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Bheeshm Stuti in Hindi with meaning

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Bheeshm Stuti in Hindi with Meaning

 

 

 

श्री भीष्म पितामह जी ने अंत समय में भगवान श्री कृष्ण की अद्भुत स्तुति की है। इस स्तुति को ह्रदय से पढ़ने या सुनने और याद करके अपने जीवन में उतारने से भक्त के ह्रदय में भगवान श्रीकृष्ण विराजमान रहेंगे। श्रीमदभागवत स्कंद-१, अध्याय-९ की इस अद्भुत भगवत स्तुति के ये ग्यारह श्लोक हमें आनंदित कर देते हैं।

 

इस अद्भुत स्तुति में इति, मति, रति और गति की प्रमुखता है।

 

भीष्म पितामह जी की स्तुति में ४ (चार) चीजें प्रमुख हैं।

१) इति

२) मति (बुद्धि)

३) रति (प्रेम)

४) गति।

 

भीष्म पितामह का तात्पर्य है-

 

इति अर्थात यह मेरी अंतिम स्तुति है।

 

मति अर्थात मेरी सीमित बुद्धि के अनुसार है।

 

रति अर्थात मुझे मात्र आपसे ही प्रेम है।

 

तथा मेरी गति भी आप में ही हो।

 

ऐसी मेरी प्रार्थना स्वीकार करें।

 

इति

यह स्तुति ‘इति’ से शुरू होती है। जिसका अर्थ होता हैं अंत। मानो भीष्म पितामह जी कहते हैं कि हे प्रभु ! अब तक मेरी स्तुतियां पूरी थीं या नही थी वो आप जानो लेकिन यह मेरी अंतिम स्तुति हैं। इसके बाद मैं आपकी स्तुति नहीं कर पाऊँगा।

 

मति 

मेरी बेटी मति (बुद्धि) है, जिसका विवाह आपसे करना चाहता हूं।

भीष्म पितामह जी ने कहा कि मेरी एक बेटी है। मैं चाहता हूँ कि उसका विवाह आपके साथ हो। श्री कृष्ण कहते हैं- बाबा! मैंने तो सुना था आप आजीवन ब्रह्मचारी रहे हैं। फिर आपकी बेटी कहाँ से आ गई? भीष्म जी कहते हैं कि कान्हा! मेरी बेटी ओर कोई नहीं बल्कि मेरी बुद्धि है। आप उससे विवाह कर लो। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरी ये बेटी और किसी के साथ ब्याही जाये। आपके चरणों में मेरी मति (बुद्धि) समर्पित है।

 

रति

भीष्म जी कहते हैं- “प्रभु मेरी अगर कहीं रति (प्रेम) हो तो केवल और केवल आप में हो। क्योंकि केवल आपसे ही प्रेम सार्थक हैं। इसे सादर स्वीकारें प्रभु!”

 

गति

अंत में भीष्म पितामह जी कहते हैं- “प्रभु! मेरी गति भी आप में ही होनी चाहिए। मेरा अंत समय हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ की आपके श्री चरणों में मेरी गति हो जाये। आप ही एकमात्र मेरे आश्रय हैं।

और जो इन तीनों(इति, मति और रति) आपको सौंप देगा । मैं जानता हूँ कि हे प्रभु! आप उसकी सद्गति ही करेंगे।”

 

 

bheeshm dvara shri krishna ki stuti

 

 

१) इति मति रुपकल्पितावितृष्णा

भगवति सात्वत पुङ्गवे विभूम्नि ।

स्व सुख मुपगते क्वचिद्विहर्तुं

प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः॥ ३२॥

 

भीष्म पितामह कहते हैं-

अब मृत्यु के समय मैं अपनी यह बुद्धि, जो अनेक प्रकार के साधनों का अनुष्ठान करने से अत्यन्त शुद्ध एवं कामनारहित हो गयी है, यदुवंश शिरोमणि अनन्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित करता हूँ, जो सदा-सर्वदा अपने आनन्दमय स्वरूप में स्थित रहते हुए ही कहीं विहार करने की – लीला करने की इच्छा से प्रकृति को स्वीकार कर लेते हैं, जिससे यह सृष्टि परम्परा चलती है।

 

२)त्रिभुवन कमनं तमाल वर्णं

रवि कर गौर वराम्बरं दधाने ।

वपुरलक कुलावृताननाब्जं

विजयसखे रति रस्तु मेऽनवद्या ॥ ३३॥

 

प्रभु! आप त्रिभुवन-सुन्दर हैं , तीनों लोकों में आपसे सुंदर कोई नहीं हैं। और आपका शरीर तमाल के वृक्ष के समान सांवला है, जिस पर सूर्य रश्मियों के समान श्रेष्ठ पीताम्बर लहराता रहता है और कमल-सदृश मुख पर घुँघराली अलकें लटकती रहती हैं उन अर्जुन-सखा श्रीकृष्ण में मेरी निष्कपट प्रीति हो।

 

 ३) युधि तुर गर जोवि धूम्र विष्वक्क

चलुलित श्रम वार्य लंकृतास्ये ।

मम निशित शरैर्विभिद्य मानत्वचि

 विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥ ३४॥

 

मुझे युद्ध के समय की उनकी वह विलक्षण छबि याद आती है। उनके मुख पर लहराते हुए घुन्घ्राले बाल घोंड़ो की टाप की धूल से मटमैले हो गये थे और पसीने की छोटी-छोटी बूँदें शोभायमान हो रही थीं। मैं अपने तीखे बाणों से उनकी त्वचा को बींध रहा था। उन सुन्दर कवच मण्डित भगवान श्रीकृष्ण के प्रति मेरा शरीर, अन्तःकरण और आत्मा समर्पित हो जाये।

 

४) सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये

निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य ।

स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा

हृतवति पार्थ सखे रतिर्ममास्तु ॥ ३५॥

 

अपने मित्र अर्जुन की बात सुनकर, जो तुरंत ही पाण्डव-सेना और कौरव-सेना के बीच में अपना रथ ले आये और वहाँ स्थित होकर जिन्होंने अपनी दृष्टि से ही शत्रुपक्ष के सैनिकों की आयु छीन ली, उन पार्थ सखा भगवान श्रीकृष्ण में मेरी परम प्रीति हो।

 

५) व्यवहित पृथनामुखं निरीक्ष्य

स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या।

कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरण

रतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥ ३६॥

 

अर्जुन ने जब दूर से कौरवों की सेना के मुखिया हम लोगों को देखा तब पाप समझकर वह अपने स्वजनों के वध से विमुख हो गया। उस समय जिन्होंने गीता के रूप में आत्माविद्या का उपदेश करके उसके सामयिक अज्ञान का नाश कर दिया, उन परमपुरुष भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रीति बनी रहे ।

 

६) स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा

मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः ।

धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलत्गुः

हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ३७॥

 

मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी कि मैं श्रीकृष्ण को शस्त्र ग्रहण कराकर छोडूँगा; उसे सत्य एवं ऊँची करने के लिये उन्होंने अपनी शस्त्र ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा तोड़ दी। उस समय वे रथ से नीचे कूद पड़े और सिंह जैसे हाथी को मारने के लिये उस पर टूट पड़ता है, वैसे ही रथ का पहिया लेकर मुझ पर झपट पड़े। उस समय वे इतने वेग से दौड़े कि उनके कंधे का दुपट्टा गिर गया और पृथ्वी काँपने लगी।

 

७) शितविशिखहतोविशीर्णदंशः

क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।

प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स

भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥ ३८॥

 

मुझ आततायी ने तीखे बाण मार-मारकर उनके शरीर का कवच तोड़ डाला था, जिससे उनका सारा शरीर लहुलुहान हो रहा था। अर्जुन के रोकने पर भी वे बलपूर्वक मुझे मारने के लिये मेरी ओर दौड़े आ रहे थे। वे ही भगवान श्रीकृष्ण, जो ऐसा करते हुए भी मेरे प्रति अनुग्रह और भक्तवत्सलता से परिपूर्ण थे, मेरी एकमात्र गति हों – आश्रय हों।

 

 ८) विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे

धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये।

भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षोः यमिह

निरीक्ष्य हताः गताः सरूपम् ॥ ३९॥

 

अर्जुन के रथ की रक्षा में सावधान जिन श्रीकृष्ण के बायें हाथ में घोडों की रास थी और दाहिने हाथ में चाबुक, इन दोनों की शोभा से उस समय जिनकी अपूर्व छवि बन गयी थी तथा महाभारत युद्ध में मरने वाले वीर जिनकी इस छवि का दर्शन करते रहने के कारण सारुप्य मोक्ष को प्राप्त हो गये, उन्हीं पार्थ सारथि भगवान श्रीकृष्ण में मुझ मरणासन्न की परम प्रीति हो।

 

९) ललित गति विलास वल्गुहास

प्रणय निरीक्षण कल्पितोरुमानाः।

कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृति

मगन् किल यस्य गोपवध्वः ॥ ४०॥

 

जिनकी लटकीली सुन्दर चाल, हाव-भाव युक्त चेष्टाएँ, मधुर मुसकान और प्रेम भरी चितवन से अत्यन्त सम्मानित गोपियाँ रासलीला में उनके अन्तर्धान हो जाने पर प्रेमोन्माद से मतवाली होकर जिनकी लीलाओं का अनुकरण करके तन्मय हो गयी थीं, उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण में मेरा परम प्रेम हो ।

 

१०) मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्तः

सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् ।

अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशि

गोचर एष आविरात्मा ॥ ४१॥

 

जिस समय युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ हो रहा था, मुनियों और बड़े-बड़े राजाओं से भरी हुई सभा में सबसे पहले सबकी ओर से इन्हीं सबके दर्शनीय भगवान श्रीकृष्ण की मेरी आँखों के सामने पूजा हुई थी; वे ही सबके आत्मा प्रभु आज इस मृत्यु के समय मेरे सामने खड़े हैं।

 

११) तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि

हृदि धिष्टितमात्मकल्पितानाम् ।

 प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधि

गतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥ ४२॥

 

जैसे एक ही सूर्य अनेक आँखों से अनेक रूपों में दिखते हैं, वैसे ही अजन्मा भगवान श्रीकृष्ण अपने ही द्वारा रहित अनेक शरीरधारियों के हृदय में अनेक रूप-से जान पड़ते हैं। वास्तव में तो वे एक और सबके हृदय में विराजमान हैं ही। उन्हीं इन भगवान श्रीकृष्ण को मैं भेद-भ्रम से रहित होकर प्राप्त हो गया हूँ।

 

प्रार्थना पूर्ण होते ही भीष्म पितामह कृष्ण स्वरूप में स्थित हो जाते हैं।

 

इस प्रकार भीष्म पितामह ने मन, वाणी और दृष्टि की वृत्तियों से आत्म स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण में अपने-आपको लीन कर दिया। उनके प्राण वहीं पर विलीन हो गये और वे शान्त हो गये । उन्हें अनन्त ब्रह्म में लीन जानकर सब लोग वैसे ही चुप गये, जैसे दिन बीत जाने पर पक्षियों का कलरव शान्त हो जाता है । उस समय देवता और मनुष्य नगाड़े बजाने लगे। साधु स्वभाव के राजा उनकी प्रशंसा करने लगे और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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