्ति नहीं होती अपितु अपयश प्राप्त होता है।।2.2।।

 

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥2.3॥

 

क्लैब्यम्-नपुंसकता; मा-स्म-न करना; गमः-प्राप्त हो; पार्थ-पृथापुत्र अर्जुन; न – कभी नहीं; एतत्-यह; त्वयि- तुमको; उपपद्यते-उपयुक्त; क्षुद्रम्-दया; हृदय-हृदय की; दौर्बल्यम्-दुर्बलता; त्यक्त्वा-त्याग कर; उत्तिष्ठ – खड़ा हो; परम् तप-शत्रुओं का दमनकर्ता।

 

हे पार्थ! अपने भीतर इस प्रकार की नपुंसकता का भाव लाना तुम्हें शोभा नहीं देता। हे शत्रु विजेता! हृदय की तुच्छ दुर्बलता का त्याग करो और युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।।2.3।।

 

अर्जुन उवाच।

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।

इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥2.4॥

 

अर्जुन उवाच-अर्जुन ने कहा; कथम् – कैसे; भीष्मम्-भीष्म को; अहम् – मे; संख्ये-युद्ध मे; द्रोणम्-द्रोणाचार्य को; च-और; मधुसूदन-मधु राक्षस के दमनकर्ता, श्रीकृष्ण; इषुभिः-वाणों से; प्रतियोत्स्यामि -प्रहार करूँगा; पूजा अहौ-पूजनीय; अरिसूदन-शत्रुओं के दमनकर्ता! ।

 

अर्जुन ने कहा-हे मधुसूदन! हे शत्रुओं के दमनकर्ता! मैं युद्धभूमि में कैसे भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे महापुरुषों पर बाण चला सकता हूँ जो मेरे लिए परम पूजनीय है।। 2.4 ।।

 

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।

हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥2.5॥

 

गुरून्–शिक्षक; अहत्वा-न मारना; हि-निःसंदेह; महा अनुभावान्-आदरणीय वयोवृद्ध को; श्रेयः-उत्तम; भोक्तुम्-जीवन का सुख भोगना; भैक्ष्यम्-भीख माँगकर; अपि-भी; इह-इस जीवन में; लोके-इस संसार में; हत्वा-वध कर; अर्थ-लाभ; कामान्–इच्छा से; तु–लेकिन; गुरून्-आदरणीय वयोवृद्ध; इह-इस संसार में; एव–निश्चय ही; भुञ्जीय-भोगना; भोगान्-सुख; रूधिर-रक्त से; प्रदिग्धान्-रंजित।

 

ऐसे आदरणीय महापुरुष जो मेरे गुरुजन हैं, को मारकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा तो भीख मांगकर इस संसार में जीवन निर्वाह करना अधिक श्रेयस्कर है। यदि हम उन्हें मारते हैं तो उसके परिणामस्वरूप हम जिस सम्पत्ति और सुखों का भोग करेंगे वे रक्तरंजित होंगे।। 2.5 ।।

 

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।

यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥2.6॥

 

न–नहीं; च-और; एतत्-यह; विद्यः-हम जानते हैं; कतरत्-जो; न:-हमारे लिए; गरीयः-श्रेयस्कर; यत्वा-क्या; जयेम-वे विजयी हो; यदि- यदि; वा-या; न:-हमें; जयेयुः-विजयी हो; यान्-जिनको; एव-निश्चय ही; हत्वा – मारने के बाद; न – कभी नहीं; जिजीविषामः-हम जीवित रहना चाहेंगे; ते – वे सब; अवस्थिताः-खड़े हैं; प्रमुखे-हमारे सामने; धार्तराष्ट्राः-धृतराष्ट्र के पुत्र।

 

हम यह भी नहीं जानते कि इस युद्ध का परिणाम हमारे लिए किस प्रकार से श्रेयस्कर होगा। उन पर विजय पाकर या उनसे पराजित होकर। यद्यपि उन्होंने धृतराष्ट्र का पक्ष लिया है और अब वे युद्धभूमि में हमारे सम्मुख खड़े हैं तथापि उनको मारकर हमारी जीवित रहने की कोई इच्छा नहीं होगी।।2.6।।

 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।

यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥2.7॥

 

कार्पण्य-दोष-कायरता का दोष; उपहत-ग्रस्त; स्वभावः-प्रकृति, पृच्छामि – मैं पूछ रहा हूँ; त्वाम्-तुमसे; धर्म-कर्त्तव्य; सम्मूढ-व्याकुल; चेताः-हृदय में; यत्-जो; श्रेयः-श्रेष्ठ; स्यात्-हो; निश्चितम्- निश्चयपूर्वक; ब्रूहि-कहो; तत्-वह; मे-मुझको; शिष्यः-शिष्य; ते- तुम्हारा; अहम्-मैं; शाधि-कृपया उपदेश दीजिये; माम्-मुझको; त्वाम्-तुम्हारा; प्रपन्नम् शरणागत।

 

इसलिए कायरता रूप दोष से ग्रस्त हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए॥2.7॥

 

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌ ।

अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌ ॥2.8॥

 

न–नहीं; हि-निश्चय ही; प्रपश्यामि – मैं देखता हूँ; मम–मेरा; अपनुद्यात्-दूर कर सके; यत्-जो; शोकम्-शोक; उच्छोषणम्-सुखाने वाला; इन्द्रियाणाम्-इन्द्रियों को; अवाप्य-प्राप्त करके; भूमौ–पृथ्वी पर; असपत्नम्-शत्रुविहीन; ऋद्धम्-समृद्ध; राज्यम्-राज्य; सुराणाम् -स्वर्ग के देवताओं जैसा; अपि-चाहे; च-भी; आधिपत्यम्-प्रभुत्व।

 

मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं सूझता जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके। यदि मैं धन सम्पदा से भरपूर इस पृथ्वी पर निष्कंटक राज्य प्राप्त कर लेता हूँ या देवताओं जैसा प्रभुत्व प्राप्त कर लेता हूँ तब भी मैं इस शोक को दूर करने में समर्थ नहीं हो पाऊँगा।।2.8।।

 

सञ्जय उवाच।

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।

न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥2.9॥

 

सञ्जयः उवाच-संजय ने कहा; एवम्-इस प्रकार; उक्त्वा -कहकर; हृषीकेशम्-कृष्ण से, जो मन और इन्द्रियों के स्वामी हैं; गुडाकेश:-निद्रा को वश में करने वाला, अर्जुन; परन्तपः-शत्रुओं का दमन करने वाला, अर्जुन; न योस्ये-मैं नहीं लडूंगा; इति-इस प्रकार; गोविन्दम्-इन्द्रियों को सुख देने वाले, कृष्ण; उक्तवा-कहकर; तृष्णीम्-चुप; बभूव – हो गया; ह-वह हो गया;।

 

संजय ने कहा-ऐसा कहने के पश्चात ‘गुडाकेश’ निद्रा को जीतने वाले ,शत्रुओं का दमन करने वाला अर्जुन, ‘हृषीकेश’ कृष्ण से बोला, हे गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा और शांत हो गया।।2.9।।

 

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।

सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥2.10॥

 

तम्-उससे; उवाच-कहा; हृषीकेश:-मन और इन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण; प्रहसन-हँसते हुए; इव-मानो; भारत-भरतवंशी धृतराष्ट्र; सेनयोः-सेनाओं के; उभयो:-दोनों की; मध्ये–बीच में; विषीदन्तम्-शोकमग्न; इदम्- यह; वचः-शब्द।

 

हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले॥२.10॥

 

11-30 गीताशास्त्रका अवतरण

 

श्री भगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥2.11॥

 

श्रीभगवान् उवाच-परमप्रभु ने कहा; अशोच्यान्–जो शोक के पात्र नहीं हैं; अन्वशोच:-शोक करते हो; त्वम्-तुम; प्रज्ञावादान्-बुद्धिमता के वचन; च-भी; भाष से-कहते हो; गता असून-मरे हुए; अगता असून-जीवित; च-भी; न कभी नहीं; अनुशोचन्ति-शोक करते हैं; पण्डिताः-बुद्धिमान लोग।

 

श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते॥२.11॥

 

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।

न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥2.12॥

 

न-नहीं; तु-लेकिन; एव-निश्चय ही; अहम्-मे; जातु-किसी समय में; न-नहीं; आसम्-था; न-नहीं; त्वम्-तुम; न-नहीं; इमे-ये सब; जन-अधिपा:-राजागण; न – कभी नहीं; च-भी; एव-वास्तव में; न-नहीं; भविष्यामः-रहेंगे; सर्वेवयम्-हम सब; अतः-इसके; परम्-आगे।

 

न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे॥२.12॥

 

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥2.13॥

 

देहिनः-देहधारी की; अस्मिन्-इसमें; यथा-जैसे; देहै-शरीर में; कौमारम्-बाल्यावस्था; यौवनम्-यौवन; जरा-वृद्धावस्था; तथा -समान रूप से; देह-अन्तर-दूसरा शरीर; प्राप्तिः -प्राप्त होती है; धीर:-बुद्धिमान व्यक्ति; तत्र-इस संबंध मे; न-मुह्यति–मोहित नहीं होते।

 

जैसे देहधारी आत्मा इस शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था और वृद्धावस्था की ओर निरन्तर अग्रसर होती है, वैसे ही मृत्यु के समय आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है। बुद्धिमान मनुष्य ऐसे परिवर्तन से मोहित नहीं होते।।२.13।।

 

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥2.14॥

 

मात्रा-स्पर्श:-इन्द्रिय विषयों के साथ संपर्क; तु–वास्तव में; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन; शीत-जाड़ा; उष्ण-ग्रीष्म; सुख-सुख, दुःख-दुख; दाः-देने वाले; आगम-आना; अपायिनः-जाना; अनित्या:-क्षणिक; तान्–उनको; तितिक्षस्व-सहन करना; भारत-हे भरतवंशी।

 

हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रिय और उसके विषयों के संपर्क से उत्पन्न सुख तथा दुख का अनुभव क्षण भंगुर है। ये स्थायी न होकर सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने-जाने के समान हैं। हे भरतवंशी! मनुष्य को चाहिए कि वह विचलित हुए बिना उनको सहन करना सीखे।।२.14।।

 

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥2.15॥

 

यम्-जिस; हि-निश्चित रूप से; न- कभी नहीं; व्यथयन्ति–दुखी नहीं होते; एते -ये सब; पुरुषम्-मनुष्य को; पुरुष ऋषभ-पुरुषों में श्रेष्ठ, अर्जुन; सम-अपरिवर्तनीय; दुःख-दुख में; सुखम्- सुख में; धीरम्-धीर पुरुष; सः-वह पुरुष; अमृतत्वाय–मुक्ति के लिए; कल्पते-पात्र है

 

हे पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन! जो मनुष्य सुख तथा दुख में विचलित नहीं होता और इन दोनों परिस्थितियों में स्थिर रहता है, वह वास्तव मे मुक्ति का पात्र है।.२.15।।

 

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥2.16॥

 

न–नहीं; असतः-अस्थायी ; विद्यते-वहां है; भावः-सत्ता है; न -कभी नहीं; अभावः-अन्त; विद्यते-वहाँ है; सतः-शाश्वत का; अभयोः-दोनों का; अपि-भी; दृष्ट:-देखा गया; अन्तः-निष्कर्ष; तु–निस्सन्देह; अनयोः-इनका; तत्त्व-सत्य के; दर्शिभिः-तत्त्वदर्शियों द्वारा।

 

अनित्य शरीर का चिरस्थायित्व नहीं है और शाश्वत आत्मा का कभी अन्त नहीं होता है। तत्त्वदर्शियों द्वारा भी इन दोनों की प्रकृति के अध्ययन करने के पश्चात निकाले गए निष्कर्ष के आधार पर इस यथार्थ की पुष्टि की गई है।।२.16।।

 

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥2.17॥

 

अविनाशि-अनश्वर; तु–वास्तव में; तत्-उसे; विद्धि-जानो; येन-किसके द्वारा; सर्वम् -सम्पूर्ण; इदम्- यह; ततम्-व्याप्त; विनाशम्-नाश; अव्ययस्य-अविनाशी का; अस्य-इसके द्वारा; न कश्चित्-कोई नहीं; कर्तुम्-का कारण; अर्हति-समर्थ है।

 

जो पूरे शरीर में व्याप्त है, उसे ही तुम अविनाशी समझो। उस अनश्वर आत्मा को नष्ट करने मे कोई भी समर्थ नहीं है।

 

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।

अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥2.18॥

 

अन्तवन्त–नष्ट होने वाला; इमे-ये; देहाः-भौतिक शरीर; नित्यस्य-शाश्वत; उक्ताः-कहा गया है; शरीरिणः-देहधारी आत्मा का; अनाशिन:-अविनाशी; अप्रमेयस्य–अपरिमेय अर्थात जिसे मापा जा सका; तस्मात्-इसलिए; युध्यस्व युद्ध करो; भारत-भरतवंशी अर्जुन।

 

केवल भौतिक शरीर ही नश्वर है और शरीर में व्याप्त आत्मा अविनाशी, अपरिमेय तथा शाश्वत है। अतः हे भरतवंशी! युद्ध करो।

 

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।

उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥2.19॥

 

यः-वह जो; एनम्- इसे; वेत्ति–जानता है; हन्तारम्-मारने वाला; यः-जो; च-और; एनम्-इसे; मन्यते-सोचता है; हतम्-मरा हुआ; उभौ-दोनों; तौ-वे; न -न तो; विजानीतः-जानते हैं; न-न ही; अयम्-यह; हन्ति-मारता है; न-नहीं; हन्यते–मारा जाता है।

 

वह जो यह सोचता है कि आत्मा को मारा जा सकता है या आत्मा मर सकती है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं। वास्तव में आत्मा न तो मरती है और न ही उसे मारा जा सकता है।

 

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥2.20॥

 

न-जायते —जन्म नहीं लेता; म्रियते-मरता है; वा-या; कदाचित् किसी काल में भी; न -कभी नहीं; अयम् -यह; भूत्वा होकर; भविता-होना; वा–अथवा; न -कहीं; भूयः-आगे होने वाला; अजः-अजन्मा; नित्यः-सनातन; शाश्वतः-स्थायी; अयम्-यह; पुराणः-सबसे प्राचीन; न-नहीं; हन्यते-अविनाशी; हन्यमाने –नष्ट होना; शरीरे-शरीर में।

 

आत्मा का न तो कभी जन्म होता है न ही मृत्यु होती है और न ही आत्मा किसी काल में जन्म लेती है और न ही कभी मृत्यु को प्राप्त होती है। आत्मा अजन्मा, शाश्वत, अविनाशी और चिरनूतन है। शरीर का विनाश होने पर भी इसका विनाश नहीं होता।

 

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।

कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥2.21॥

 

वेद-जानता है; अवनाशिनम्-अविनाशी को; नित्यम्-शाश्वत; यः-वह जो; एनम्-इस; अजम्-अजन्मा; अव्यम्-अपरिवर्तनीय; कथम्-कैसे; सः-वह; पुरुषः-पुरुषः पार्थ-पार्थ; कम्-किसको; घातयति–मारने का कारण; हन्ति – मारता है; कम्-किसको।

 

हे पार्थ! वह जो यह जानता है कि आत्मा अविनाशी, शाश्वत, अजन्मा और अपरिवर्तनीय है, वह किसी को कैसे मार सकता है या किसी की मृत्यु का कारण हो सकता है? 2.21

 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्वाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥2.22॥

 

वासांसि-वस्त्र; जीर्णानि-फटे पुराने; यथा-जिस प्रकार; विहाय-त्याग कर; नवानि–नये; गृहणति-धारण करता है; नरः-मनुष्य; अपराणिअन्य; तथा – उसी प्रकार; शरीराणि- शरीर को; विहाय-त्याग कर; जीर्णानि-व्यर्थ; अन्यानि-भिन्न; संयाति-प्रवेश करता है; नवानि–नये; देही -देहधारी आत्मा।

 

जिस प्रकार से मनुष्य अपने फटे पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा पुराने तथा व्यर्थ शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करती है॥2.22॥

 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥2.23॥

 

न–नहीं; एनम्-इस आत्मा को; छिन्दन्ति-टुकड़े टुकड़े; शस्त्राणि-शस्त्र द्वारा; न-नहीं; एनम्-इस आत्मा को; दहति–जला सकता है; पावक:-अग्नि; न -कभी नहीं; च-और; एनम्-इस आत्मा को; क्लेदयन्ति–भिगोया जा सकता है; आपः-जल; न -कभी नहीं; शोषयति-सुखाया जा सकता है; मारूतः-वायु।

 

किसी भी शस्त्र द्वारा आत्मा के टुकड़े नहीं किए जा सकते, न ही अग्नि आत्मा को जला सकती है, न ही जल द्वारा उसे गीला किया जा सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है॥2.23॥

 

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥2.24॥

 

अच्छेद्यः-खण्डित न होने वाला, जिसे काटा या छेदा नहीं जा सकता ; अयम्-यह आत्मा; अदाह्यः- जलाया न जा सकने वाला; अयम्-यह आत्मा; अक्लेद्यः-गीला नहीं किया जा सकता; अशोष्यः-सुखाया न जा सकने वाला; एव–वास्तव में; च-तथा; नित्यः-सनातन; सर्वगतः-सर्वव्यापी; स्थाणुः-अपरिवर्तनीय; अचलः-जड़; अयम्-यह आत्मा; सनातनः-सदा नित्य।

 

आत्मा अखंडित और अज्वलनशील है, अर्थात इसे न तो छेदा या खंडित किया जा सकता है , न जलाया जा सकता है , न तो गीला किया जा सकता है और न ही सुखाया जा सकता है। यह आत्मा शाश्वत, सर्वव्यापी, अपरिर्वतनीय, अचल और अनादि है॥2.24॥

 

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥2.25॥

 

अव्यक्त:- अदृश्य ; अयम्-यह आत्मा; अचिन्त्यः-अकल्पनीयः अयम्-यह आत्मा; अविकार्य:-अपरिवर्तित; अयम्-यह आत्मा; उच्यते-कहलाता है; तस्मात्- इसलिए; एवम्-इस प्रकार; विदित्वा-जानकर; एनम् -इस आत्मा में; न-नहीं; अनुशोचितुम्–शोक करना; अर्हसि -उचित।

 

इस आत्मा को अदृश्य, अचिंतनीय और अपरिवर्तनशील कहा गया है। यह जानकर हमें शरीर के लिए शोक प्रकट नहीं करना चाहिए॥2.25॥

 

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।

तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥2.26॥

 

अथ-यदि, फिर भी; च-और; एनम्-आत्मा; नित्य-जातम्-निरन्तर जन्म लेने वाला; नित्यम्-सदैव; वा–अथवा; मन्यसे-तुम ऐसा सोचते हो; मृतम-निर्जीव; तथा अपि-फिर भी; त्वम्-तुम; महाबाहो- बलिष्ठ भुजाओं वाला; न-नहीं; एवम्-इस प्रकार; शोचितुम्–शोक अर्हसि उचित।

 

यदि तुम यह सोचते हो कि आत्मा निरन्तर जन्म लेती है और मरती है तब ऐसी स्थिति में भी, हे महाबाहु अर्जुन! तुम्हें इस प्रकार से शोक नहीं करना चाहिए॥2.26॥

 

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥2.27॥

 

जातस्य-वह जो जन्म लेता है; हि-के लिए; ध्रुवः-निश्चय ही; मृत्युः-मृत्युः ध्रुवम् निश्चित है; जन्म-जन्म; मृतस्य-मृत प्राणी का; च-भी; तस्मात्-इसलिए; अपरिहार्य-अर्थे-अपरिहार्य स्थिति मे, बिना उपाय वाले विषय में; न-नहीं; त्वम्-तुम; शोचितुम्–शोक करना; अर्हसि -योग्य ,उचित।

 

जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के पश्चात पुनर्जन्म भी अवश्यंभावी है। अतः तुम्हें अपरिहार्य के लिए ( इस बिना उपाय वाले विषय में ) शोक करना योग्य नहीं है॥2.27॥

 

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।

अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥2.28॥

 

अव्यक्त-आदीनि-जन्म से पूर्व अप्रकट; भूतानि-सभी जीव; व्यक्त–प्रकट; मध्यानि-मध्य में; भारत-भरतवंशी, अर्जुन; अव्यक्त–अप्रकट; निधानानि–मृत्यु होने पर; एव–वास्तव में; तत्र-अतः; का-क्या; परिदेवना-शोक।

 

हे भरतवंशी! समस्त जीव जन्म से पूर्व अव्यक्त रहते हैं, जन्म होने पर व्यक्त हो जाते हैं और मृत्यु होने पर पुनः अव्यक्त हो जाते हैं। अतः ऐसे में शोक व्यक्त करने की क्या आवश्यकता है॥2.28॥

 

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।

आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥2.29॥

 

आश्चर्यवत्-आश्चर्य के रूप में; पश्यति-देखता है; कश्चित्-कोई; एनम् – इस आत्मा को; आश्चर्यवत्-आश्चर्य के समान; वदति-कहता है; तथा- जिस प्रकार; एव–वास्तव में; च-भी; अन्यः-दूसरा; आश्चर्यवत्-आश्चर्यः च-और; एनम्-इस आत्मा को; अन्यः-दूसरा; शृणोति-सुनता है; श्रृत्वा-सुनकर; अपि-भी; एनम्-इस आत्मा को; वेद-जानता है; न -कभी नहीं; च-तथा; एव-नि:संदेह; कश्चित्-कुछ।

 

कुछ लोग आत्मा को एक आश्चर्य के रूप में देखते हैं, कुछ लोग इसे आश्चर्य बताते हैं और कुछ इसे आश्चर्य के रूप मे सुनते हैं जबकि अन्य लोग इसके विषय में सुनकर भी कुछ समझ नहीं पाते॥2.29॥

 

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।

तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥2.30॥

 

देही–शरीर में निवास करने वाली जीवात्मा; नित्यम्-सदैव; अवध्यः-अविनाशी, जिसका वध नहीं किया जा सके; अयम्- यह आत्मा; देहै-शरीर में; सर्वस्य–प्रत्येक; भारत-भरतवंशी अर्जुन; तस्मात्-इसलिए; सर्वाणि-समस्त; भूतानि-जीवित प्राणी; न-नहीं; त्वम्-तुम; शोचितुम्–शोक करना; अर्हसि-चाहिए।

 

हे अर्जुन! शरीर में निवास करने वाली आत्मा अविनाशी है इसलिए तुम्हें समस्त प्राणियों के लिए शोक नहीं करना चाहिए॥2.30॥

 

31-38 क्षत्रिय धर्म और युद्ध करने की आवश्यकता का वर्णन

 

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।

धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥2.31॥

 

स्वधर्मम्-वेदों के अनुसार निर्धारित कर्त्तव्य; अपि-भी; च-और; अवेक्ष्य–विचार कर; न – नहीं; विकम्पितुम्-त्यागना; अर्हसि-चाहिए; धर्म्यात् -धर्म के लिए; हि-वास्तव में ; युद्धात्-युद्ध करने की अपेक्षा; श्रेयः-श्रेष्ठ; अन्यत्-अन्य; क्षत्रियस्य– योद्धा ; न-नहीं; विद्यते-है।

 

इसके अलावा वेदों के अनुसार निर्धारित अपने धर्म को देखकर भी एक योद्धा के रूप में अपने कर्तव्य पर विचार करते हुए तुम्हें उसका त्याग नहीं करना चाहिए। वास्तव में योद्धा के लिए धर्म की रक्षा हेतु युद्ध करने से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। तू भय करने योग्य नहीं है॥2.31॥

 

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।

सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥2.32॥

 

यदृच्छया-बिना इच्छा के; च-भी; उपपन्नम्-प्राप्त होना; स्वर्ग-स्वर्गलोक का; द्वारम्-द्वार; अपावृतम्-खुल जाता है; सुखिनः-सुखी, भाग्यशाली; क्षत्रियाः -योद्धा; पार्थ-पृथापुत्र अर्जुन; लभन्ते–प्राप्त करते हैं; युद्धम् -युद्ध को; ईदृशम् -इस प्रकार।

 

हे पार्थ! वे क्षत्रिय भाग्यशाली होते हैं जिन्हें बिना इच्छा किए धर्म की रक्षा हेतु युद्ध के ऐसे अवसर प्राप्त होते हैं जिसके कारण उनके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं। अर्थात अपने-आप प्राप्त हुआ युद्ध खुला हुआ स्वर्गका दरवाजा है। वे क्षत्रिय बड़े सुखी हैं, जिनको ऐसा युद्ध प्राप्त होता है ।।2.32।।

 

अथ चैत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।

ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।2.33।।

 

अथ चेत् – यदि फिर भी; त्वम्-तुम; इमम्-इस; धर्म्यम्-संग्रामम्-धर्म युद्ध को; न-नहीं; करिष्यसि -करोगे; ततः-तब; स्वधर्मम् -वेदों के अनुसार मनुष्य के निर्धारित कर्त्तव्य; कीर्तिम्-प्रतिष्ठा; च–भी; हित्वा-खोकर; पापम्-पाप; अवाप्स्यसि–प्राप्त करोगे।

 

यदि फिर भी तुम इस धर्म युद्ध का सामना नहीं करना चाहते तब तुम्हें निश्चित रूप से अपने सामाजिक कर्तव्यों की उपेक्षा करने का पाप लगेगा और तुम अपनी प्रतिष्ठा खो दोगे।।2.33।।

 

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।

संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।2.34।।

 

अकीर्तिम्-अपयश; च-और; अपि-भी; भूतानि-लोगः कथयिष्यन्ति-कहेंगे; ते – तुम्हारे; अव्ययाम्-सदा के लिए; सम्भावितस्य–सम्मानित व्यक्ति के लिए; च-भी; अकीर्तिः-अपमान; मरणात्-मृत्यु की तुलना में; अतिरिच्यते-से बढ़कर होता है।

 

सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्तिका कथन करेंगे। वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्यके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होती है ।।2.34।।

 

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।

येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्।।2.35।।

 

भयात्-भय के कारण; रणात्-युद्धभूमि से; उपरतम्-भाग जाना; मस्यन्ते-सोचेंगे; त्वाम्-तुमको; महारथा–योद्धा जो अकेले ही दस हजार साधारण योद्धाओं का सामना कर सके; येषाम–जिनकी; च-और; बहुमतः-अति सम्मानित; भूत्वा-हो कर; यास्यसि-तुम गँवा दोगे; लाघवम्-तुच्छ श्रेणी के।

 

जिन महारथी योद्धाओं ने तुम्हारे नाम और यश की सराहना की है, वे सब यह सोचेंगे कि तुम भय के कारण युद्धभूमि से भाग गये और उनकी दृष्टि में तुम अपना सम्मान गंवा दोगे।।2.35।।

 

अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः।

निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्।।2.36।।

 

अवाच्य वादान-न कहने योग्यः च-भी; बहून् – कईः वदिष्यन्ति–कहेंगे; तब-तुम्हारे; अहिताः-शत्रु; निन्दन्तः-निन्दा; तब-तुम्हारी; सामर्थ्यम्-शक्ति को; ततः-उसकी अपेक्षा; दुःखतरम्-अति पीड़ादायक; नु–निसन्देह; किम्-क्या;

 

तेरे शत्रुलोग तेरी सार्मथ्यकी निन्दा करते हुए न कहनेयोग्य बहुत-से वचन कहेंगे। उससे बढ़कर और दुःखकी बात क्या होगी? ।।2.36।।

 

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।

तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युध्दाय कृतनिश्चयः।।2.37।।

 

हत:-मारे जाना; वा-या तो; प्राप्स्यसि–प्राप्त करोगे; स्वर्गम्-स्वर्गलोक को; जित्वा-विजयी होकर; वा-अथवा; भोक्ष्यसे-तुम भोगोगे; महीम्-पृथ्वी लोक का सुख; तस्मात्-इसलिए; उत्तिष्ठ-उठो; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन; युद्धाय-युद्ध के लिए; कृत-निश्चय–दृढ़ संकल्प;।

 

अगर युद्धमें तू मारा जायगा तो तुझे स्वर्गकी प्राप्ति होगी और अगर युद्धमें तू जीत जायगा तो पृथ्वीका राज्य भोगेगा। अतः हे कुन्तीनन्दन! तू युद्धके लिये निश्चय करके खड़ा हो जा ।।2.37।।

 

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।2.38।।

 

सुख–सुख; दुःखे-दुख में; समेकृत्वा-समभाव से; लाभ अलाभौ – लाभ तथा हानि; जय अजयौ-विजय तथा पराजयः ततः-तत्पश्चात; युद्धाय युद्ध के लिए; युज्यस्व-तैयार हो जाओ; न- कभी नहीं; एवम्-इस प्रकार; पापम्-पाप; अवाप्स्यसि-अर्जित करेंगे।

 

जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा ।।2.38।।

 

39-53 कर्मयोग विषय का उपदेश

 

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुध्दिर्योगे त्विमां श्रृणु।

बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।।2.39।।

 

एषा-अब तक; ते -तुम्हारे लिए: अभिहिता-वर्णन किया; सांख्ये-वैश्लेषिक ज्ञान द्वारा; बुद्धिः-बुद्धि; योगे-बुद्धि योग से; तु–वास्तव में; इमाम्-इसे; शृणु-सुनो; बुद्धया -बुद्धि से; युक्तः-एकीकृत; यया -जिससे; पार्थ-पृथापुत्र अर्जुन; कर्मबन्धाम्-कर्म के बन्धन से; प्रहास्यसि-तुम मुक्त हो जाओगे।

 

अब तक मैंने तुम्हें सांख्य योग या आत्मा की प्रकृति के संबंध में वैश्लेषिक ज्ञान से अवगत कराया है। अब मैं क्योंकि बुद्धियोग या ज्ञानयोग प्रकट कर रहा हूँ, हे पार्थ! उसे सुनो। जब तुम ऐसे ज्ञान के साथ कर्म करोगे तब कर्मों के बंधन से स्वयं को मुक्त कर पाओगे।।2.39।।

 

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥2.40॥

 

न–नहीं; इह-इस मे; अभिक्रम-प्रयत्न; नाश:-हानि; अस्ति–है; प्रत्यवायः-प्रतिकूल परिणाम; न-कभी नहीं; विद्यते-है; सु अल्पम्-थोड़ा; अपि – यद्यपि; अस्य-इसका; धर्मस्य-व्यवसाय ; त्रयते-रक्षा करता है; महतः-महान; भयात्-भय से।

 

इस चेतनावस्था में कर्म करने से किसी प्रकार की हानि या प्रतिकूल परिणाम प्राप्त नहीं होते अपितु इस प्रकार से किया गया अल्प प्रयास भी बड़े से बड़े भय से हमारी रक्षा करता है। अर्थात मनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है ।।2.40।।

 

व्यवसायत्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥2.41॥

 

व्यवसाय आत्मिका-दृढ़ संकल्प; बुद्धि:-बुद्धि; एका-एकमात्र; इह-इस मार्ग पर; कुरुनन्दन-कुरु वंशी; बहुशाखा:-अनेक शाखा; हि-निश्चय ही; अनन्ताः-असीमित; च-भी; बुद्धयः-वुद्धि; अव्यवसायिनाम्-संकल्प रहित।

 

हे कुरुवंशी! जो इस मार्ग का अनुसरण करते हैं, उनकी बुद्धि निश्चयात्मक होती है और उनका एकमात्र लक्ष्य होता है लेकिन जो मनुष्य संकल्पहीन होते हैं उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं मे विभक्त रहती है॥2.41॥

 

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।

वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः।।2.42।।

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।2.43।।

 

याम् इमाम् – ये सब ; पुष्पिताम्- दिखावटी ; वाचम्-शब्द; प्रवदन्ति-कहते हैं; अविपश्चित:-अल्पज्ञान वाले मनुष्य; वेदवादरताः-वेदों के अलंकारिक शब्दों में आसक्ति रखने वाले; पार्थ-पृथा का पुत्र अर्जुन; न अन्यत्-दूसरा कोई नहीं; अस्ति-है; इति–इस प्रकार; वादिनः-अनुशंसा करना; काम आत्मानः–इन्द्रियतृप्ति के इच्छुक; स्वर्गपरा:–स्वर्गलोक की प्राप्ति का लक्ष्य रखने वाले; जन्मकर्मफल-उत्तम जन्म तथा फल की इच्छा से कर्म करने वाले; प्रदाम-प्रदान करने वाला; क्रियाविशेष-आडम्बरपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान करना; बहुलाम्-विभिन्न; भोग-इन्द्रिय तृप्ति; ऐश्वर्य-वैभव; गतिम्-उन्नति; प्रति-की ओर।

 

अल्पज्ञ मनुष्य वेदों के आलंकारिक शब्दों पर अत्यधिक आसक्त रहते हैं जो स्वर्गलोक का सुख भोगने के प्रयोजनार्थ दिखावटी कर्मकाण्ड करने की अनुशंसा करते हैं और जो यह मानते हैं कि इन वेदों में कोई उच्च सिद्धान्तों का वर्णन नहीं किया गया है। वे वेदों के केवल उन्हीं खण्डों की महिमामण्डित करते हैं जो उनकी इन्द्रियों को तृप्त करते हैं और वे उत्तम जन्म, ऐश्वर्य, इन्द्रिय तृप्ति और स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिए आडम्बरयुक्त कर्मकाण्डों के पालन में लगे रहते हैं।।2.42।। & ।।2.43।।

 

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।

व्यवसायात्मिका बुध्दिः समाधौ न विधीयते।।2.44।।

 

भोग-तृप्ति; ऐश्वर्य-विलासता; प्रसक्तानाम्-द्योर आसक्त पुरुष; तया-ऐसे पदार्थों से; अपहृतचेतसाम्-भ्रमित बुद्धि वाले, जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है और भोगोंकी तरफ खिंच गया है; व्यवसाय आत्मिका:- दृढ़ निश्चय; बुद्धि-बुद्धि; समाधौ–पूरा करना; न-नहीं; विधीयते-घटित होती है।

 

उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें दृढ़ निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती अर्थात समाधि और ध्यान की अवस्था में स्थित नहीं होती ।।2.44।।

 

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।2.45।।

 

त्रैगुण्य-प्रकृति के तीन गुण; विषयाः-विषयों में; वेदाः-वैदिक ग्रंथ; निस्त्रैगुण्यः-गुणतीत या प्रकृति के तीनों गुणों से परे; भव-होना; अर्जुन-अर्जुन; निर्द्वन्द्वः-द्वैतभाव से मुक्त; नित्यसत्त्वरथ:-नित्य सत्य में स्थिर; निर्योगक्षेमः-लाभ तथा रक्षा के भावों से मुक्त; आत्मवान्–आत्मलीन।

 

वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, परम सत्य में स्थित होकर सभी प्रकार के द्वैतों से स्वयं को मुक्त करते हुए भौतिक लाभ-हानि और सुरक्षा की चिन्ता किए बिना आत्मलीन हो जाओ। 2.45।।

 

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।

तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।।2.46।।

 

यावान्–जितना भी; अर्थः-प्रयोजन; उदपाने-जलकूप में; सर्वतः-सभी प्रकार से; सम्प्लुत उदके-विशाल जलाशय में; तावान्–उसी तरह; सर्वेषु-समस्त; वेदेषु-वेदों में; ब्राह्मणस्य–परम सत्य को जानने वाला; विजानतः-पूर्ण ज्ञानी।।

 

सब तरफसे परिपूर्ण महान् जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे जलाशयमें मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता, वेदों और शास्त्रोंको तत्त्वसे जाननेवाले ब्रह्मज्ञानीका सम्पूर्ण वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता ।।2.46।।

 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

 

कर्मणि-निर्धारित कर्मः एव -केवल; अधिकारः-अधिकार; ते -तुम्हारा; मा-नहीं; फलेषु- कर्मफल में ; कदाचन-किसी भी समय; मा- कभी नहीं; कर्मफल-कर्म के परिणामस्वरूप फल; हेतुः-कारण; भू:-होना; मा-नहीं; ते- तुम्हारी; सङ्गः-आसक्ति; अस्तु-हो; अकर्मणि-अकर्मा रहने में।

 

तुम्हें अपने निश्चित कर्मों का पालन करने का अधिकार है लेकिन तुम अपने कर्मों का फल प्राप्त करने के अधिकारी नहीं हो, तुम स्वयं को अपने कर्मों के फलों का कारण मत मानो और न ही अकर्मा रहने में आसक्ति रखो।। अर्थात तुम केवल कर्म करो । कर्म के फलों में आसक्ति मत रखो । तुम्हारे अच्छे और बुरे कर्मों के आधार पर फल तुम्हें अपने निर्धारित समय पर स्वयं ही प्राप्त हो जाएंगे।। 2.47।।

 

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।

सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥2.48॥

 

योगस्थः-योग में स्थिर होकर; कुरु-करो; कर्मणि-कर्त्तव्यः सङ्गम्-आसक्ति को; त्यक्त्वा-त्याग कर; धनञ्जय-अर्जुन; सिद्धि-असिद्धयोः-सफलता तथा विफलता में; समः-समभाव; भूत्वा-होकर; समत्वम्-समभाव; योग–योग; उच्यते-कहा जाता है।

 

हे अर्जुन! सफलता और असफलता की आसक्ति को त्याग कर योग में स्थित होकर तुम दृढ़ता से अपने कर्तव्य का पालन करो। यही समभाव योग कहलाता है॥2.48॥

 

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥2.49॥

 

दूरेण-दूर से त्यागना; हि-निश्चय ही; अवरम्-निष्कृष्ट; कर्म-कामनायुक्त कर्म; बुद्धि योगात्-दिव्य ज्ञान में स्थित बुद्धि के साथ; धनञ्जय-अर्जुन; बुद्धौ-दिव्य ज्ञान और अंतर्दृष्टि; शरणम्-शरण ग्रहण करना; अन्विच्छ – शरण ग्रहण करो; कृपणा:-कंजूस; फलहैतवः-कर्म का फल प्राप्त करने की इच्छा वाले।

 

हे अर्जुन! दिव्य ज्ञान और अन्तर्दृष्टि की शरण ग्रहण करो, फलों की आसक्ति युक्त कर्मों से दूर रहो जो निश्चित रूप से दिव्य ज्ञान में स्थित बुद्धि के साथ निष्पादित किए गए कार्यों से निष्कृष्ट हैं। जो अपने कर्मफलों का भोग करना चाहते हैं, वे कृपण हैं॥2.49॥

 

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌ ॥2.50॥

 

बुद्धियुक्त:-बुद्धि से युक्त; जहाति-मुक्त हो सकता है; इह-इस जीवन मे; उभे -दोनों; सुकृतदुष्कृते-शुभ तथा अशुभ कर्म; तस्मात्-इसलिए; योगाय-योग के लिए; युज्यस्व-प्रयास करना; योगः-योग; कर्मसु कौशलम्-कुशलता से कार्य करने की कला।

 

समबुद्धियुक्त युक्त मनुष्य बिना आसक्ति के कर्मयोग का अभ्यास करता है तब वह यहाँ जीवित अवस्था में  इस जीवन में ही शुभ और अशुभ प्रतिक्रियाओं से छुटकारा पा लेता है, पुण्य और पाप दोनों का इसी लोक में त्याग कर देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इसलिए तू समत्व रूप योग के लिए प्रयास करना चाहिए जो कुशलतापूर्वक कर्म करने की कला है। अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है॥2.50॥

 

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।

जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्।।2.51।।

 

कर्मजम्-सकाम कर्मों से उत्पन्न; बुद्धियुक्ताः-समबुद्धि युक्त; हि-निश्चय ही; फलम्-फल; त्यक्त्वा-त्याग कर; मनीषिणः-बड़े-बड़े ऋषि मुनि; जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः-जन्म एवं मृत्यु के बन्धन से मुक्ति; पदं–अवस्था पर; गच्छन्ति–पहुँचते हैं; अनामयम्-कष्ट रहित, दुखों से परे ।

 

समबुद्धि युक्त बड़े – बड़े ऋषि मुनि और ज्ञानी जान कर्म के फलों की आसक्ति से स्वयं को मुक्त कर लेते हैं जो मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र में बांध लेती हैं। अर्थात वे कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं । इस चेतना में कर्म करते हुए वे उस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं जो सभी दुखों से परे है।।2 . 51।।

 

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥2 .52॥

 

यदा-जब; ते-तुम्हारा; मोह-मोह; कलिलम्-दलदल; बुद्धिः-बुद्धि; व्यतितरिष्यति-पार करना; तदा-तब; गन्तासि-तुम प्राप्त करोगे; निर्वेदम्-उदासीनता; श्रोतव्यस्य–सुनने योग्य; श्रुतस्य–सुने हुए को; च-और।

 

जब तुम्हारी बुद्धि मोह के दलदल को पार करेगी तब तुम सुने हुए और आगे सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक के भोगों सबके प्रति उदासीन हो जाओगे।।2 .52।।

 

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥2 .53॥

 

श्रुतिविप्रतिपन्ना-वेदों के सकाम कर्मकाण्डों के खण्डों की ओर आकर्षित न होना; ते- तुम्हारा; यदा-जब; स्थास्यति-स्थिर हो जाएगा; निश्चला–अस्थिर; समाधौ-दिव्य चेतना; अचला-स्थिर; बुद्धिः-बुद्धि; तदा-तब; योगम् – योग; अवाप्स्यसि -तुम प्राप्त करोगे।

 

जब तुम्हारी बुद्धि का वेदों के अलंकारमयी खण्डों में आकर्षण समाप्त हो जाए और वह दिव्य चेतना में स्थिर हो जाए तब तुम पूर्ण योग की उच्च अवस्था प्राप्त कर लोगे। अर्थात जिस काल में शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी, उस काल में तू योगको प्राप्त हो जायगा ।।2.53।।

 

54-72 स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा

 

अर्जुन उवाच

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।

स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।2.54।।

 

अर्जुन उवाच-अर्जुन ने कहा; स्थितप्रज्ञस्य-स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति; का-क्या; भाषा-बोलना; समाधिस्थस्य-दिव्य चेतना में स्थित मनुष्य का; केशव-केशी राक्षस का दमन करने वाले श्रीकृष्ण; स्थितधी:-प्रबुद्ध व्यक्ति; किम्-क्या; प्रभाषेत बोलता है; किम्-कैसे; आसीत-बैठता है; व्रजेत-चलता है; किम्-कैसे।

 

अर्जुन बोले – हे केशव! परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले अर्थात दिव्य चेतना में लीन मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं? वह स्थिर बुद्धिवाला सिद्ध पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ।।2.54।।

 

श्रीभगवानुवाच।

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥2 .55॥

 

श्रीभगवान्-उवाच-परमात्मा श्रीकृष्ण ने कहा; प्रजहाति–परित्याग करता है; यदा-जब; कामान्–स्वार्थयुक्त; सर्वान् – सभी; पार्थ-पृथापुत्र, अर्जुन; मनःगतान्-मन की; आत्मनि-आत्मा की; एव-केवल; आत्मना-शुद्ध मन से; तुष्टः-सन्तुष्ट, स्थितप्रज्ञः-स्थिर बुद्धि युक्त; तदा-उस समय, तब; उच्यत–कहा जाता है।

 

परम प्रभु श्रीकृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! जब कोई मनुष्य स्वार्थयुक्त कामनाओं और मन को दूषित करने वाली इन्द्रिय तृप्ति से संबंधित कामनाओं का परित्याग कर देता है और आत्मज्ञान को अनुभव कर संतुष्ट हो जाता है अर्थात अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है तब ऐसे मानव को दिव्य चेतना में स्थित अर्थात स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।।2.55।।

 

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥2 .56॥

 

दुःखेषु-दुखों में; अनुद्विग्रमना:-जिसका मन विचलित नहीं होता, जिसके मन में उद्वेग नहीं होता ; सुखेषु-सुख में; विगतस्पृहः-बिना लालसा के; वीत-मुक्त; राग-आसक्ति; भय-भय; क्रोधः-क्रोध से; स्थितधी:-प्रबुद्ध मनुष्य ; मुनि:-मुनि; उच्यते-कहलाता है।

 

दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें लालसा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है, वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि वाला मनीषी कहलाता है।।।2.56।।

 

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.57।।

 

यः-जो; सर्वत्र-सभी जगह, सभी परिस्थितियों में ; अनभिस्नेहः-अनासक्त या आसक्ति रहित ; तत्-उस; प्राप्य-प्राप्त करके; शुभ-अच्छा; अशुभम्-बुरा; न – न तो; अभिनन्दति- हर्षित होता है; न -न ही; द्वेष्टि-द्वेष करता है; तस्य-उसका; प्रज्ञा-ज्ञान, प्रतिष्ठिता-स्थिर।

 

जो सभी परिस्थितियों में और सभी जगह अनासक्त या आसक्तिरहित रहता है और न ही शुभ फल की प्राप्ति से हर्षित होता है और न ही विपत्ति से उदासीन होता है वही पूर्ण ज्ञानावस्था में स्थित मुनि है अर्थात उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है ।।2.57।।

 

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.58।।

 

यदा- जिस तरह ; संहरते-संकुचित कर लेता है या समेट लेता है; च-भी; अयम्- यह; कूर्म :-कछुआ; अङ्गानि–अंग; इव-वैसे ही; सर्वशः-पूरी तरह; इन्द्रियाणि-इन्द्रियाँ ;इन्द्रिय अर्थभ्यः-इन्द्रियविषयों से; तस्य-उसकी; प्रज्ञा-दिव्य चेतना; प्रतिष्ठिता-स्थित।

 

जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट कर संकुचित कर के उन्हें खोल के भीतर लेता है, वैसे ही जब यह मनुष्य या  कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से समेट लेता या हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है और वह दिव्य ज्ञान में स्थिर हो जाता है।।।2.58।।

 

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥2 .59॥

 

विषयाः-इन्द्रिय विषय; विनिवर्तन्ते-रोकना; निराहारस्य – स्वयं को दूर रखने का अभ्यास, इन्द्रियों को विषयों से हटाने का अभ्यास ; देहिनः-देहधारी जीव के लिए; रसवर्जम-भोग का त्याग करना; रस:-भोग विलास, इन्द्रिय विषयों को भोगने की लालसा ; अपि – यद्यपि, फिर भी ; अस्य-उसका; परम-सर्वोत्तम, भगवान ; दृष्टा–अनुभव होने पर; निवर्तते – वह समाप्त हो जाता है।

 

जब देहधारी जीव इन्द्रियों के विषयों से स्वयं को दूर रखने का अभ्यास करता है तो उसके विषय तो निवृत्त हो जाते हैं अर्थात वो भोगों का त्याग तो कर देता है , परन्तु भोग विलास या इन्द्रिय विषयों को भोगने की लालसा बनी रहती है यद्यपि जो लोग भगवान को जान लेते हैं या उस परमात्म तत्त्व का अनुभव कर लेते हैं तो ऐसे स्थित प्रज्ञ मनुष्य के विषय और भोग विलास की उनकी लालसाएँ समाप्त हो जाती हैं अर्थात वह सदा के लिए विषयों से निवृत्त और मुक्त हो जाता है ।।2.59।।

 

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरूषस्य विपश्चितः।

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥2 .60॥

 

यततः-आत्म नियंत्रण का अभ्यास करते हुए; हि-के लिए; अपि-तथपि; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन ; पुरुषस्य-मनुष्य की; विपश्चितः-विवेक से युक्त; इन्द्रियाणि-इन्द्रियाँ; प्रमाथीन-अशांत; हरन्ति–वश मे करना; प्रसभम्- बलपूर्वक; मनः-मन।

 

हे कुन्ति पुत्र! इन्द्रियाँ इतनी प्रबल और अशान्त होती है कि वे विवेकशील और आत्म नियंत्रण का अभ्यास करने वाले मनुष्य के मन को भी अपने वश में कर लेती है।।।2.60।।

 

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2 .61॥

 

तानि-उन्हें; सर्वाणि-समस्त, सम्पूर्ण ; संयम्य-वश में करना; युक्तः-एक हो जाना; आसीत-स्थित होना चाहिए; मत् परः-मुझमें (श्रीकृष्ण); वशे–वश में; हि-निश्चय ही; यस्य–जिसकी; इन्द्रियाणि-इन्द्रियाँ; तस्य-उनकी; प्रज्ञा–पूर्ण ज्ञान; प्रतिष्ठिता-स्थिर।

 

वे जो अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में कर लेते हैं और अपने मन को मुझमें स्थिर कर देते हैं अर्थात मेरे परायण हो जाते है , इस प्रकार जिसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हैं वे निश्चित रूप से दिव्य ज्ञान में स्थित होते हैं अर्थात उनकी बुद्धि स्थिर है। ।।2.61।।

 

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।

सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।

 

ध्यायत:-चिन्तन करते हुए; विषयान्–इन्द्रिय विषय; पुंस:-मनुष्य की; सङ्गः-आसक्ति; तेषु-उनके (इन्द्रिय विषय); उपजायते-उत्पन्न होना; सङ्गात्-आसक्ति से; सञ्जायते – विकसित होती है। कामः-इच्छा; कामात्-कामना से; क्रोध:-क्रोध; अभिजायते-उत्पन्न होता है।

 

इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करते हुए मनुष्य उनमें आसक्त हो जाता है और आसक्ति से कामना अर्थात इच्छा विकसित होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है अर्थात इच्छा पूरी न होने पर क्रोध आता है ।। 2.62।।

 

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2 .63॥

 

क्रोधात्-क्रोध से; भवति–होना; सम्मोहः-निर्णय लेने की क्षमता क्षीण होना, मूढ़ भाव होना ; सम्मोहात्–निर्णय लेने की क्षमता क्षीण हो जाना; स्मृति-स्मरणशक्ति; विभ्रमः-भ्रमित; स्मृतिभ्रंशात्-स्मृति का भ्रम होने से; बुद्धिनाश:-बुद्धि का विनाश; बुद्धिनाशात्-बुद्धि के विनाश से प्रणश्यति-पतन होना।

 

क्रोध से मूढ़ भाव उत्पन्न होता है अर्थात निर्णय लेने की क्षमता को क्षीण हो जाती है ,  मूढ़ भाव से या निर्णय लेने की क्षमता क्षीण होने से  स्मृति भ्रम अर्थात स्मरण शक्ति भ्रमित हो जाती है । स्मृति भ्रमित हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य का पतन हो जाता है।॥2 .63॥

 

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।2.64।।

 

रागद्वेष- मोह और घृणा ; वियुक्तेः-मुक्त; तु-लेकिन; विषयान्–इन्द्रियविषयों को; इन्द्रियैः-इन्द्रियों द्वारा; चरन्-भोग करते हुए; आत्मवश्यैः-मन को अपने वश में करने वाला; विधेय-आत्मा-मन को नियत्रित करता है; प्रसादम्-भगवतकृपा को; अधिगच्छति–प्राप्त करता है।

 

लेकिन जो साधक अपने मन को वश में रखता है अर्थात अपने अन्तः करण को अपने अधीन रखता है वह इन्द्रियों के विषयों का भोग करने अर्थात विषयों का सेवन करते हुए भी या विषयों में विचरण करते हुए भी पर भी राग और द्वेष से मुक्त रहता है और भगवद्कृपा तथा अन्तः करण की प्रसन्नता को प्राप्त करता है।। 2 .64।।

 

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।

प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥2 .65॥

 

प्रसादे – भगवान की दिव्य कृपा द्वारा; सर्व-सभी; दुःखनाम्-दुखों का; हानि:-क्षय, अंत , नाश , अस्य-उसके; उपजायते-होता है। प्रसन्न-चेतसः- प्रसन्न चित्त ,शांत मन के साथ; हि-वास्तव में ; आशु-शीघ्र; बुद्धि-बुद्धि; परि अवतिष्ठते-दृढ़ता से स्थित।

 

भगवान की दिव्य कृपा से शांति प्राप्त होती है जिससे सभी दुखों का अन्त हो जाता है और ऐसे शांत मन वाले या प्रसन्न चित्त वाले साधक की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही दृढ़ता से स्थिर हो जाती है।।2 .65।।

 

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।

न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥2 .66॥

 

न–नहीं; अस्ति-है; बुद्धिः-बुद्धि; अयुक्तस्य-भगवान में स्थित न होना; न-नहीं; च-और; अयुक्तस्य- भगवान में स्थित न रहने वाले; भावना-चिन्तन; न- नहीं; च-और; अभावयतः-जो स्थिर नहीं है उसके; शान्तिः शान्ति; अशान्तस्य-अशान्त; कृतः-कहाँ है; सुखम्-सुख।

 

जिस असंयमी व्यक्ति का अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता, न ही उसकी बुद्धि दृढ़ होती है अर्थात भगवान में स्थित नहीं होती और न ही उसका मन भगवान के चिन्तन मे स्थिर हो सकता है और जो अपने मन को भगवान में स्थिर नहीं करता, जिसके बिना शान्ति संभव नहीं और शांति के बिना कोई कैसे सुखी रह सकता है?।।2 .66।।

 

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥2 .67॥

 

इन्द्रियाणाम्- इन्द्रियों के; हि-वास्तव में; चरताम्-चिन्तन करते हुए; यत्-जिसके; मन:-मन; अनुविधीयते-निरन्तर रत रहता है। तत्-वह; अस्य-इसकी; हरति-वश में करना; प्रज्ञाम्-बुद्धि के; वायुः-वायु; नावम्-नाव को; इव-जैसे; अम्भसि-जल पर।

 

जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है॥2 .67॥

 

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2 .68॥

 

तस्मात्-इसलिए; यस्य–जिसकी; महाबाहो-महाबलशाली; निगृहीतानि-विरक्त; सर्वशः-सब प्रकार से; इन्द्रियाणि-इन्द्रियाँ; इन्द्रिय अर्थेभ्यः-इन्द्रिय विषयों से; तस्य-उस व्यक्ति की; प्रज्ञा-दिव्य ज्ञान; प्रतिष्ठिता-स्थिर रहना।

 

इसलिए हे महाबाहु। जो मनुष्य इन्द्रियों के विषय भोगों से विरक्त रहता है, वह दृढ़ता से लोकातीत ज्ञान से युक्त हो जाता है अर्थात जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा वशमें की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है ।।2.68।।

 

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥2 .69॥

 

या-जिसे; निशा-रात्रि; सर्व-सब; भूतानाम्-सभी जीवः तस्याम्-उसमें; जागर्ति-जागता रहता है; संयमी-आत्मसंयमी; यस्याम्-जिसमें; जाग्रति-जागते हैं; भूतानि–सभी जीव; सा-वह; निशा–रात्रि; पश्यतः-देखना; मुनेः-मुनि।

 

जिसे सब लोग दिन समझते हैं वह आत्मसंयमी के लिए अज्ञानता की रात्रि है तथा जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है अर्थात सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि (परमात्मासे विमुखता) के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी ( संयमी मनुष्य ) जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं), परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है। ।।2.69।।

 

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥2 .70॥

 

आपूर्यमाणम्-सभी ओर से जलमग्न; अचल प्रतिष्ठम्-विक्षुब्ध न होना; समुद्रम् -समुद्र में; आपः-जलः प्रविशन्ति–प्रवेश करती हैं; यद्वत्-जिस प्रकार; तद्वत्-उसी प्रकार; काम-कामनाएँ ; यम्-जिसमें; प्रविशन्ति–प्रवेश करती हैं; सर्वे- सभी; सः-वह व्यक्ति; शन्तिम्-शान्ति; आप्नोति–प्राप्त करता है; न-नहीं; कामकामी-कामनाओं को तुष्ट करने वाला।

 

जैसे सम्पूर्ण नदियों का जल चारों ओर से जल द्वारा परिपूर्ण समुद्र में आकर निरंतर मिलता रहता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है अर्थात जल के प्रवाह से विक्षुब्ध नहीं होता । ऐसे ही ज्ञानी पुरुष अपने चारों ओर से सम्पूर्ण भोग- पदार्थों से घिरे रहने पर भी या इन्द्रियों के विषयों के आवेग के पश्चात भी शांत रहता है न कि अज्ञानी मनुष्य की भांति भोगों की कामनाओं को तुष्ट करने के प्रयास में लगा रहता है वही संयमी मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है, ।।2.70।।

 

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः

निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥2 .71॥

 

विहाय-त्याग कर; कामान्–भौतिक इच्छाएँ; यः-जो; सर्वान्–समस्त; पुमान्-पुरुष; चरति-रहता है; निःस्पृहः-कामना रहित; निर्ममाः-स्वामित्व की भावना से रहित; निरहंकारः-अहंकार रहित; सः-वह; शान्तिम्-पूर्ण शान्ति को; अधिगच्छति-प्राप्त करता है।

 

जिस मुनष्य ने अपनी सभी भौतिक इच्छाओं का परित्याग कर दिया हो और इन्द्रिय तृप्ति की लालसा, स्वामित्व के भाव , कामना और अंहकार से रहित हो गया हो, वह पूर्ण शांति प्राप्त कर सकता है।॥2 .71॥

 

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।

स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥2 .72॥

 

एषा-ऐसे; ब्राह्मी-स्थितिः-भगवदप्राप्ति की अवस्थाः पार्थ-पृथापुत्र अर्जुन; न-कभी नहीं; एनाम्-इसको; प्राप्य-प्राप्त करके; विमुह्यति-मोहित होता है; स्थित्वा-स्थित होकर; अस्याम्-इसमें; अन्तकाले-मृत्यु के समय; अपि-भी; ब्रह्म निर्वाणं -माया से मुक्ति; ऋच्छति-प्राप्त करता है।

 

हे पार्थ! ऐसी अवस्था में रहने वाली प्रबुद्ध आत्मा जब ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लेती है, वह फिर कभी भ्रमित नहीं होती तब मृत्यु के समय भी इस दिव्य चेतना में स्थित सिद्ध पुरुष जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है और भगवान के परम धाम में प्रवेश करता है। अर्थात यह ब्राह्मी स्थिति ( ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति ) है । इसको प्राप्त होकर योगी कभी कोई मोहित नहीं होता। इस ब्राह्मी स्थिति में यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण अर्थात ब्रह्म ( ब्रह्मानंद ) की प्राप्ति हो जाती ।।2.72।।

 

 

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥2॥

 

 

 

 

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This Post Has 2 Comments

  1. Tashu

    Your words are so nice. I’m impressed by the way you’ve explained the verses 💗💗💗💗

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