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Krishnashtakam by Shankaracharya 

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krishnashtakam by shankaracharya

 

 

कृष्णष्टकम आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा लिखा गया है जिस में उन्होंने श्री कृष्ण को जगत का अधिपति , हर जीव की अंतिम शरण स्थली अर्थात अंतिम लक्ष्य बताया है । वे कहते हैं कि श्री कृष्ण उनकी आँखों की विषय वस्तु बनें अर्थात उनकी दृष्टि में सदा श्री कृष्ण ही समाये रहें। अंतिम श्वास में भी वे श्री कृष्ण का ही दर्शन करें । उनकी आँखें सदा श्री कृष्ण को ही देखें। श्री शंकराचार्य जी ने अपनी इस अद्भुत कृति में श्री कृष्ण की महिमा का अत्यंत सुन्दर वर्णन किया है । 

 

 

श्रियाश्लिष्टो विष्णुः स्थिरचरगुरुर्वेदविषयो 

धियां साक्षी शुद्धो हरिरसुरहन्ताऽब्जनयनः ।

गदी शङ्खी चक्री विमलवनमाली स्थिररुचिः 

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ १ ॥

 

shriyashlishto vishuh sthirachargururvedvishayo

dhiyaam saakshi shuddho harirsurhanta’bjanayanah 

gadi shankhi chakri vimalvanmali sthirruchih

sharanyo lokesho mam bhavatu krishno’kshivishyah 1 .

 

कृष्ण जो लक्ष्मी से आलिंगनबद्ध हैं, सर्वव्यापी हैं, सभी चेतन और अचेतन प्राणियों के गुरु हैं, वैदिक कथनों के माध्यम से जाने जाते हैं, सभी प्रकार के ज्ञान के साक्षी हैं, शुद्ध, हरि, राक्षसों और असुरों के हत्यारे, कमल के समान आंखों वाले और शुद्ध सुगन्धित वनमाला से सुशोभित गदा, शंख और चक्र धारण करने वाले , शाश्वत तेज, अंतिम शरण, लोकों के स्वामी – मेरी दृष्टि का विषय बनें।।1।।

 

Let Krishna who is embraced by Lakshami is all pervasive, is the Guru for all sentient and non sentient beings is known through vedic statements is the witness of all knowledge , pure, Hari, the killer of demons and Asuras, lotus eyed and the possesser of Gada , conch and chakra adorned with pure fragrant vanamala ,is the eternal effulgence, the final refuge, the lord of the worlds – become the object of my vision.1

 

यतः सर्वं जातं वियदनिलमुख्यं जगदिदं 

स्थितौ निःशेषं योऽवति निजसुखांशेन मधुहा ।

लये सर्वं स्वस्मिन्हरति कलया यस्तु स विभुः 

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ २ ॥

 

yatah sarvam jatam viyadnilmukhyam jagdidam

sthitau nihshesham yo’vati nijsukhaamshen madhuha 

laye sarvam svasminharati kalayaa yastu sa vibhuh

sharanyo lokesho mam bhavatu krishno’kshivishyah. 2 

 

कृष्ण, जिनसे आकाश, वायु और अन्य (तत्व) उत्पन्न हुए हैं और जो अपने आंशिक अवतार के माध्यम से पोषण या निर्वाह के समय (संसार) की रक्षा करते हैं और जो प्रलय के समय सब कुछ वापस ले लेते हैं,  सर्वव्यापी, अंतिम शरण, सभी लोकों के स्वामी  – मेरी दृष्टि का विषय बनें।।2।।

 

Let Krishna from whom the ether, wind and others (elements) originated and who protects it ( the world) during sustenance through His partial incarnation and who sportively withdraws everything into Him during deluge , the omnipresent , the final refuge , the lord of the worlds – be the object of my vision.2

 

असूनायम्यादौ यमनियममुख्यैः सुकरणै-

र्निरुद्ध्येदं चित्तं हृदि विलयमानीय सकलम् ।

यमीड्यं पश्यन्ति प्रवरमतयो मायिनमसौ

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ३ ॥

 

asoonyamyaadau yamniyammukhyaih sukaranair-

niruddhyedam chittam hridi vilayamaaniya sakalam ;

yameedyam pashyanti pravarmatyo maayinamsau

sharanyo lokesho mam bhavatu krishno’kshivishyah. 3 .

 

कृष्ण जो अविद्या और अज्ञान के प्रशंसनीय नियंत्रक हैं , जिन्हें बुद्धिमान पुरुष अपनी महत्वपूर्ण वायु को नियंत्रित करने के बाद (यम और नियम के योगिक तरीके से ) आंतरिक और बाहरी इंद्रियों को नियंत्रित करके और अपने दिमाग को नियंत्रण में रखते हुए सांसारिक विचारों को भंग करने के बाद अपने ह्रदय के भीतर देखते हैं, ऐसे अंतिम शरण, जगत पति  – मेरी दृष्टि के विषय बनें ।।3।।

 

Let Krishna the praiseworthy controller of neiscience , whom the wise men visualize within after controlling their vital airs first ( the Yogic methods of yama and niyama ) by controlling of inner and exterior senses and also by having their mind under control thus dissolving the thoughts of worldly existence , the final refuge , the Lord of the world – Be object of my vision .3

 

पृथिव्यां तिष्ठन्यो यमयति महीं वेद न धरा

यमित्यादौ वेदो वदति जगतामीशममलम् ।

नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ४ ॥

 

prithivyaam tishthanyo yamyati maheem ved na dhara

yamityaadau vedo vadati jagataameeshmamlam ;

niyantaaram dhyeyam munisuranrinaam mokshadamsau

sharanyo lokesho mam bhavatu krishno’kshivishyah . 4 

 

कृष्ण जो इस पृथ्वी पर निवास करते हुए इसे नियंत्रित करते हैं , परन्तु यह सत्य पृथ्वी देवी और पृथ्वी के निवासियों द्वारा भी नहीं जाना जाता है, जिन्हें वेदों द्वारा ब्रह्मांड के स्वामी , दोषरहित, नियंत्रक, ध्यान के योग्य कहा जाता है। ऐसे मनुष्यों , देवताओं  और ऋषियों के मुक्तिदाता, अंतिम शरण, सर्व लोकों के स्वामी – मेरी दृष्टि का विषय बनें।।4।।

 

Let Krishna – who residing on this earth controls it but it is not known by Goddesss Earth and also by the dwellers of the Earth , Who is said by the Vedas to be the Lord of the Universe , blemishless, controller, one fit to be meditated upon and the liberator of humans, demi gods and the sages , the final refuge, the Lord of the worlds- Be the object of my vision.4

 

महेन्द्रादिर्देवो जयति दितिजान्यस्य बलतो

न कस्य स्वातन्त्र्यं क्वचिदपि कृतौ यत्कृतिमृते ।

बलारातेर्गर्वं परिहरति योऽसौ विजयिनः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ५ ॥

 

mahendraadirdevo jayati ditijaanyasya balato

na kasya svaatantryam kvachidapi kritau yatkritimṛite ;

balaaraatergarvam pariharati yo’sau vijayinaḥ

sharanyo lokesho mam bhavatu krishno’kshivishayah . 5 

 

कृष्ण – जिनकी शक्तियों से देवों के स्वामी इंद्र और अन्य अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं, जिनके संकल्प के बिना कोई भी स्वतंत्र रूप से कोई कार्य नहीं कर रहा है और जो विजयी के अभिमान को दूर कर देते हैं – वे कृष्ण जो अंतिम शरण हैं , सर्व लोकों के स्वामी हैं  – मेरी दृष्टि का विषय बनें।।5।।

 

Let Krishna – by whose powers the Lord of Devas , Indra and others win over their enemies , without whose resolve none is independently performing any action and one who draws away the pride of the victorious ,the final refuge, the Lord of the worlds- Be the object of my vision.5

 

विना यस्य ध्यानं व्रजति पशुतां सूकरमुखां

विना यस्य ज्ञानं जनिमृतिभयं याति जनता ।

विना यस्य स्मृत्या कृमिशतजनिं याति स विभुः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ६ ॥

 

vina yasya dhyanam vrajati pashutaam sookarmukhaam

vina yasya gyanam janimritibhayam yaati janta ;

vina yasya smritya krimishatjanim yaati sa vibhuḥ

sharanyo lokesho mam bhavatu krishno’kshivishyaḥ . 6 

 

कृष्ण- जिनका चिंतन मनन किये बिना मनुष्य सुअरों और अन्यों के गर्भ को प्राप्त करता है और जिनके विषय में ज्ञान प्राप्त किये बिना लोग जन्म-मृत्यु के भय से जकड़े हुए हैं और जिनकी स्मृति के बिना मनुष्य कृमियों और कीड़ों के रूप में असंख्य जन्म प्राप्त करता है, जो अंतिम शरणस्थली है ऐसे लोकों के स्वामी – मेरी आँखों के दर्शन बनें ।।6।।

 

Let Krishna – without contemplating on whom man attains the womb of pigs and others and without the knowledge of whom people are grasped by the fear of birth and death and without the memory of whom one attains innumerable lives of worms and insects , the final refuge , the lord of the worlds, – Be the vision of my eyes.6

 

नरातङ्कोट्टङ्कः शरणशरणो भ्रान्तिहरणो

घनश्यामो वामो व्रजशिशुवयस्योऽर्जुनसखः ।

स्वयम्भूर्भूतानां जनक उचिताचारसुखदः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ७ ॥

 

naratankottankah sharansharno bhrantiharno

ghanshyamo vaamo vrajshishuvayasyo’ arjunsakhah ;

svayambhurbhootanaam janak uchitachaarsukhdah

sharanyo lokesho mam bhavatu krishno’kshivishayah . 7 

 

कृष्ण – जो प्राणियों के भय को दूर करते हैं, जो शरणार्थियों की शरण हैं, भ्रम को दूर करने वाले, बादलों के समान सांवले , आकर्षक, जो व्रज के लड़कों और अर्जुन के मित्र हैं, स्वयं प्रकट, सृष्टि के निर्माता,  उचित कर्म करने वालों के लिए सुख के दाता हैं, सबकी अंतिम शरण स्थली  , लोकों के स्वामी- मेरी आंखों के दर्शन बनें ।।7।।

 

Let Krishna – who removes the fear of beings, who is refuge of refugees , the remover of illusions , dark as clouds, charming, who is friend of Vraja Lads and of Arjuna, the self manifested , the creater of creations , the bestower of happiness to the performers of the appropriate deeds, the final refuge, the lord of the worlds- Be the vision of my eyes.7

 

यदा धर्मग्लानिर्भवति जगतां क्षोभकरणी

तदा लोकस्वामी प्रकटितवपुः सेतुधृदजः ।

सतां धाता स्वच्छो निगमगणगीतो व्रजपतिः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ८ ॥

 

yada dharmglaanirbhavati jagtaam kshobhkarni

tada loksvami prakatitvapuh setudhridjah ;

sataam dhaata svaccho nigamgangeeto vrajpatih

sharanyo lokesho mam bhavatu krishno’kshivishayah . 8 

 

कृष्ण – जो ब्रह्मांड के स्वामी हैं , जो उस समय संसार के संतुलन की रक्षा के लिए अपना रूप प्रकट करते हैं , जब धर्म त्रस्त हो कर अशांति पैदा करता है, धार्मिकों के अजन्मा रक्षक, वेदों द्वारा निर्मल , शुद्ध और व्रज के स्वामी के रूप में वर्णित है। जो अन्तिम शरण  स्थली हैं , सभी लोकों के स्वामी- मेरे नेत्रों के दर्शन बनें ।।8।।

 

Let Krishna – the Lord of universe who manifests His form to protect the balance of the world during the time when dharma is troubled causing turbulances, unborn protector of the virtuous, described by the vedas to be immaculate ( pure ) and Lord of Vraja , the final refuge, the lord of the worlds- Be the vision of my eyes.8

 

 

॥ कृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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