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Bhagvat Gita Chapter 14

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Bhagvat Gita Chapter 14

 

 

 

गुणत्रयविभागयोग-  चौदहवाँ अध्याय

 

01-04 ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत्‌ की उत्पत्ति

05-18 सत्‌, रज, तम- तीनों गुणों का वर्णन

19-27 भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण

 

अथ चतुर्दशोऽध्यायः- गुणत्रयविभागयोग

 

ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत्‌ की उत्पत्ति

 

 

श्री भगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।

यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।14.1।।

 

श्रीभगवान् उवाच-परम भगवान ने कहा; परम्-सर्वोच्च; भूयः-पुन: ; प्रवक्ष्यामि-मैं कहूँगा; ज्ञानानाम्-समस्त ज्ञान की; ज्ञानम् उत्तमम्-सर्वश्रेष्ठ ज्ञान; यत्-जिसे; ज्ञात्वा-जानकर; मुनयः-संत; सर्वे-समस्त; परम्-सर्वोच्च; सिद्धिम् – पूर्णता; इत:-इस संसार से; गताः-प्राप्त की।

 

श्रीभगवान् बोले – सम्पूर्ण ज्ञानों में उत्तम और सर्वश्रेष्ठ परम ज्ञान को मैं पुनः कहूँगा, जिसे जानकर समस्त मुनि और संत इस संसार से मुक्त होकर परमसिद्धि को प्राप्त हो गये हैं।।14.1।।

 

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।

सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।।14.2।।

 

इदम्-इस; ज्ञानम्-ज्ञान को; उपाश्रित्य-आश्रय पाकर; मम-मेरा; साधर्म्यम् – समान प्रकृति को; आगताः-प्राप्त करके; सर्गे-सृष्टि के समय; अपि-भी; न – कभी नहीं; उपजायन्ते – जन्म लेते हैं; प्रलये-प्रलय के समय; न-तो; व्यथन्ति–कष्ट अनुभव नहीं करते; च-भी

 

मेरे इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो मेरे ही समान स्वभाव और स्वरूप को प्राप्त हो गये हैं, वे न तो कभी सृष्टि के समय पुनः जन्म लेते हैं  और न ही कभी महा प्रलय के समय व्याकुल होते हैं।। 14.2 ।।

 

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।

संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।14.3।।

 

मम–मेरा; योनि:-गर्भ ; महत् ब्रह्म-पूर्ण भौतिक सार ; तस्मिन्-उसमें; गर्भम्-गर्भ; दधामि-उत्पक करता हूँ; अहम्–मैं; सम्भवः-जन्म; सर्वभूतानाम्-समस्त जीवों का; ततः-तत्पश्चात; भवति–होना; भारत–भरतपुत्र, अर्जुन

 

 हे भरतवंशी ! मेरी यह आठ तत्वों वाली महद ब्रह्म रूप जड़ प्रकृति (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली योनि ( गर्भ ) है और मैं ही ब्रह्म अर्थात आत्मा रूप में चेतन-रूपी बीज या गर्भ को स्थापित करता हूँ । इस जड़-चेतन के संयोग से ही सभी चर-अचर प्राणियों का जन्म होता है।। 14.3 ।।

(यह प्रकृति ही गर्भ या जीवों की उत्पत्ति का स्थान है । इसमें परमेश्वर जीव रूप गर्भ का स्थापन करते है अर्थात इसे जीवात्मा के साथ गर्भस्थ करते हैं और इस प्रकार समस्त जीवों का जन्म होता है ।)

 

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।14.4।।

 

सर्व-सभी; योनिषु–समस्त योनियों में; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन; मूर्तयः-रूप; सम्भवन्ति-प्रकट होते हैं; याः-जो; तासाम्-उन सबों का; ब्रह्ममहत्-वृहत प्राकृत शक्ति; योनिः-जन्म; अहम्–मैं; बीजप्रदः-बीजप्रदाता; पिता–पिता।

 

हे कुन्तीपुत्र! समस्त योनियों में जो भी शरीर धारण करने वाले प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सभी को गर्भ में धारण करने वाली जड़ प्रकृति ही उनकी माता है और मैं ब्रह्म अर्थात आत्मा रूपी बीज को स्थापित करने वाला पिता हूँ।।14.4।।

 

सत्‌, रज, तम- तीनों गुणों का विषय

 

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।14.5।।

 

सत्त्वम्-अच्छाई का गुण, सत्वगुण; रजः-आसक्ति का गुण, रजोगुण; तमः-अज्ञानता का गुण, तमोगुण; इति–इस प्रकार; गुणा:-गुण; प्रकृति-भौतिक शक्ति; सम्भवाः-उत्पन्न; निबध नन्ति–बाँधते हैं; महाबाहो-बलिष्ठ भुजाओं वाला; देहे-इस शरीर में; देहिनम्-जीव को, जीवात्मा को , आत्मा को ; अव्ययम्-अविनाशी।

 

हे महाबाहो ! प्रकृति से उत्पन्न होने वाले सत्त्व, रज और तम – ये तीनों गुण अविनाशी आत्मा को इस नश्वर शरीर के बंधन में बाँध देते हैं अर्थात प्रकृति से निर्मित इन तीन गुणों सतोगुण , रजोगुण और तमोगुण के कारण ही कभी नष्ट न होने वाला अविनाशी जीव / जीवात्मा इस कुछ ही समय बाद नष्ट हो जाने वाली नश्वर देह के बंधन में सदा के लिए बंध जाता है।।14.5।।

 

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।

सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ।।14.6।।

 

तत्र-इनके मध्य; सत्त्वम्-अच्छाई का गुण; निर्मलत्वात्–शुद्ध होना; प्रकाशकम्-प्रकाशित करना; अनामयम्-स्वास्थ्य और पूर्ण रूप से हृष्ट – पुष्ट; सुख-सुख की; सङ्गेन-आसक्ति; बध्नाति–बाँधता है; ज्ञान-ज्ञान; सङ्गेन-आसक्ति से; च-भी; अनघ-पापरहित, अर्जुन।

 

हे निष्पाप अर्जुन ! इन तीनों गुणों में, सत्त्वगुण अन्यों की अपेक्षा शुद्ध होने के कारण प्रकाशक अर्थात पाप कर्मों से जीव को मुक्त कर के आत्मा को प्रकाशित करने वाला  , अनामय ( निरुपद्रव, निर्विकार या निरोग) और पुण्य कर्मों से युक्त है; जिस से वह जीव को सुख की  और ज्ञान की आसक्ति से बांध देता है अर्थात सतोगुण आत्मा में सुख और ज्ञान के भावों के प्रति आसक्ति उत्पन्न कर उसे बंधन में डालता है और इस प्रकार जीव सुख और ज्ञान के अहंकार में बँध जाता है।।14.6।।

 

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।।14.7।।

 

रजो-रजोगुण, आसक्ति का गुण; रागआत्मकम्-रजोगुण की प्रकृति; विद्धि-जानो; तृष्णा-इच्छा; संग -संगति से; समुद्भवम्-उत्पन्नतत्-वह; निबन्धनाति–बाँधता है; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन; कर्मसङ्गेन-सकाम कर्म की आसक्ति से; देहिनम्-देहधारी आत्मा को ।।

 

हे कुन्तीनन्दन ! तृष्णा और आसक्ति को पैदा करने वाले रजोगुण को तुम राग स्वरूप समझो। रजोगुण की प्रकृति मोह है। तू रजोगुण को कामनाओं और लोभ के कारण उत्पन्न हुआ समझ । यह सांसारिक आकांक्षाओं और आकर्षणों से उत्पन्न होता है। वह कर्मों की आसक्ति से शरीरधारी आत्मा को बाँधता है और आसक्ति के माध्यम से आत्मा को कर्म के प्रतिफलों में बांधता है। जिसके कारण शरीरधारी जीव सकाम-कर्मों (फल की आसक्ति) में बँध जाता है।।14.7।।

 

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत।।14.8।।

 

तमः-तमोगुण; तु–लेकिन; अज्ञानजम्-अज्ञान से उत्पन्न; विद्धि-जानो; मोहनम्-मोह; सर्वदेहिनाम्-सभी जीवों में प्रमाद असावधानी; आलस्य-आलस्य; निद्राभिः-नींद; तत्-वह; निबध्नाति–बाँधता है; भारत-भरतपुत्र, अर्जुन।

 

हे भरतवंशी अर्जुन ! सम्पूर्ण देहधारियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तुम शरीर के प्रति मोह के कारण अज्ञान से उत्पन्न होने वाला समझो। जो समस्त देहधारियों (जीवों) को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद (पागलपन में व्यर्थ के कार्य करने की प्रवृत्ति) , आलस्य (आज के कार्य को कल पर टालने की प्रवृत्ति) और निद्रा (अचेत अवस्था में न करने योग्य कार्य करने की प्रवृत्ति) के द्वारा देहधारियों या जीवों को बाँधता है।।14.8।।

 

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।

ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।।14.9।।

 

सत्त्वम्-सत्वगुण; सुखे-सुख में; सञ्जयति –बाँधता है; रजः- रजोगुण; कर्माणि-कर्म के प्रति; भारत-भरतपुत्र, अर्जुन; ज्ञानम्-ज्ञान को; आवृत्य-ढकना; तु–लेकिन; तम:-अज्ञानता का गुण; प्रमादे-मोह; सञ्जयति-बाँधता है; उत–वास्तव में।

 

हे भारत ! सत्त्वगुण जीव को सुख में आसक्त कर के बाँध देता है और रजोगुण जीव या मनुष्य को कर्म में बांधता है , किन्तु तमोगुण ज्ञान को ढक कर के जीव को प्रमाद से युक्त कर देता है अर्थात सत्वगुण सांसारिक सुखों में बांधता है, रजोगुण आत्मा को सकाम कर्मों की ओर प्रवृत्त करता है और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित कर आत्मा को भ्रम में रखता है।।14.9।।

 

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।

रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।14.10।।

 

रजः-रजोगुण; तमः-अज्ञानता का गुण; च-भी; अभिभूय-पार करके; सत्त्वम् – सत्वगुण; भवति- बनता है; भारत-भरतपुत्र, अर्जुन; रजः-आसक्ति का गुण; सत्त्वम्-सत्वगुण; तमः-तमोगुण; च-भी; एव-उसी प्रकार से; तमः-तमोगुण; सत्त्वम्-सत्वगुण को; रजः-रजोगुण; तथा- इस प्रकार

 

हे भरतवंशी अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबा कर या उन के घटने पर सतोगुण की वृद्धि होती है, सतोगुण और रजोगुण के घटने पर तमोगुण बढ़ता है, इसी प्रकार तमोगुण और सतोगुण के घटने पर रजोगुण बढ़ता है अर्थात कभी-कभी सत्वगुण और रजोगुण तमोगुण को परास्त करते हैं  और कभी-कभी रजोगुण और सत्व गुण तमोगुण पर हावी हो जाते हैं और कभी-कभी तमोगुण , सत्व गुण और रजोगुण पर हावी हो जाता है।।14.10।।

 

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।14.11।।

 

सर्व-सभी में; द्वारेषु-द्वारो द्वारा; देह-शरीर अस्मिन्-इसमें; प्रकाश:-प्रकाश; उपजायते-प्रकट होता है; ज्ञानम्-ज्ञान; यदा-जब; तदा-उस सम; विद्यात्-जानो; विदृद्धम्-प्रधानता; सत्त्वम्-सत्वगुणः इति इस प्रकार से; उत-निश्चित रूप से;

 

जब इस मनुष्य शरीर में सब द्वारों ( इन्द्रियों और अन्तःकरण ) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है अर्थात जिस समय इस के शरीर सभी नौ द्वारों (दो आँखे, दो कान, दो नथुने, मुख, गुदा और उपस्थ) अर्थात् समस्त इन्द्रियों में ज्ञान रूप प्रकाश उत्पन्न होता है, उस समय सतोगुण विशेष बृद्धि को प्राप्त होता है। कहने का तात्पर्य है कि जब शरीर के सभी द्वार ज्ञान से आलोकित हो जाते हैं तब सत्त्वगुण को बढ़ा हुआ जानो।।14.11।।

 

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।

रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ।।14.12।।

 

लोभ:-लोभ; प्रवृत्तिः-गतिविधि; आरम्भः-परिश्रम; कर्मणाम् – साकाम कर्म; अशम:- अशांति ; स्पृहा-इच्छा; रजसि-रजोगुण में; एतानि – ये सब; जायन्ते – विकसित; विवृद्धे–जब प्रधानता होती है; भरतर्षभ -भरतवंशियों में प्रमुख, अर्जुन;

 

 हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! जब रजोगुण प्रबल होता है तब लोभ, सांसारिक सुखों के लिए परिश्रम, अशांति , प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ और उत्कंठा के लक्षण विकसित होते हैं अर्थात लोभ के उत्पन्न होने के कारण कार्यों को फल की इच्छा से करने की प्रवृत्ति और मन की चंचलता के कारण विषय-भोगों को भोगने की अनियन्त्रित इच्छा बढ़ने लगती है। 14.12

 

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।

तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।।14.13।।

 

अप्रकाश:-अँधेरा; अप्रवृत्तिः-जड़ताएँ; च-तथा; प्रमादः-असावधानी, लापरवाही , पागलपन , मस्तिष्क का वह रोग जिसमें मन और बुद्धि का संतुलन बिगड़ जाता है ;मोह:-मोह; एव-निस्संदेह; च-भी; तमसि-तमोगुण का; एतानि ये; जायन्ते प्रकट होते हैं; विवृद्ध-प्रधानता होने पर; कुरूनन्दन-कुरूपुत्र, अर्जुन।

 

हे कुरुवंशी अर्जुन! जब तमोगुण प्रबल होता है तब अज्ञान रूपी अन्धकार, कर्तव्य-कर्मों को न करने की प्रवृत्ति, पागलपन की अवस्था और मोह के कारण न करने योग्य कार्य करने की प्रवृत्ति बढने लगती हैं अर्थात तमोगुणके बढ़नेपर अज्ञान का अंधकार , कार्यों को न करने की प्रवृत्ति , लापरवाही , भ्रम और मोह ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।। 14.13

 

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।

तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते।।14.14।।

 

यदा-जब; सत्त्वे-सत्वगुण प्रबल होने पर; तु-लेकिन; प्रलयम्-मृत्यु, यति–जाता है, देहभृत्-देहधारी; तदा-उस समय; उत्तमविदाम्-विद्वानों के ; लोकान्-लोकों को; अमलान्–शुद्ध ; प्रतिपद्यते-प्राप्त करता है;

 

जब यह देहधारी जीव सत्त्वगुण की प्रबलता में या सतोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल अर्थात् स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है अर्थात जिनमें सत्वगुण की प्रधानता होती है वे मृत्यु के पश्चात ऋषियों के ऐसे उच्च लोक में जाते हैं जो रजो और तमोगुण से मुक्त होता है।।14.14।।

 

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।14.15।।

 

रजसि-रजोगुण में; प्रलयम्-मृत्यु को; गत्वा प्राप्त करके; कर्मसंगिषु  -सकाम कर्मियों के पास; जायते-जन्म लेता है तथा उसी प्रकार; प्रलीन:-मरकर; तमसि-तमोगुण में; मूढ-योनिषु-पशुयोनि में; जायते-जन्म लेता है

 

रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होने वाला प्राणी कर्मों में आसक्ति वाले मनुष्य योनि या मनुष्य लोक में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है अर्थात रजोगुण की प्रबलता वाले या रजोगुण की बृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होने वाले मनुष्य सकाम कर्म करने वाले मनुष्यों या लोगों के बीच जन्म लेते हैं और तमोगुण की बुद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त मनुष्य पशु-पक्षियों आदि की निम्न योनियों या प्रजातियों में जन्म लेते है।।14.15।।

 

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।

रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्।।14.16।।

 

कर्मण:-कर्म का; सुकृतस्य-शुद्ध; आहुः-कहा गया है; सात्त्विकम् – सत्वगुण; निर्मलम्-विशुद्ध; फलम्-फल; रजसः-रजोगुण का; तु-लेकिन; फलम् – परिणाम; दुःखम्-दुख; अज्ञानम्-अज्ञानता; तमसः-तमोगुण का; फलम्-फल

 

ऐसा कहा जाता है कि सत्वगुण में सम्पन्न किए गये कार्य शुभ फल प्रदान करते हैं, रजोगुण के प्रभाव में किए गये कर्मों का परिणाम पीड़ादायक होता है तथा तमोगुण से सम्पन्न किए गए कार्यों का परिणाम अंधकार है अर्थात सतोगुण में किये गये कर्म का फल सुख और ज्ञान युक्त तथा निर्मल कहा गया है, रजोगुण में किये गये कर्म का फल दुःख कहा गया है और तमोगुण में किये गये कर्म का फल अज्ञान या मूढ़ता कहा गया है। 14.16

 

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।

प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च।।14.17।।

 

सत्त्वात् – सत्वगुणी; सञ्जायते-उत्पन्न होता है; ज्ञानम्-ज्ञान; रजसः-रजोगुण से; लोभः-लालच; एव-निश्चय ही; च – और ; प्रमाद – असावधानी; मोहौ-तथा मोह; तमसः-तमोगुण से; भवतः – होता है; अज्ञानम्-अज्ञान; एव-निसंदेह ; च-और।

 

 सतोगुण से वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से निश्चित रूप से लोभ ही उत्पन्न होता है और तमोगुण से निश्चित रूप से प्रमाद, मोह, अज्ञान ही उत्पन्न होता हैं। 14.17

 

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।

जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः।।14.18।।

 

ऊर्ध्वम्-ऊपर की ओर; गच्छन्ति-जाते हैं; सत्त्वस्था:-जो सत्वगुण में स्थित हैं; मध्ये – मध्य में; तिष्ठन्ति – निवास करते हैं; राजसाः-रजोगुणी; जघन्य – घृणित; गुण-गुण; वृत्तिस्था:-कर्मों में रत; अधः-निम्न; गच्छन्ति-जाते हैं; तामसाः-तमोगुणी।

 

सतोगुण में स्थित जीव ऊर्ध्व लोकों में अर्थात स्वर्ग के उच्च लोकों को जाता हैं, रजोगुण में स्थित जीव मध्य में पृथ्वी लोक ( मृत्यु लोक ) या मनुष्य लोक में ही रह जाते हैं और निंदनीय तमोगुण में स्थित जीव अधोगति या पशु आदि नीच योनियों में नरक को जाते हैं। 14.18

 

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।14.19।।

 

न-नहीं; अन्यम्-अन्य; गुणेभ्यः-गुणों के ; कर्तारम्-कर्म के कर्त्ता; यदा-जब; द्रष्टा – देखने वाला; अनुपश्यति-ठीक से देखता है; गुणेभ्यः-प्रकृति के गुणों से; च-तथा; परम्-दिव्य; वेत्ति-जानता है; मत्भावम् – मेरी दिव्य प्रकृति को; सः-वह; अधिगच्छति–प्राप्त करता है।

 

जब विवेकी (विचारकुशल) मनुष्य प्रकृति के तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता या नहीं समझता और स्वयं को गुणों से परे अनुभव करता है और स्वयं को केवल दृष्टा रूप से देखता है , तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है अर्थात जब बुद्धिमान व्यक्ति को यह ज्ञात हो जाता है कि सभी कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है और जो प्रकृति के तीनों गुणों से परे स्थित होकर मेरे तत्व को जानता है और मुझ परमात्मा को देखते हैं, वे मेरी दिव्य प्रकृति और मेरे दिव्य स्वभाव को प्राप्त करते हैं।।14.19।।

 

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।

जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।।14.20।।

 

गुणान्–प्रकृति के तीन गुण; एतान्–इन; अतीत्य-गुणातीत होना; त्रीन्–तीन; देही-देहधारी; देह-शरीर; समुद्धवान् – से उत्पन्न; जन्म-जन्म; मृत्यु-मृत्युः जरा-बुढ़ापे का; दुःखैः-दुखों से; विमुक्तः-से मुक्त; अमृतम्-दुराचार; अश्नुते–प्राप्त है।

 

 जब कोई देहधारी जीव इस शरीर की उत्पत्ति के कारण या इस देह को उत्पन्न करने वाले प्रकृति के इन तीनों गुणों को पार कर जाता है तब वह जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा सभी प्रकार के दुखों और कष्टों से मुक्त होकर इसी जीवन में परम आनन्द स्वरूप अमृत का भोग करता है अर्थात जब कोई देहधारी इस शरीर से संबद्ध प्राकृतिक शक्ति के तीन गुणों से गुणातीत होकर या इनका अतिक्रमण कर के जन्म, मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था और दुखों से मुक्त हो जाता है तथा अमरता प्राप्त कर लेता है।।14.20।।

 

अर्जुन उवाच

कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।

किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते।।14.21।।

 

अर्जुन उवाच-अर्जुन ने कहा; कै:-किन; लिङ्गै-लक्षणों से; त्रीन्–तीनों; गुणान्–प्रकृति के तीन गुणों को; एतान् – ये; अतीत:-गुणातीत; भवति है; प्रभो-परम प्रभुः किम्-क्या; आचार:-आचरण; कथम्-कैसे; च-भी; एतान्ये-; त्रीन् – तीनों; गुणान् – गुणों को; अतिवर्तते-पार करना।

 

अर्जुन ने पूछा-हे प्रभो ! वे मनुष्य जो प्रकृति के इन तीनों गुणों से परे हो जाते हैं उनके लक्षण क्या हैं? अर्थात प्रकृति के इन तीनों गुणों को पार किया हुआ मनुष्य किन लक्षणों से युक्त होता है? वे किस प्रकार के आचरण वाले होते हैं ? अर्थात उनके आचरण कैसे होते हैं? और वे किस प्रकार से या किन उपायों से प्रकृति के इन तीन गुणों के बंधन को पार कर पाते हैं या ?14.21

 

श्री भगवानुवाच

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।।14.22।।

 

श्रीभगवान् उवाच-परम प्रभु ने कहा; प्रकाशम् – प्रकाश; च- तथा ; प्रवृत्तिम्-कार्य रूप; च-तथा; मोहम्-मोह; एव-भी; च-और; पाण्डव-पाण्डुपुत्र, अर्जुनः नद्वेष्टि-घृणा नहीं करता; सम्प्रवृत्तानि-जब प्रकट होते हैं; ननिवृत्तानि-न रुकने पर जब अप्रकट होते हैं; काङ्क्षति- आकांक्षा करना;

 

श्री भगवान ने कहा – जो मनुष्य ईश्वरीय ज्ञान रूपी प्रकाश (सतोगुण) तथा कर्म करने में आसक्ति (रजोगुण) और मोह रूपी अज्ञान (तमोगुण) के बढ़ने पर कभी भी उनसे घृणा नहीं करता है तथा इनका अभाव होने पर न ही उनकी इच्छा ही करता है अर्थात प्रकृति के इन तीनों गुणों से गुणातीत हुआ या इन तीनों गुणों को पार किया हुआ मनुष्य न तो प्रकाश ( सत्वगुण से उत्पन्न ) , न ही कर्म ( रजोगुण से उत्पन्न ) और न ही मोह ( तमोगुण से उत्पन्न ) की अधिकता होने पर इनसे घृणा करते हैं और न ही इनके अभाव में इनकी लालसा करते हैं।।14.22।।

 

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।

गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते।।14.23।।

 

उदासीनवत्-तटस्थ; आसीनः-स्थित; गुणैः-प्राकृत शक्ति के गुणों द्वारा; य:-जो; न – कभी नहीं; विचाल्यते – विक्षुब्ध होना; गुणा:-प्राकृतिक गुण; वर्तन्ते-कर्म करना ; इत्येव -इस प्रकार जानते हुए; यः-जो; अवतिष्ठति-आत्म स्थित है; न – कभी नहीं; इङ्गते–विचलित;

 

जो उदासीन भाव में स्थित रहकर किसी भी गुण के आने-जाने से या गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता है और गुणों को ही कार्य करते हुए जानकर एक ही भाव में स्थिर रहता है अर्थात केवल ” गुण ही क्रियाशील हैं ” या “गुण ही व्यवहार करते हैं” इस भावसे जो अपने स्वरूप में ही आत्म स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता या उस स्थिति से विचलित नहीं होता।।14.23।।

 

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।14.24।।

 

सम-समान; दुःख-दुख; सुखः-तथा सुख में; स्व स्थ:-आत्मा में स्थित; सम-एक समान; लोष्ट-मिट्टी; अश्म-पत्थर; काञ्चनः-सोना; तुल्य-समान; प्रिय-सुखद; अप्रियः-दुखद; धीरः-दृढ़तुल्य-समान; निन्दा-बुराई; आत्म-संस्तुतिः-तथा अपनी प्रशंसा में;

 

 जो धीर मनुष्य सुख और दुख में समान भाव में तथा अपने आत्म-भाव या आत्म स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को एक समान समझता है; जिसके लिये न तो कोई प्रिय होता है और न ही कोई अप्रिय होता है तथा जो निन्दा और स्तुति में अपना धीरज नहीं खोता है अर्थात जो धीर मनुष्य सुख-दुःख में सम तथा अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में एक समान दृष्टि रखता है जो प्रिय-अप्रिय में तथा अपनी निन्दा-स्तुति में सम रहता है; वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।।14.24।।

 

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते।।14.25।।

 

मान-सम्मान; अपमानयो:-तथा अपमान में; तुल्य:-समान; मित्र-मित्र; अरि-शत्रु; पक्षयोः-पक्षों को; सर्व-सबों का; आरम्भ-परिश्रम; परित्यागी-त्याग करने वाला; गुण-अतीत-प्रकृति के गुणों से ऊपर उठने वाला; सः-वह; उच्यते-कहा जाता है ।

 

जो धीर मनुष्य अपने मान अपमान में सम अर्थात चाहे उसका सम्मान हो या अपमान वह दोनों ही परिस्थितियों में समान रूप से व्यवहार करता है – अपने मान और अपमान को एक समान समझता है , जो मित्र और शत्रु के पक्ष में समान भाव में रहता है अर्थात जो अपने मित्रों और शत्रुओं के साथ एक समान व्यवहार करता है तथा जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है या जिसमें सभी कर्मों के करते हुए भी कर्तापन का भाव नहीं होता है ऐसे मनुष्य को प्रकृति के गुणों से अतीत अर्थात गुणातीत या गुणों से ऊपर उठने वाला कहा जाता है या गुणों को पार करने वाला कहा गया है । 14.25

 

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।

स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ 14.26

 

माम् – मेरी; च-भी; यः-जो; अव्यभिचारेण-विशुद्ध विकारों के; भक्ति-भक्ति योग से; सेवते-सेवा करता है; स:-वह; गुणान् – प्रकृति के गुणों को; समतीत्य-पार कर; एतान्- इन सब; ब्रह्मभूयाय-ब्रह्म पद की अवस्था; कल्पते-हो जाता है।

 

जो धीर मनुष्य विशुद्ध भक्ति के साथ मेरी सेवा और उपासना करते हैं, वे प्राकृतिक शक्ति के तीनों गुणों से ऊपर उठ कर ब्रह्म पद के स्तर को पा लेते हैं या ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है अर्थात जो मनुष्य हर परिस्थिति में बिना विचलित हुए अनन्य-भाव से मेरी भक्ति में स्थिर रहता है, वह भक्त प्रकृति के तीनों गुणों को अति-शीघ्र पार करके ब्रह्म-पद पर स्थित हो जाता है।।14.26।।

 

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।

शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।।14.27।।

 

ब्रह्मणः-निराकर ब्रह्म का; हि-केवल; प्रतिष्ठा-आधार; अहम्-मैं हूँ; अमृतस्य-अमरता का; अव्ययस्य-अविनाशी का; च-भी; शाश्वतस्य-शाश्वत का; च-तथा; धर्मस्य–परम धर्म; सुखस्य-सुख का; ऐकान्तिकस्य-चरम, असीम; च-भी।

 

उस अविनाशी निराकार ब्रह्म-पद का एकमात्र आधार और आश्रय मैं ही हूँ जो अमृत स्वरूप, शाश्वत स्वरूप, धर्म स्वरूप और परम असीम दिव्य आनन्द स्वरूप भी है ।।14.27।।

 

 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीता श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्राकृतिकगुणविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः॥

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में प्राकृतिक गुण विभाग-योग नाम का चौदहवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ ॥

 

 

 

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