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Vishnu Sahasranama Hindi Lyrics & meaning

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vishnu sahasranam hindi lyrics

 

 

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् 

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥1।।

 

आप चन्द्रमा जैसे श्वेत रंग में रंगे हुए हैं और उसी रंग में आपकी आभा चमक रही है। आप अन्तर्यामी हैं एवं चार भुजाओं वाले हैं। मैं आपके सदा मुस्कुराने वाले चेहरे पर ध्यान लगा रहा हूँ और प्रार्थना कर रहा हूँ की मेरे पथ की सारी समस्याएँ दूर हो जाएँ।।1।।

 

यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम्

विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये

 

बहुत सारे सेवकों वाले हाथी समान चेहरे वाले विश्वक्सेना हमारे सभी कष्ट दूर करेंगे अगर हम उन पर पूरी तरह समर्पित हो जाएंगे।।2।।

 

व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम्

पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम्

 

मैं व्यास को प्रणाम करता हूँ जो तपस्या की मूर्ति हैं, वसिष्ठ ऋषि के परपोते हैं। शक्ति के पोते हैं। पराशर के पुत्र हैं। और शुक के पिता है।।3।।

 

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे

नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः

 

व्यास ही विष्णु हैं और विष्णु ही व्यास हैं और मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। वो जो वशिष्ठ के परिवार में जन्मा है उसे मेरा बारम्बार प्रणाम है।।4

 

अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने

सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे

 

 वो जो पवित्र है, जो परम है, जो सदा सत्य है जो संसार की सब नश्वर वस्तुओं से ऊपर है उस विष्णु को मेरा प्रणाम है।।5।।

 

यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्

विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे

 

मैं उस सर्वशक्तिमान विष्णु को प्रणाम करता हूँ जिसके बारे में सिर्फ एक बार सोचने से ही जन्म और मृत्यु  बंधन कट जाते हैं। उस सर्वशक्तिमान विष्णु को बारम्बार प्रणाम है। जिनके सुमिरन मात्र से जीव जन्म और मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है । जो सर्वव्यापी और सर्वसमर्थ हैं उन भगवान विष्णु को नमस्कार है।।6।।

 

सच्चिदानंद रूपाय कृष्णायाक्लिष्टकारिणे।

नमो वेदांत वेद्याय गुरवे बुद्धि साक्षिणे ।।7।।

 

सच्चिदानंद स्वरूप , अनन्यास ही सब कर्म करने वाले , वेदांत वेद्य, बुद्धि साक्षी गुरुवार श्री कृष्ण चंद्र को नमस्कार है ।।7।।

 

कृष्ण द्वैपायनम व्यासं सर्वलोकहिते रतं।

वेदाब्ज भास्करं वंदे शमादि निलयं मुनिं।।8।।

 

वेदरूपी कमल के लिए सूर्यरूप , शाम आदि के आश्रय , सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर मुनिवर कृष्ण द्वैपायन व्यास की मैं वंदना करता हूँ ।।8।।

 

सहस्रमूर्तेः पुरुषोत्तमस्य सहस्रनेत्रानन पाद बाहोः।

सहस्रनाम्नां स्तवनं प्रशस्तं निरुच्यते जन्म जरा दिशान्तयै।।9।।

 

सहस्र नेत्र , मुख , पाद और भुजाओं वाले सहस्रमूर्ति श्री पुरुषोत्तम भगवन के सहस्र नामों के इस परम उत्तम स्तवन की , जन्म – जरा आदि की शांति के लिए व्याख्या की जाती है । 

 

 

 

 

 

 

ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे ।

 

 श्रीवैशम्पायन उवाच –

 

श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि सर्वशः

युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत

 

श्री वैशम्पायन ने कहा कि राजा युधिष्ठिर ने अभ्युदय और निःश्रेयस कि प्राप्ति के लिए भूत सम्पूर्ण विधिरूप धर्म तथा पवित्र अर्थात पापों का नाश करने वाले धर्म रहस्यों को सर्वशः सब प्रकार सुन कर और यह समझकर कि अभी तक ऐसा कोई धर्म नहीं कहा गया जो सकल पुरुषार्थ का साधक और अल्प प्रयास से ही सिद्ध होने वाला होकर भी महान फलवाला हो शांतनु के पुत्र भीष्म से फिर पूछा ।। 7

 

युधिष्ठिर उवाच —

 

किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्

स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्

 

युधिष्ठर ने पूछा– इस सृष्टि में सभी फलों के दाता, समस्त विद्याओं के स्थान प्रकाश के हेतु स्वरूप लोक में एक ही सर्वपूज्य देव कौन हैं ?जिसके विषय में कहा है कि जिस की आज्ञा से सब प्राणी प्रवृत्त होते हैं अथवा प्राप्त करने योग्य सर्वोत्तम, एक ही परायण कौन हैं ?जिसका साक्षात्कार कर लेने पर सब संशय नष्ट हो जाते हैं तथा संपूर्ण कर्म क्षीण हो जाते हैं । जिस कार्य कारण रूप परमात्मा को ज्ञान दृष्टि से देख लेने पर जीव कि अविद्यारूप हृदय ग्रंथि टूट जाती है । जिसके ज्ञान मात्र से ही आनंद स्वरूप मोक्ष प्राप्त होता है । जिसका जानने वाला किसी से भय नहीं करता । जिसमें प्रवेश करने वाले का फिर जन्म नहीं होता। जिसको जान लेने पर जो ब्रह्म को जनता है वो ब्रह्म ही हो जाता है । मनुष्य वही हो जाता है तथा जिसे छोड़कर मनुष्यों के लिए मोक्ष प्राप्त करने के लिए कोई दूसरा मार्ग नहीं है । इस प्रकार जो लोक में एक ही परायण बतलाया गया है वह कौन है ? किसकी वंदना और पूजा से जीव इहलोक और परलोक में श्रेष्ठ फल पाता है ? कौन से देव की स्तुति , गुण कीर्तन करने से तथा किस देव का नाना प्रकार से अर्चन और आंतरिक पूजा करने से मनुष्य शुभ अर्थात स्वर्गादि फलरूप कल्याण की प्राप्ति कर सकते हैं।

 

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः

किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्

 

सभी धर्मो में कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है ? आप सब धर्मों – समस्त धर्मों में पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त किस धर्म को परम श्रेष्ठ मानते हैं? और किस जपनीय का उच्च उपांशु और मानस जप करते हुए जन्म धर्मा जीव जन्म- संसार बंधन से मुक्त हो जाता है ? जंतु शब्द से जप , अर्चन और स्तवन आदि में समस्त प्राणियों कि यथायोग्य अदिकार सूचित करते हैं । जन्म शब्द अज्ञान से प्रतीत होने वाले अविद्या के कार्यों को लक्षित करता है तथा संसार अविद्या ही का नाम है । उन जन्म और संसार का जो बंधन है उससे जीव कैसे छूटता है ? 

 

जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्

स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः १०

 

स्थावर जङ्गम रूप जो संसार है उस संसार के प्रभु , स्वामी , ब्रह्मादि देवों के देव , अनंत अर्थात देश काल और वस्तु से परे , कार्य कारण रूप क्षर और अक्षर से श्रेष्ठ पुरुषोत्तम का सहस्रनाम के द्वारा निरंतर तत्पर रहकर स्तवन ( स्तुति ) , गुण, संकीर्तन करने से पुरुष ( प्राणी ) सब दुखों से पार हो जाता है। पूर्ण होने से अथवा शरीर रूप पुर में शयन करने से जीव का नाम ‘ पुरुष ‘ है ।। 10

 

तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्

ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव ११

 

तथा उसी अव्यय विनाश क्रिया रहित पुरुष का नित्य अर्थात सब समय भजन अर्थात तत्परता का नाम भक्ति है । उस भक्ति से युक्त हो कर अर्चन अर्थात वाह्य पूजन करने से और उसी का ध्यान अर्थात आंतरिक पूजन तथा पूर्वोक्त प्रकार से अर्थात सहस्रनाम के द्वारा स्तवन एवं नमस्कार करने से अर्थात पूजा के शेष भूत स्तुति और नमस्कार करने से यजमान – पूजा करने वाला फल भोक्ता सब दुखों से छूट जाता है । वाह्य और आतंरिक दो प्रकार का अर्चन कहा है तथा ध्यान , स्तवन और नमन करते हुए मानसिक , वाचिक और कायिक पूजन बताया गया है ।।11

 

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्

लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखादिगो भवेत् १२

 

अनादिनिधन अर्थात [ होना , जन्म लेना , बढ़ना , बदलना , क्षीण होना और नष्ट होना ] इन छह विकारों से रहित , विष्णु अर्थात व्यापक तथा सम्पूर्ण लोकों के महेश्वर जो दिखलाई दे उस दृश्य वर्ग का नाम लोक है । उसके नियंता ब्रह्मादि के भी स्वामी होने से जो सर्व लोक महेश्वर और सारे दृश्य वर्ग को अपने अपने स्वाभाविक ज्ञान से साक्षात देखने के कारण लोकाध्यक्ष है उसी अव्यय ,अविनाशी विनाश क्रिया रहित पुरुष का निरंतर नित्य भक्ति से युक्त हो कर स्तुति , अर्चन ( वाह्य पूजन ) और उसी का ध्यान ( आतंरिक पूजन ) और सहस्रनाम के द्वारा स्तवन एवं नमस्कार करने से यजमान अर्थात पूजा करने वाला समस्त दुखों से पार हो जाता है। इस प्रकार यहाँ स्तवन , अर्चन और जप इन तीनों का एक ही फल बतलाया गया है । सम्पूर्ण दुःख अर्थात अर्थात दैहिक , दैविक और आध्यात्मिक आदि तीनों प्रकार के दुखों को पार कर जाता है यानि सर्वदुःखातीत हो जाता है ।  12

 

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम्

लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् १३

 

जो ब्रह्मण्य अर्थात जगत की रचना करने वाले ब्रह्मा के तथा ब्राह्मण , तप और श्रुति के हितकारी हैं , सभी धर्मों के ज्ञाता हैं , वह सभी लोकों में जीवन का पोषण करते  है, सर्वोच्च शासक, पूर्ण सत्ता, समस्त सृष्टि का कारण है ,  लोकों की या प्राणियों के यश को उनमें अपनी शक्ति से प्रविष्ट होकर बढ़ाते हैं , जो लोकनाथ अर्थात सभी लोकों के स्वामी हैं , सभी लोकों से प्रार्थित , लोकों को अनुतप्त या शासित करने वाले तथा उन पर सत्ता चलाने वाले हैं, उन पर प्रभुत्व रखने वाले हैं । जो अपने समस्त उत्कर्ष से वर्तमान होने के कारण महद अर्थात ब्रह्म महद्भूत अर्थात परमार्थ सत्य हैं और जिनकी सन्निधि मात्र से समस्त भूतों का उत्पत्ति स्थान संसार उत्पन्न होता है इसलिए जो समस्त भूतों के उद्भव स्थान हैं , उन परमेश्वर का स्तवन करने से मनुष्य सब दुखों से छूट जाता है।

 

एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः

यद्भक्त्या पुण्दरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा १४

 

सम्पूर्ण विधिवत धर्मों में मैं इसी धर्म को सबसे बड़ा मानता हूँ कि मनुष्य श्री पुण्डरीकाक्ष का अर्थात अपने ह्रदय कमल में विराजमान भगवान् वासुदेव का भक्तिपूर्वक तत्परता सहित गुण संकीर्तन , स्तुतियों से सदा अर्चन करे अर्थात आदरपूर्वक पूजन करे । तो यह निश्चित रूप से मोक्ष ( जीवन मरण चक्र से छुटकारा ) पाने का मार्ग है । इस प्रकार जो यह धर्म है यही मुझे सर्वाधिक मान्य है । 14

[ इस स्तुति रूप अर्चन की अधिक मान्यता का कारण क्या है ? इसका उत्तर है- हिंसा आदि पाप कर्म का अभाव तथा अन्य पुरुष एवं द्रव्य , देश और काल आदि के नियम की अनावश्यकता ही इसकी अधिक मान्यता का कारण है । अर्थात नाम जप और भगवान की पूजा अर्चना स्तुति जप के लिए किसी भी प्रकार के नियमों की आवश्यकता नहीं है , भक्त अपनी श्रद्धा , भक्ति और प्रेम के अनुसार प्रभु की अर्चना पूजा नाम जप कर सकता है । न ही इसमें किसी प्रकार की हिंसा या जीव बलि आदि की आवश्यकता है न ही कठोर नियमों के पालन की ।

विष्णुपुराण में कहा है कि सत्ययुग में ध्यान से , त्रेता में यज्ञ और अनुष्ठान से , द्वापर में पूजा करने से मनुष्य जो कुछ पाता था वह कलियुग में भगवन कृष्ण का नाम संकीर्तन करने से ही पा लेता है ।

मनु जी का कहना है कि इसमें संदेह नहीं कि ब्राह्मण अन्य कर्म करे या न करे वह केवल जप से ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लेता है । अतः ब्राह्मण ‘ मित्र ‘ अर्थात सबका मित्र कहलाता है । 

महाभारत में कहा गया है कि सम्पूर्ण धर्मों में जप सर्व श्रेष्ठ धर्म कहा जाता है क्योंकि जप यज्ञ प्राणियों कि हिंसा किये बिना ही संपन्न हो जाता है । 

भगवान का भी गीता में वचन है कि यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ ।

इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही भीष्म जी ने यह कहा है कि समस्त धर्मों में यही धर्म सबसे अधिक मान्य है ।]

 

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः

परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् १५

 

जो देव परम प्रकाशक या परम तेज , परम तप करने वाला यानि आज्ञा देने वाला है , जो इस लोक को , परलोक को और समस्त प्राणियों को उनके भीतर स्थित होकर शासित करता है। जो सत्यादि लक्षणों वाला परम ब्रह्म , और महत्ता युक्त होने के कारण महान है और जो पुनरावृत्ति कि शंका से रहित परम श्रेष्ठ परायण हैं वही समस्त प्राणियों की परम गति है । 15

[ जो सबका प्रकाशक , परम अर्थात उत्तम और महान – बृहत् चिन्मय प्रकाश है । जिसके विषय में ‘ जिस तेज से प्रकाशित होकर सूर्य तप्त है ‘ उसे देवगण ज्योति कहते हैं ‘ वहां न सूर्य का प्रकाश पहुँचता है और न चन्द्रमा या तारों का प्रकाश – श्रुतियों तथा स्मृतियों से यही प्रमाणित होता है ।

जो परम तप अर्थात तपने वाला यानि आज्ञा देने वाला है । जो इस लोक को , परलोक को तथा समस्त प्राणियों को उनके भीतर स्थित हो कर शासित करता है । इस श्रुति के द्वारा अंतर्यामी ब्राह्मण में उसको सबका नियामक कहा गया है ।

तैत्तरीय श्रुति में भी कहा गया है कि इसी के भय से वायु चलता है , इसी के भय से सूर्य उदित होता है तथा इसी के भय से अग्नि , इंदरा और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ।

तप्त है अथवा शासन करता है इसलिए वह तप है । उसका ऐश्वर्या अपरिमित है इस कारण वह महान है । श्रुति भी कहती है कि वह सर्वेश्वर है ।

जो सत्यादि लक्षणों वाला परब्रह्म तथा महत्ता युक्त होने के कारण महान है और जो पुनरावृत्ति कि शंका से रहित परम , श्रेष्ठ परायण या आश्रय है ।

जो देव परम तेज अर्थात सूर्य आदि तेज से भी तेज , परम तप , परम ब्रह्म और परम परायण है वही समस्त प्राणियों कि परम गति है ।

 

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां मङ्गलम्

दैवतं देवतानां भूतानां योऽव्ययः पिता १६

 

वह पवित्रों में सबसे अधिक पवित्र है अर्थात पवित्र करने वाले तीर्थादिकों में में पवित्र हैं , शुभों में सबसे अधिक शुभ , देवों में परम देव , जीवों में अव्यय पिता हैं ,अर्थात प्रत्येक जीवित प्राणी में जीवन शक्ति, सभी संसारों के शाश्वत माता-पिता हैं और उनमें सब कुछ है। परम पुरुष परमात्मा ध्यान , दर्शन , कीर्तन , स्तुति , पूजा , स्मरण तथा प्रणाम किये जाने पर समस्त पापों को जड़ से उखाड़ डालते इसलिए वे परम पवित्र हैं । 16

[ परमात्मा अपने स्वरूप के यथार्थ ज्ञान से संसार बंधन के हेतु भूत पुण्य पाप रूप कर्म और उनसके कारण रूप अज्ञान सबको नष्ट कर देते हैं । इसीलिए वे पवित्रोंमे पवित्र हैं ।

मोक्षदाता श्री हरि ध्यान करने वाले को सर्वदा रूप , आरोग्य , सम्पूर्ण पदार्थ और प्रासंगिक भोग भी दे देते हैं ।

जो अपना स्मरण किये जाने पर समस्त क्लेशों को दूर कर देते हैं और सब चिन्तनीयों को छोड़ कर उन अच्युत का ही चिंतन क्यों नहीं किया जाता ? 

स्नानादि समस्त कर्मों को करते हुए श्री नारायण देव का ध्यान करना चाहिए । यह भगवदस्मरण ही सम्पूर्ण दुष्कर्मों का प्रायश्चित है । इस विषय में श्रुति भी सहमत है ।

संसार रूप सर्प द्वारा डसे जाने से निश्चेष्ट हुए पुरुष के लिए एकमात्र औषधरूप ‘ कृष्ण ‘ इस मंत्र को सुनकर मनुष्य मुक्त हो जाता है ।

अत्यंत पापी पुरुष भी एक pal के लिए भी अच्युत का ध्यान करने से बड़ा भारी तपस्वी और पंक्ति पावणों को भी पवित्र करने वाला हो जाता है ।

समस्त शास्त्रों का मंथन करने पर और उनका पुनः – पुनः विचार करने पर यही निश्चित होता है कि सर्वदा श्री नारायण का ध्यान करना चाहिए ।

हे विप्रगण ! आप लोगों को सर्वदा सत्व गुण संपन्न होकर एकमात्र श्री हरि का ही ध्यान करना चाहिए । आप सदा ॐ का जप और श्री केशव का ध्यान करें ।

उस परावर परमात्मा का दर्शन कर लेने पर जीव की अविद्या रूप ह्रदय ग्रंथि टूट जाती है । उसके सम्पूर्ण संशय नष्ट हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं ।

हे मैत्रेय ! सुवर्ण आदि धातुओं को जिस प्रकार अग्नि पिघला देता है , उसी प्रकार जिसका भक्तियुक्त नाम संकीर्तन सम्पूर्ण पापों को विलीन करने वाला है ।

जिसके नाम का विवश होकर कीर्तन करने से भी मनुष्य तुरंत ही समस्त पापों से इस प्रकार छूट जाता है , जैसे सिंह से डरे हुए भेड़ियों से उसका शिकार ।

सत्ययुग में ध्यान से , त्रेता में यज्ञ अनुष्ठान से और द्वापर में भगवान के पूजन से मनुष्य जो कुछ प्राप्त करता है , वह कलयुग में श्री केशव का नाम संकीर्तन करने से ही पा लेता है ।

श्री हरि का यदि दुष्ट चित्त पुरुषों द्वारा भी स्मरण किया जाये तो वे उनके समस्त पापों को हर लेते हैं जैसे अनिच्छा से या अनजाने में भी यदि अग्नि का स्पर्श हो जाये अग्नि जला डालता है ।

जान कर अथवा बिना जाने किसी प्रकार भी किये हुए श्री वासुदेव के कीर्तन से जल में पड़े हुए नमक के समान समस्त पाप गल जाते हैं ।

जिसमें चित्त लगाने वाला नरक गामी नहीं होता , जिसके चिंतन में स्वर्गलोक भी विघ्नरूप है , जिसमें चित्त लग जाने पर ब्रह्मलोक भी तुच्छ प्रतीत होता है तथा जो अविनाशी प्रभु शुद्ध बुद्धिवाले पुरुषों के ह्रदय में स्थित हो कर उन्हें  मुक्ति प्रदान करता है । उस अच्युत का चिंतन करने से यदि पाप विलीन हो जाते हैं तो इसमें क्या आश्चर्य है ?

अग्नि को शांत करने में जल और अन्धकार को दूर करने में सूर्य समर्थ है तथा कलियुग में पाप समूह की शांति का उपाय श्री हरि का नाम संकीर्तन है ।

श्री हरि का नाम ही , नाम ही , नाम ही मेरा जीवन है । इसके अतिरिक्त कलियुग में और कोई सहारा है ही नहीं , है ही नहीं , है ही नहीं ।

सर्व व्यापक विष्णु भगवान का स्तवन करने से मनुष्य निष्पाप हो जाता है । विष्णु भगवान् का नित्य प्रति पूजन करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ।

जिनके ह्रदय में समस्त मंगलों के स्थान भगवान् श्री हरि विराजते हैं उन्हें कभी किसी कार्य में कोई अमंगल प्राप्त नहीं होता ।

श्री जनार्दन भगवान् का सदा समाहित होकर चिंतन करना चाहिए । यही इसजीव की परम रक्षा है । भला जो भगवान् के आश्रित है उसे कौन कष्ट पहुंच सकता है ?

हजार बार गंगा स्नान करने से और करोड़ बार पुष्कर क्षेत्र में नहाने से जो पाप नष्ट होते हैं वे श्री हरि का स्मरण करने से ही नष्ट हो जाते हैं ।

जो पुरुष अविनाशी नारायणदेव का एक मुहूर्त में भी चिंतन करता है वह भी सिद्धि प्राप्त कर लेता है । फिर जो भगवत्परायण है उसकी तो बात ही क्या है ।

जितने भी तप और कर्मरूप प्रायश्चित हैं उन सबमें श्री कृष्ण का स्मरण करना ही सर्वश्रेष्ठ है ।

मनुष्यों को नरक की यातनाएं प्राप्त कराने वाले कलियुग के अति उग्र दोष जिनका एक बार स्मरण करने से भी लीन हो जाते हैं

श्री गोविन्द एक बार स्मरण किये जाने पर भी मनुष्यों के सैंकड़ों जन्मों में किये हुए पाप पुंज को इस प्रकार तुरंत ही भस्म कर देते हैं जैसे अग्नि रुई के ढेर को जला डालता है ।

जिस प्रकार ऊंची – ऊंची लपटों वाला अग्नि वायु के साथ मिल कर सूखी घास को जला डालता है उसी प्रकार चित्त में स्थित विष्णु भगवान योगियों के समस्त दोषों को नष्ट कर देते हैं .

बिना ध्यान के एक मुहूर्त निकल जाने पर भी लुटेरों से लुटे हुए व्यक्ति के समान अत्यंत विलाप करना चाहिए।

हे महामुने ! समस्त प्राणियों के प्रभु जगद्गुरु जनार्दन का निरंतर स्मरण करने से मनुष्य समस्त दुःखों को दूर कर देता है और जिन – जिन की इच्छा करता है उन सभी कार्यों को सिद्ध कर लेता है ।

इस प्रकार एकाग्रचित्त हो कर श्री मधुसूदन का स्मरण करते रहने से मनुष्य जन्म , मृत्यु और जरारूप ग्रहों से पूर्ण संसार सागर को पार कर लेगा ।

इस दोषपूर्ण कलियुग में भी विषयासक्त मनुष्य समस्त पापों को कर के भी श्री गोविन्द का चिंतन करने से पवित्र हो जाता है ।

हे मैत्रेय ! जप , होम तथा अर्चना आदि में जिसका चित्त भगवान वासुदेव में लगा हुआ है उसके लिए इन्द्रत्व आदि फल विघ्न रूप ही हैं ।

तीनों लोकों के स्वामी , अनुपम प्रभाव शाली तथा तथा अनेक रूप से प्रकट होने वाले भगवान को सिर झुका कर थोड़ा सा प्रणाम करने से मनुष्य के हज़ारों महाकल्पों में , जन्म – जन्मान्तरों में किये हुए सम्पूर्ण पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं ।

श्री कृष्ण चंद्र को किया हुआ एक प्रणाम भी दस अश्वमेध यज्ञों के बराबर  , स्नान के समान पवित्र करने वाला है । उनमें भी दस अश्वमेध करने वाले का तो पुनर्जन्म होता है किन्तु कृष्ण को प्रणाम करने वाले का पुर्जन्म कभी नहीं होता ।

जिनका वर्ण अलसी के फूल के समान है उन पीताम्बरधारी श्री अच्युत भगवान् गोविन्द को जो प्रणाम करेंगें उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं है ।

भगवान चक्रपाणि को शठता या दम्भ से किया हुआ नमस्कार भी निस्संदेह संसार के स्थूल बंधनों को काटने वाला होता है ।

श्रुति , स्मृति , इतिहास और पुराणों के वचनो से यही बात सिद्ध होती है कि भगवान गोविन्द पवित्रों में पवित्र हैं ।

वह मंगलों का मंगल है , देवों का देव है क्योंकि वह प्रकाश आदि में सबसे बढ़ कर है । भूत प्राणियों का जो अव्यय नाशरहित पिता है अर्थात उत्पन्न करने वाला है। ऐसा जो देव है लोक में वही एकमात्र देव है ।

एक देव है जो सब प्राणियों में छिपा हुआ है , सर्वत्र व्याप्त है , सब जीवों का अनतरातमा है , कर्मों का अध्यक्ष है अर्थात कर्म विभाग का विभाग करने वाला है , सब भूतों का अधिष्ठान है तथा सबका साक्षी , सबको चेतना देने वाला , एकमात्र और निर्गुण है ।

जो सबसे पहले ब्रह्मा को रचता है और फिर उसे वेद प्रदान करता है , आत्मबुद्धि और आत्मज्ञान को प्रकाशित करने वाले उस देव की मैं मुमुक्षु शरण लेता हूँ ।

ऐसा श्वेताश्वर शाखा के मन्त्रोपनिषद में कहा गया है ।

छान्दोग्योपनिषद में कहा है – इस देवता ने इच्छा की । वह एक ही अद्वितीय था ।

प्र – जीवात्मा और परमात्मा में तो भेद है फिर एक ही देव कैसे हो सकता है ?

उ – श्रुतिया कहती हैं कि ऐसा मत कहो क्योंकि जीवात्मा को रचकर परमात्मा उसी में प्रविष्ट हो गया । वह इस शरीर में नख से लेकर शिका पर्यन्त अनुप्रविष्ट है । अविकारी परमात्मा का बुद्धि और उसकी वृत्तियों के साक्षी रूप से प्रवेश करे जाने के कारण जीवात्मा और परमात्मा में अभेद है । यदि कहें कि परमात्मा जीवात्मा में प्रविष्ट हुआ तो जीवात्मा और परमात्मा में परस्पर भेद हुआ क्योंकि एक का दूसरे में प्रवेश हुआ तो फिर जीव और परमात्मा में एकता कैसे हो सकती है ? तो ऐसा कहना ठीक नहीं , क्योंकि एक ही देव अनेक प्रकार से स्थित है । एक होने पर भी अनेक प्रकार से विचार किया जाता है । श्रुतियाँ कहती हैं कि तुम एक ही अर्थात तुम परमात्मा ही अनेकों में प्रविष्ट हो । इस प्रकार श्रुतियों द्वारा एक का ही अनेक प्रकार प्रवेश कहा जाता है । इसलिए प्रविष्ट हुओं में भेद नहीं है ।

कठोपनिषद में कहा है कि जिस प्रकार संसार में व्याप्त हुआ एक ही अग्नि पृथक – पृथक आकारों के संयोग से भिन्न – भिन्न रूपवाला होता है उसी प्रकार समस्त प्राणियों का एक ही अंतरात्मा भिन्न – भिन्न रूपों के अनुरूप और उनके बाहर भी स्थित है । जैसे एक ही विश्वव्यापी वायु भिन्न – भिन्न रूपों के अनुसार तद्रूप हो गया । उसी प्रकार समस्त प्राणियों का एक ही भिन्न – भिन्न रूपों के संयोग से उनके अनुरूप है और उनसे बाहर भी सर्वत्र व्याप्त है । जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत का नेत्र सूर्य दर्शन जन्य वाह्य दोषों से लिप्त नहीं होता , उसी प्रकार समस्त प्राणियों का एक अंतरात्मा परमेश्वर उन सबके दुःखों से लिप्त होता , क्योंकि वास्तव में वह शरीर से भिन्न है । समस्त भूतों का एक ही अंतरात्मा है , जो सबको वश में करनेवाला है और अपने एक ही रूप को नाना प्रकार का कर लेता है । अपने अंतःकरण में स्थित उस देव को धीर पुरुष देखते हैं , उन्हीं को नित्य सुख प्राप्त होता है औरों को नहीं । जो नित्यों का नित्य और चेतनों का चेतन है तथा जो अकेला ही अनेकों की कामनाओं को पूर्ण करता है , उसे जो धीर पुरुष अपने अंतःकरण में स्थित देखते हैं , उन्हें ही नित्यशान्ति प्राप्ति होती है , औरों को नहीं।

बृहदारण्यकोपनिषद में कहा है – आरम्भ में यह एकमात्र ब्रह्म ही था , अकेला होने वह भूतियुक्त कर्म करने में समर्थ नहीं । इसके अतिरिक्त और कोई दृष्टा नहीं है ।

ईशावास्य में कहा है कि वह एक है , चलता नहीं है , तथापि मन से अधिक वेग वाला है । एकत्व देखने वाले को फिर क्या शोक और मोह ?

श्रुति कहती है कि पहले यह एकमात्र आत्मा ही था और कोई चेष्टा करने वाली वस्तु नहीं थी। समस्त प्राणियों के भीतर जो पुरुष है वह मेरा आत्मा है – ऐसा जाने ।

ऋग्वेद का भी कथन है कि उस एक को ही ब्राह्मण लोग नाना प्रकार से कहते हैं । उस एक की ही नाना प्रकार से कल्पना करते हैं । वह एक ही देव पृथ्वी और स्वर्ग को रचता हुआ वह अकेला ही सम्पूर्ण लोकों को धारण किये हुए है । अनेक प्रकार से बढ़ाया हुआ अग्नि एक ही है ।

छान्दोग्य उपनिषद में भी कहा है – हे सौम्य ! पहले एकमात्र यह अद्वितीय सत ही था ।

श्री गीतोपनिषद में कहा है कि जो पुरुष एकत्व में स्थित हो कर सम्पूर्ण भूतों में स्थित मुझ परमात्मा को भजता है वह योगी सब प्रकार से बर्तता हुआ भी मुझ में ही बर्तता है । पंडितजन विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण में , गौ में , हाथी में , कुत्ते में और चांडाल में भी सामान दृष्टि रखने वाले होते हैं । हे अर्जुन ! मैं सम्पूर्ण भूतों के अंतःकरण में स्थित उनका आत्मा हूँ तथा मैं ही समस्त प्राणियों का आदि , मध्य और अंत भी हूँ ।

जिस समय भूतों के पृथक – पृथक भाव को एक परमात्मा के संकल्प में ही स्थित देखता है और उसी से सब भूतों का विस्तार हुआ जानता है उस समय ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । हे अर्जुन ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है । इसलिए सर्व धर्मों को त्यागकर केवल एक मेरी ही शरण को प्राप्त हो । मैं तुझको सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा , तू शोक मत कर ।

हरि वंश पुराण में कहा गया है कि -हे विप्रगण ! आप लोगों को सत्वगुण में स्थित हो कर सर्वदा एकमात्र श्री हरी का ही ध्यान करना चाहिए । आप सदा ओमकार का जप और श्री केशव का ध्यान करें । हे पुरुषोत्तम! निश्चय ही सम्पूर्ण देवताओं में एक आप ही आश्चर्य रूप और धन्य हैं । हे महाबाहो ! संसार में आपके समान और कोई भी नहीं है।

जो कुछ मनु ने कहा है वह ओषधिरूप है । यह श्रुति मनु का माहात्म्य बताने वाली है । मनु जी कहते हैं कि समस्त भूतों में स्थित अपने आत्मा को और समस्त भूतों को अपने आत्मा में देखता हुआ आत्मयज्ञ करने वाला पुरुष स्वराज्य लाभ करता है ।

वह एक ही जनार्दन भगवान् संसार की रचना , स्थिति और संहार करने वाली ब्रह्मा , विष्णु और शिव रूप तीन संज्ञाओं को प्राप्त होता है ।

इसलिए हे द्विज ! विज्ञान के सिवा और कोई वस्तु कभी कुछ भी नहीं है । यह एक विज्ञान ही अपने – अपने कर्मों के भेद से विभिन्न चित्तवालों को भिन्न – भिन्न प्रकार का प्रतीत हो रहा है । वह ज्ञान शुद्ध , निर्मल , शोक हीन और लोभादि सम्पूर्ण संगों से रहित है । वही एकमात्र सत श्रेष्ठ परमेश्वर है तथा वही वासुदेव है उस से पृथक और कुछ नहीं है ।

जब कि समस्त देह में एक ही पुरुष व्याप्त है , तब आप कौन हैं ? मैं अमुक हूँ ; यह कहना व्यर्थ है ।

जिस प्रकार दृष्टि दोष से एक ही आकाश श्वेत , नील आदि अनेकों भेद वाला दिखाई पड़ता है , उसी प्रकार भ्रांत दृष्टि पुरुषों को एक ही आत्मा अलग – अलग दिखाई पड़ता है । यहाँ जो कुछ है वह सब एक अच्युतभगवान ही है । उस के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । वही मैं हूँ । वही मैं हूँ ; वही तू है और वह आत्मस्वरूप ही यह सब कुछ है । भेद दृष्टि रूप मोह को छोड़ । उन जड़ भरत के इस प्रकार कहने पर उस परमार्थ दृष्टि वाले नृपश्रेष्ठ रहूगण ने भेद – भाव को त्याग दिया ।

यमराज ने अपने दूतों से कहा कि यह सम्पूर्ण संसार और मैं एकमात्र परम पुरुष वासुदेव ही हैं । जिनकी हृदयस्थ अनंत भगवान् में ऐसी दृढ भावना हो गयी है उन्हें तुम दूर से ही छोड़ कर निकल जाया करो ।

हे देवगण ! पृथ्वी ने जो कुछ कहा है , वह ठीक ही है ; मैं , महादेव जी और आप सब भी नारायणस्वरूप ही हैं । जो unki विभूतियाँ हैं , उन्हीं कि न्यूनता तथा अधिकता परस्पर बाध्य – बाधक रूप से रहती है ।

भगवन कृष्ण बलराम से कहते हैं कि हे विश्वात्मन ! आप और मैं दोनों इस संसार के एक ही कारण हैं । इस संसार के लिए हम दोनों भिन्न रूप से स्थित हैं ।

विष्णु पुराण में श्री कृष्ण चंद्र महादेव जी से कहते है कि जो अभय आपने दिया है वह सब मैंने भी दिया है । हे शंकर ! आप अपने को मुझसे पृथक न देखें । जो मैं हूँ वही आप और देवता , असुर तथा मनुष्यों के सहित यह सारा संसार है । जिन पुरुषों का चित्त अविद्या से मोहित हो रहा है वे ही भेद भाव देखने वाले होते हैं ।

भविष्योत्तर पुराण में श्री महादेव जी का वचन है कि जो लोग मुझे अथवा ब्रह्मा जी को विष्णु से अलग देखते हैं , वे कुतर्क बुद्धि मूढ़जन नीचे नरक में गिरकर दुःख भोगते हैं तथा जो दुष्टबुद्धि मूढ़लोग मुझे और ब्रह्माजी को श्री विष्णु से पृथक देखते हैं उन्हें उससे ब्रह्महत्या के समान पाप लगता है ।

हरिवंश पुराण में कैलाश यात्रा के प्रसंग में महेश्वर का कथन है कि समस्त भावों के आदि , मध्य और अंत आप ही हैं । यह सम्पूर्ण विश्व आप ही से हुआ है और आप ही में लीन होता है ।

हे जनार्दन ! हे सर्वव्यापक देव ! मैं ही तू है और तू ही मैं हूँ । सम्पूर्ण त्रिलोकी में हम दोनों का शब्द से या अर्थ से किसी प्रकार भी भेद नहीं है ।

हे गोविन्द ! संसार में जो – जो आपके महान नाम हैं , वे ही मेरे भी हैं । इसमें कोई विचार करने की बात ही नहीं है । हे गोपते ! हे जगन्नाथ ! जो आपकी उपासना है वही मेरी हो । हे देव ! जो आपसे द्वेष करता है , इसमें संदेह नहीं , वह मुझसे भी द्वेष करता है । हे देव ! क्योंकि मैं भूतपति भी आप ही का विस्तार हूँ । इसलिए हे सर्व व्यापक देव ! ऐसी कहीं कोई वस्तु नहीं है जो आपसे रहित हो । जो कुछ था , जो कुछ है और जो कुछ है और जो कुछ होगा । हे जगत्पते ! हे देवेश्वर ! वह सब आप ही हैं , आप के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं ।

ये सब वाक्य एकत्व का प्रतिपादन करने वाले हैं ।

 

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे

यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये १७

 

कल्प आरम्भ में समस्त जीव जिनसे प्रकट होते हैं और कल्पांत में पुनः उन्हीं में विलीन हो जाते हैं 17

 

तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते

विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् १८  

 

हे नृप ! जगत के स्वामी और सृष्टि प्रमुख उन भगवान विष्णु के उस पाप नाशक और भय नाशक सहस्रनाम को मुझसे सुनो । 18

 

 

lord vishnu

 

 

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः

ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये १९

 

उन महात्मा के गुण, कर्म के अनुसार जो नाम हैं या जिनके परोक्ष या अपरोक्ष , प्रसिद्द और ऋषि मुनियों द्वारा गाये गए नाम हैं उनको मैं धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष के लाभार्थ कहता हूँ ।

 

ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः

छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः २०

 

इन हजार नामों की रचना महान ऋषि व्यास ने की थी, जिन्होंने वेदों को भी संकलित किया था, और देवकी के पुत्र भगवान की स्तुति में अनुष्टुप छंद का उपयोग करके नामों का आवाहन किया जाता है। 20

 

अमृतांशुद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः

त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते २१

 

इसका बीज वह है जो चंद्र जाति में पैदा हुआ है, शक्ति देवकीनंदन कृष्ण है – , हृदय सत्व, रज और तमस के तीन गुणों में निहित है, लक्ष्य शांति और शांति (किसी के शरीर, मन और आत्मा का मिलन) की प्राप्ति है। 21

 

विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम्

अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमं २२

 

मैं सबसे पूर्ण भगवान को नमन करता हूं जो सब में व्याप्त है, जो हमेशा विजयी है, सभी राक्षसों (दैत्यों) को नष्ट करने वाले देवताओं के सर्वशक्तिमान भगवान को मैं नमन करता हूँ।

 

॥ पूर्वन्यासः ॥

श्रीवेदव्यास उवाच –

अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य

श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः  

अनुष्टुप् छन्दः

श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता

अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम्

देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः

उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः

शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम्

शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम्

रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम्

त्रिसामा सामगः सामेति कवचम्

आनन्दं परब्रह्मेति योनिः

ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः

श्रीविश्वरूप इति ध्यानम्

  अथ न्यासः

शिरसि वेदव्यासऋशये नमः

मुखे अनुष्टुप्छन्दसे नमः

हृदि श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः

गुह्ये अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजाय नमः।

पादयोर्देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तये नमः

सर्वाङ्गे शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकाय नमः

करसंपूटे मम श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः

इति ऋषयादिन्यासः

अथ करन्यासः

विश्वं विष्णुर्वषट्कार इत्यङ्गुष्ठाब्यां नमः

अमृताम्शूद्भवो भानुरिति तर्जनीभ्यां नमः

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति मध्यमाभ्यां नमः

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इत्यनामिकाभ्यां नमः

निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति कनिष्ठिकाभ्यां नमः

रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः

इति करन्यासः

अथ षडङ्गन्यासः

विश्वं विष्णुर्वषट्कार इति हृदयाय नमः
अमृताम्शूद्भवो भानुरिति शिरसे नमः
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति शिखायै नमः
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इति कवचाय नमः
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति नेत्रत्रयाय नमः
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इत्यस्त्राय नमः

इति षडङ्गन्यासः

श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे विष्णोर्दिव्यसहस्रनामजपमहं
करिष्ये इति सङ्कल्पः

 

अथ ध्यानम्

 

क्षीरोधन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकतेर्मौक्तिकानां

मालाक्लृप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः

शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्शः

आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः

 

भक्तोंको मोक्ष प्रदान करनेवाले उन शेषशायी विष्णुको नमन कर उन्हें हमें पवित्र करने हेतु प्रार्थना करते हैं जो क्षीरसागरमें जहां चमकते हुए स्फटिक मणियोंके मध्य मोतियोंकी मालासे सुशोभित सिंहासनपर आरूढ हैं, जो श्वेत मेघरूपी छत्रसे आच्छादित हैं और वे मेघ ऐसे अमृत रूपी ओसके बूंदका वर्षाव करते हैं जैसे वे पुष्पकी पंखुरियां हों, उन्हें नमन है जिनका शरीर हीरे मोतियोंसे सुशोभित हैं और जिन्होंने हाथमें शंख धारण किया हुआ है।

 

भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ नेत्रे

कर्णावाशः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः

अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः

चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि

 

भगवान विष्णुके सर्वव्यापी स्वरूपको नमन है जिनका देह यह त्रिभुवन है , जिनके चरण यह पृथ्वी है , जिनकी नाभि यह गगन है, जिनकी सांसें वायु है, सूर्य और चन्द्रम जिनके नेत्र हैं, दिशाएँ उनके कर्ण हैं , स्वर्ग उनका सिर है , अग्नि उनका मुख है और सागर उनका पेट है | उनके इस सुंदर स्वरूपमें ही सम्पूर्ण ब्रह्मांडके भिन्न देवता, मानव, पशु, पक्षी, गंधर्व एवं दैत्य विद्यमान हैं |

 

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्

 

मैं भगवान विष्णु को नमन करता हूं जो इस सृष्टि के पालक और रक्षक हैं, जो शांतिपूर्ण है, जो विशाल सर्प के ऊपर लेटे हुए हैं जिनकी नाभि से कमल का फूल निकला हुआ है जो ब्रह्मांड का सृजन करता है, जो एक परमात्मा है, जो पूरी सृष्टि को चलाने वाला है, जो सर्वव्यापी है जो बादलों की तरह सांवले हैं जिनकी आंखें कमल के समान है, वही समस्त संपत्तियों के स्वामी हैं, योगी जन उनको समझने के लिए ध्यान करते हैं, वह इस संसार के भय का नाश करने वाले हैं, सब लोगों के स्वामी भगवान विष्णु को मेरा नमस्कार।

 

मेघश्यामं पीतकौशेयवासं

श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम्

पुण्योपेतं पुण्दरीकायताक्षं

विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम्

 

मैं सभी लोकोंके एकमात्र स्वामी भगवान् विष्णुकी वन्दना करता हूँ , जो मेघ की तरह श्याम वर्णवाले हैं , पीले रेशमी वस्त्र पहने हुए हैं । उनका वक्षःस्थल श्रीवत्ससे चिह्नित है तथा कौस्तुभमणिकी प्रभासे सारे अङ्ग देदीप्यमान हैं । वे पुण्यस्वरूप हैं और उनके नेत्र कमलकी तरह विशाल हैं ॥ ५ ॥

 

नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते

अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे

 

 पृथ्वी के राजा, जो सभी प्राणियों से पहले अस्तित्व में थे, जो पहले प्राणी हैं और जो कई रूपों में खुद को प्रकट करते हैं, को प्रणाम।

 

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं

सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्

सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं

नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुर्जम्

 

शंख, चक्र, किरीट, कुण्डल, पीताम्बर, गले में हार, वक्षःस्थल पर कौस्तुभमणि धारण किये हुए भगवान विष्णु को मेरा नमन।

 

छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि

आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलंकृतम्

चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं

रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये

 

मैं उन भगवन कृष्णा को नमस्कार करता हूँ जो आसमान की तरह नीले रंग वाले हैं , जिनकी बड़ी बड़ी आँखें और चार हाथ हैं , जिनका मुख चंद्र के समान चमकता है, वक्ष स्थल पर  श्री वत्स बना हुआ है , जो सोने के सिंहासन पर पारिजात के वृक्ष के नीचे सत्यभामा के साथ विराजमान हैं।

 

स्तोत्रम्

हरिः

 

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः

भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः

 

1  विश्वम्                   जो स्वयं में ब्रह्मांड हो जो हर जगह विद्यमान हो, जो सृष्टि के कारणभूत हैं

2  विष्णु:                  जो हर जगह विद्यमान हो,जो सबमें व्याप्त हैं

3  वषट्कार:            जिसका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता हो, जो यज्ञ रूप हैं

4  भूतभव्यभवत्प्रभु: भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी

5  भूतकृत्    सब जीवों का निर्माता, रजो-तमो गुण के आधार पर सृष्टि की रचना और संहार करने वाले ब्रह्मा और रूद्र रूप 

6  भूतभृत्                 सब जीवों का पालनकर्ता ,जो सतो गुण से सृष्टि के धारक व पोषण करता और विश्व रूप हैं

7   भाव:                     भावना ,जो भाव रूप हैं

8  भूतात्मा                 सब जीवों का परमात्मा, जो जीवों के ह्रदय में आत्मा रूप से रहते हैं

9  भूतभावन:            सब जीवों की उत्पत्ति और पालन के आधार, जो जीवों की उत्पत्ति करते हैं 

 

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।

अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २ ॥

 

10   पूतात्मा                       अत्यंत पवित्र सुगंधियों वाला, जो पवित्र आत्मरूप हैं

11   परमात्मा                      परम आत्मा,जो मुक्त स्वभाव से युक्त  हैं

12   मुक्तानां परमा गति:   सभी आत्माओं और जीवों के लिए अंतिम लक्ष्य और आश्रय , जो संसार बंधन से मुक्त हैं 

13   अव्यय:                        जो अविनाशी हैं

14   पुरुष:                           पुरुषोत्तम , जो पुरुष रूप हैं

15   साक्षी                            बिना किसी व्यवधान सृष्टि के क्रिया कलापों के साक्षी रूप हैं

16   क्षेत्रज्ञः                           क्षेत्र अर्थात शरीर; शरीर को जानने वाला, या शरीर के ज्ञाता

17   अक्षरः                           कभी क्षीण न होने वाला अविनाशी,जिनका कभी क्षय या नाश नहीं होता,जो अक्षर ब्रह्म रूप हैं

 

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः

नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः

 

18    योग:                    जिसे योग द्वारा पाया जा सके

19    योगविदां नेता     जो योग को जानने वालों में श्रेष्ठ योगी हैं

20    प्रधानपुरुषेश्वर:  प्रधान अर्थात प्रकृति; पुरुष अर्थात जीव; इन दोनों का स्वामी

21    नारसिंहवपु:       नर और सिंह दोनों के अवयव जिसमे दिखाई दें ऐसे शरीर वाला, जो मनुष्यों में सिंह रूप हैं

22    श्रीमान्               जिसके वक्ष स्थल में सदा श्री बसती हैं,या जो लक्ष्मी से संपन्न हैं

23    केशव :              जिसके केश सुन्दर हों, या जिन्होंने केशी नामक दैत्य का वध किया था

24    पुरुषोत्तम:         पुरुषों में उत्तम ,या जो शुद्ध ब्रह्म स्वरुप हैं

 

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।

संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४ ॥

 

25    सर्व:              सर्वदा सब कुछ जानने वाला

26    शर्व:              विनाशकारी या पवित्र,कल्पांत में जो सृष्टि का अंत करने वाले हैं

27    शिव:             सदा शुद्ध या कल्याण रूप हैं

28    स्थाणु:          स्थिर सत्य,जो सदैव स्थिर भाव से सृष्टि में विद्यमान हैं

29    भूतादि:         पंच तत्वों के आधार,जो जीवों के उत्पत्ति कारक हैं

30    निधिरव्यय:  अविनाशी निधि, जो अक्षय निधि हैं

31    सम्भव:         जो प्रत्येक युग या काल में अपनी इच्छा से अवतरित होते हैं

32    भावन:         जो सभी जीवों को फल प्रदान करने वाले हैं

33    भर्ता             समस्त संसार का पालन करने वाले 

34    प्रभव:           पंच महाभूतों को उत्पन्न करने वाले, जिनसे जगत की उत्पत्ति होती हैं

35    प्रभु:              सर्वशक्तिमान भगवान्, जो सर्व समर्थ हैं

36    ईश्वर:            जो बिना किसी के सहायता के कुछ भी कर पाए, जो सबके स्वामी हैं

 

स्वयम्भूः शम्भुरदित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः

अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः

 

37     स्वयम्भू:            जो सबके ऊपर है और स्वयं होते हैं, जो स्वयमेव प्रकट होते हैं

38     शम्भु:                भक्तों के लिए जो सुखरूप हैं 

39    आदित्य:            अदिति के पुत्र (वामन), जो सूर्य के समान हैं

40    पुष्कराक्ष:          जिनके नेत्र पुष्कर (कमल) समान हैं

41     महास्वन:          अति महान स्वर या घोष वाले, जो महान वेद रूप शब्द करने वाले हैं 

42    अनादि-निधन:  जिनका आदि और निधन दोनों ही नहीं हैं, जो जन्म मरण से रहित हैं

43    धाता                  शेषनाग के रूप में विश्व को धारण करने वाले, जो अनंत रूप से जगत के धारण कर्ता हैं

44    विधाता              जो जगत के जीवों के लिए कर्म और उसके फलों की रचना करने वाले या निर्धारक हैं

45    धातुरुत्तम:         अनंतादि अथवा सबको धारण करने वाले हैं, जो ब्रह्म से भी श्रेष्ठ हैं

 

अप्रमेयो हृशीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः

विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः

 

46   अप्रमेय:           जिन्हें जाना न जा सके , जो ज्ञान के विषय नहीं हैं

47    हृषीकेश:         इन्द्रियों के स्वामी, जिन्होंने इन्द्रियों को वशीभूत कर रखा है

48    पद्मनाभ:         जिसकी नाभि में जगत का कारण रूप पद्म स्थित है

49    अमरप्रभु:        देवता जो अमर हैं उनके स्वामी

50    विश्वकर्मा         विश्व जिसका कर्म अर्थात क्रिया है, जो जगत के क्रिया रूप है

51     मनु:                   मनन करने वाले

52    त्वष्टा                 प्रलय के समय सब प्राणियों को क्षीण या सूक्ष्म रूप करने वाले

53    स्थविष्ठ:             अतिशय या अत्यधिक स्थूल

54    स्थविरो ध्रुव:      जो विकार हीन , प्राचीन एवं स्थिर हैं

 

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः

प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्

 

55    अग्राह्य:           जो कर्मेन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किये जा सकते , जो शब्द और मन से ग्रहणीय नहीं हैं

56    शाश्वत:            जो सब काल में हो, जो तीनो कालों में स्थिर रहने वाले हैं

57    कृष्ण:              जिसका वर्ण श्याम हो, जो कर्षण अर्थात आकर्षित करने का गुण होने के कारण कृष्ण हैं 

58    लोहिताक्ष:      जिनके नेत्र लाल हों या लालिमा युक्त हैं

59    प्रतर्दन:
  
         जो प्रलयकाल में प्राणियों का संहार या नाश करने वाले हैं

60    प्रभूतस्           जो ज्ञान, ऐश्वर्य आदि गुणों से संपन्न हैं

61    त्रिकाकुब्धाम:  ऊपर, नीचे और मध्य तीनो दिशाओं के धाम हैं

62    पवित्रम्            जो पवित्र करे

63    मंगलं-परम्     जो सबसे उत्तम है या जो समस्त शुभों में श्रेष्ठ है और समस्त अशुभों को दूर करता है

 

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः

हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः

 

64.  ईशान:         सर्वभूतों के नियंता, जो समस्त प्राणियों के स्वामी हैं                            

65.  प्राणद:          प्राणो को देने वाले , जो प्राणो के दाता हैं

66.  प्राण:            जो सदा जीवित है, जो जीवो के प्राण रूप हैं

67.  ज्येष्ठ:            सबसे अधिक वृद्ध या या बड़ा, जो आदि कारण होने से सब से बड़े हैं 

68.  श्रेष्ठ:             सबसे प्रशंसनीय, जो उत्तम हैं

69.  प्रजापति:     ईश्वररूप से सब प्रजाओं के पति, जो प्रजा पति रूप हैं

70.  हिरण्यगर्भ:  ब्रह्माण्डरूप सुवर्ण मय अंडे के भीतर व्याप्त होने वाले या निवास करने वाले, जो ब्रह्म रूप हैं

71.  भूगर्भ:          पृश्वी जिनके गर्भ में स्थित है

72.  माधव:         माँ अर्थात लक्ष्मी के धव अर्थात पति

73.  मधुसूदन:    मधु नामक दैत्य को मारने वाले

 

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः

अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञ कृतिरात्मवान्

 

74  ईश्वर:       सर्वशक्तिमान

75  विक्रम:     शूरवीर

76  धन्वी         शारंग नामक धनुष धारण करने वाला

77  मेधावी       बहुत से ग्रंथों को धारण करने के सामर्थ्य वाला, बुद्धिमान

78  विक्रम:     जगत को लांघ जाने वाला या गरुड़ पक्षी द्वारा गमन करने वाला

79  क्रम:          लांघने या विस्तार करने वाला , जो वामन रूप धारण कर विराट रूप से सृष्टि को नापने वाले हैं

80 अनुत्तम:     जिससे उत्तम और कोई न हो, जो सर्व श्रेष्ठ हैं

81  दुराधर्ष:     जो दैत्यादिकों से दबाया न जा सके, जो शत्रुओ को वशीभूत करने वाले हैं

82  कृतज्ञ:       प्राणियों के किये हुए पाप पुण्यों को जानने वाले

83  कृति:         सर्वात्मक

84  आत्मवान्   अपनी ही महिमा में स्थित होने वाले, जो स्वयं में ही एक भाव से स्थित हैं

 

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः

अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः १०

 

85  सुरेश:       देवताओं के ईश

86  शरणम्     दीनों का दुःख दूर करने वाले

87   शर्म:          परमानन्दस्वरूप

88  विश्वरेता:    विश्व के कारण

89  प्रजाभव:    जिनसे सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है

90  अह:           प्रकाशस्वरूप

91   संवत्सर:     कालस्वरूप से स्थित हुए

92   व्याल:        व्याल (सर्प) के समान पकड़ या ग्रहण में न आ सकने वाले

93   प्रत्यय:        प्रतीति रूप होने के कारण

94   सर्वदर्शन:  सर्वरूप होने के कारण सभी के नेत्र हैं, जो सभी सभीान रूप से देखते हैं

 

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः

वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ११

 

95    अज:                      अजन्मा, जिनका जन्म नहीं होता

96    सर्वेश्वर:                  ईश्वरों का भी ईश्वर, जो सबके स्वामी हैं

97    सिद्ध:                     नित्य सिद्ध, जो सिद्ध रूप हैं

98    सिद्धि:                   सबसे श्रेष्ठ, जो चैतन्य रूप हैं

99    सर्वादि:                  सर्व भूतों के आदि कारण, जो सभी जीवों के उत्पत्ति रूप हैं

100  अच्युत:                 अपनी स्वरुप शक्ति से च्युत न होने वाले, जो स्थिर रुप हैं

101   वृषाकपि:              वृष (धर्म) रूप और कपि (वराह) रूप

102  अमेयात्मा             जिनके आत्मा का माप परिच्छेद न किया जा सके

103  सर्वयोगविनिसृत:  सम्पूर्ण संबंधों से रहित

 

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः

अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः १२

 

104  वसु:              जो सब भूतों में समान  भाव से बसते हैं और जिनमे सब भूत बसते हैं

105  वसुमना:        जिनका मन पवित्र (श्रेष्ठ) है

106  सत्य:             जो सत्य स्वरुप हैं

107  समात्मा        जो राग द्वेषादि से दूर हैं, जो एकात्म रूप  हैं

108  सम्मित:         समस्त पदार्थों से परिच्छिन्न , जो शास्त्र सम्मत हैं

109  सम:              सदा समस्त विकारों से रहित, जो सत्य संकल्प रूप हैं

110  अमोघ:           जो स्मरण किये जाने पर सदा फल देते हैं

111   पुण्डरीकाक्ष:  हृदयस्थ कमल में व्याप्त होते हैं , जिनके नेत्र कमल के समान हैं

112   वृषकर्मा         जिनके कर्म धर्मरूप हैं

113   वृषाकृति:       जिन्होंने धर्म के लिए ही शरीर धारण किया है, जो धर्मावतारी हैं

 

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः

अमृतः शाश्वत स्थाणुर्वरारोहो महातपाः १३

 

114   रुद्र:                  दुःख को दूर भगाने वाले, प्रलयकाल में जो रूद्र बन जाते हैं 

115   बहुशिर:            बहुत से सिरों वाले

116   बभ्रु:                  जो सभी लोकों का भरण पोषण करने वाले हैं

117   विश्वयोनि:          जो विश्व या सृष्टि की उत्पत्ति के कारण हैं

118   शुचिश्रवा:          जिनके नाम सुनने योग्य

119   अमृत:               जिनका मृत अर्थात मरण नहीं होता, जो अमर हैं

120   शाश्वत-स्थाणु:  शाश्वत (नित्य) और स्थाणु (स्थिर), जो सब कालों में विद्यमान रहते हैं

121   वरारोह:             जिनकी गोद श्रेष्ठ है, जो वरण करने योग्य हैं या ग्रहणीय हैं

122   महातप:             जिनका तप महान है, जो महान तपस्वी हैं या जिन्हे सृष्टि के विषय में पूर्ण ज्ञान है

 

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः 

वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः १४

 

123  सर्वग :          जो सर्वत्र व्याप्त है

124  सर्वविद्भानु:  जो सबको जानने वाले है, अपने सत्य स्वरुप से सूर्य के तेज के समान प्रकाशित हैं 

125  विष्वक्सेन:    जिनके सामने कोई सेना नहीं टिक सकती

126  जनार्दन:       दुष्टजनों को नरकादि लोकों में भेजने वाले या संहार करने वाले हैं

127   वेद:              वेद रूप, जो तत्त्व ज्ञान ( आत्मा ) के ज्ञाता हैं

128  वेदविद्         वेद जानने वाले

129  अव्यंग:         जो किसी प्रकार ज्ञान से अधूरा न हो

130  वेदांग:          वेद जिनके अंगरूप हैं

131   वेदविद्         वेदों को विचारने वाले

132   कवि:          सबको देखने वाले, जो कवि रूप हैं

 

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः

चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः १५

 

133  लोकाध्यक्ष: समस्त लोकों का निरीक्षण करने वाले, जो सभी लोकों के स्वामी हैं

134  सुराध्यक्ष:    सुरों (देवताओं) के अध्यक्ष

135  धर्माध्यक्ष:    धर्म और अधर्म को साक्षात देखने वाले, जो धर्म के अध्यक्ष हैं

136  कृताकृत:    कार्य रूप से कृत और कारणरूप से अकृत, जो जगत के कार्य कारण रूप हैं

137  चतुरात्मा     चार पृथक विभूतियों वाले, जो पृथक पृथक कालों में स्वरुप धारण करने वाले हैं 

138  चतुर्व्यूह:     चार व्यूहों वाले, जो चार रूपों वासुदेव,प्रद्युम्न,अनिरुद्ध,संकर्षण से सृष्टि की रचना करने वाले हैं

139  चतुर्दंष्ट्र:      चार दाढ़ों या सींगों वाले, नरसिंह रूप से चार दांत धारण करने वाले हैं

140  चतुर्भुज:     चार भुजाओं वाले

 

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः

अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः १६

 

141   भ्राजिष्णु:      एकरस प्रकाशस्वरूप

142   भोजनम्      प्रकृति रूप भोज्य माया, जो भोजन रूप हैं

143   भोक्ता:         पुरुष रूप से प्रकृति को भोगने वाले, जो भोग्य रूप हैं

144   सहिष्णु:        दैत्यों को भी सहन करने वाले, जो सहन शील हैं

145   जगदादिज:   जगत के आदि में उत्पन्न होने वाले

146   अनघ:           जिनमे अघ (पाप) न हो

147   विजय:          ज्ञान, वैराग्य व् ऐश्वर्य से विश्व को जीतने वाले, ज्ञान, वैराग्य व् ऐश्वर्य को जीतने वाले

148   जेता            समस्त भूतों को जीतने वाले,  जो विष्णुरूप है

149   विश्वयोनि:    विश्व और योनि दोनों वही हैं, जो कार्य कारण रूप है

150   पुनर्वसु:        बार बार शरीरों में बसने वाले, जो युगों के अनुरूप मनुष्य रूप धारण करते है

 

उपेन्द्रो वामनः प्रंशुरमोघः शुचिरूर्जितः

अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः १७

 

151   उपेन्द्र     अनुजरूप से इंद्र के पास रहने वाले

152   वामन     भली प्रकार भजने योग्य हैं, जिन्होंने वामन रूप धारण कर बलि से तीन पग भूमि की याचना की थी

153   प्रांशु        तीनो लोकों को लांघने के कारण प्रांशु (ऊंचे) हो गए, जिन्होंने विराट रूप धारण कर तीनो लोकों को अपने पैरो से  माप                           लिया था

154   अमोघ     जिनकी चेष्टा मोघ (व्यर्थ) नहीं होती, जो कभी भी व्यय नहीं होने वाले हैं अर्थात अविनाशी हैं

155   शुचि        स्मरण करने वालों को पवित्र करने वाले, जो पवित्र रूप हैं

156   ऊर्जित    अत्यंत बलशाली

157   अतीन्द्र    जो बल और ऐश्वर्य में इंद्र से भी आगे हो

158   संग्रह       प्रलय के समय सबका संग्रह करने वाले

159   सर्ग         जगत रूप और जगत का कारण

160   धृतात्मा   जो अनेक रूपों से आत्मा को धारण करते है या जो अनेक रूप धारण करते है

161   नियम      प्रजा को नियमित करने वाले

162   यम         अन्तः करण  में स्थित होकर नियमन करने वाले

 

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः

अतीन्द्रयो महामायो महोत्साहो महाबलः १८

 

163    वेद्यो           कल्याण की इच्छा वालों द्वारा जानने योग्य

164    वैद्य             सब विद्याओं के जानने वाले

165    सदायोगी    सदा प्रत्यक्ष रूप होने के कारण, जो करता होकर भी अकर्ता हैं

166    वीरहा         धर्म की रक्षा के लिए असुर योद्धाओं को मारते हैं

167    माधव          विद्या के पति, जो माधव रूप है

168    मधु             मधु (शहद) के समान प्रसन्नता उत्पन्न करने वाले

169    अतीन्द्रिय    इन्द्रियों से परे, जो इन्द्रियों के द्वारा जानने योग्य नहीं हैं

170    महामाय      मायावियों के भी स्वामी, जो महा मायावी हैं

171    महोत्साह     जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के लिए तत्पर रहने वाले, जो अति उत्साह वाले है

172    महाबल       सर्वशक्तिमान

 

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः

अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् १९

 

173   महाबुद्धि       सर्वबुद्धिमान

174   महावीर्य        संसार के उत्पत्ति की कारणरूप, महापराक्रमी 

175   महाशक्ति     अति महान शक्ति और सामर्थ्य के स्वामी , अति शक्तिशाली

176   महाद्युति      जिनकी बाह्य और अंतर दयुति (ज्योति) महान है, जो अति शोभाशाली हैं

177   अनिर्देश्यवपु  जिसे बताया न जा सके, जो निर्देश देने के योग्य नहीं हैं, जो किसी के आधीन नहीं हैं

178   श्रीमान्           जिनमे श्री है, जो ऐश्वर्य से युक्त है

179   अमेयात्मा      जिनकी आत्मा समस्त प्राणियों से अमेय(अनुमान न की जा सकने योग्य) है

180   महाद्रिधृक्    मंदराचल और गोवर्धन पर्वतों को धारण करने वाले

 

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः

अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः २०

 

181   महेष्वास         जिनका धनुष महान है, जिन्होंने रामावतार में भगवान् शिव का धनुष उठाया था

182   महीभर्ता         प्रलयकालीन जल में डूबी हुई पृथ्वी को धारण करने वाले, जो सृष्टि के पोषण और धारण कर्ता हैं

183   श्रीनिवास        श्री के निवास स्थान

184   सतां गति        संतजनों के पुरुषार्थसाधन हेतु, जिनके बारे में सत्पुरुषों से ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है

185   अनिरुद्ध         प्रादुर्भाव के समय किसी से निरुद्ध न होने वाले, जो शत्रुओ के रोकने पर भी रुकने वाले नहीं हैं

186   सुरानन्द          सुरों (देवताओं) को आनंदित करने वाले

187   गोविन्द            वाणी (गौ) को प्राप्त कराने वाले

188   गोविदां-पति    गौ (वाणी) पति, जो वेद वाणी के ज्ञाता और उसकी रक्षा करने वाले हैं

 

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः

हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥ २१

 

189  मरीचि         तेजस्वियों के परम

190  दमन           राक्षसों और दुष्प्रवृत्ति के लोगों का दमन या संहार करने वाले हैं

191  हंस               संसार भय को नष्ट करने वाले, जो सत्य और असत्य का निर्णय करने में हंस के समान हैं 

192  सुपर्ण           धर्म और अधर्मरूप सुन्दर पंखों वाले, जो गरुण रूप हैं 

193  भुजगोत्तम    भुजाओं से चलने वालों में उत्तम, जो शेष रूप हैं

194  हिरण्यनाभ   हिरण्य (स्वर्ण) के समान नाभि वाले, जिन की नाभि में सुवर्ण मय ब्रह्माण्ड है  

195  सुतपा           सुन्दर तप करने वाले, जो श्रेष्ठ तपस्वी हैं

196  पद्मनाभ       पद्म के समान सुन्दर नाभि वाले

197  प्रजापति       प्रजाओं के पिता, जो प्रजा पति रूप हैं

 

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।

अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा॥ २२ ॥

 

198  अमृत्यु       जिसकी मृत्यु न हो, जो अमर हैं

199  सर्वदृक्      प्राणियों के सब कर्म-अकर्मादि को देखने वाले

200  सिंह          हनन करने वाले हैं, जो सिंह के समान पराक्रमशाली है

201  सन्धाता      मनुष्यों को उनके कर्मों के फल देते हैं, जो युधिष्ठिर के दूत रूप में संधि कराने वाले हैं

202  सन्धिमान्   फलों के भोगनेवाले हैं

203  स्थिर          सदा एकरूप हैं, जो भक्तो के ह्रदय में रहते हैं

204  अज           असुरों का संहार करने वाले

205  दुर्मषण       दानव आदि के द्वारा सहन नहीं किये जा सकते, युद्ध में जिन का पराक्रम असहनीय होता है

206  शास्ता        श्रुति स्मृति से सबका अनुशासन करते हैं, जो दुष्टो को दंड देने वाले हैं

207  विश्रुतात्मा    सत्यज्ञानादि रूप आत्मा का विशेषरूप से श्रवण करने वाले, जो विराट देह वाले  हैं         

208  सुरारिहा      सुरों (देवताओं) के शत्रुओं को मारने वाले

 

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः

निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधिः॥ २३

 

209  गुरु              सब विद्याओं के उपदेष्टा और सबके जन्मदाता, जो उपदेशको में सर्वश्रेष्ठ उपदेशक हैं

210  गुरुतम         ब्रह्मा आदिको भी ब्रह्मविद्या प्रदान करने वाले

211  धाम              परम ज्योति

212  सत्य             सत्य-भाषणरूप, धर्मस्वरूप

213  सत्यपराक्रम जिनका पराक्रम सत्य अर्थात अमोघ है

214  निमिष          जिनके नेत्र योगनिद्रा में मुंदे हुए हैं

215  अनिमिष       मत्स्यरूप या आत्मारूप

216  स्रग्वी             वैजयंती माला धारण करने वाले

217  वाचस्पति-उदारधी  विद्या के पति,सर्व पदार्थों को प्रत्यक्ष करने वाले, वेद वाणी के स्वामी और उदार बुद्धि वाले हैं

 

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः

सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥ २४

 

218   अग्रणी       मुमुक्षुओं को उत्तम पद पर ले जाने वाले, जो सब से पहले पूजने योग्य हैं

219   ग्रामणी      भूतग्राम का नेतृत्व करने वाले

220   श्रीमान्      जिनकी श्री अर्थात कांति सबसे बढ़ी चढ़ी है

221   न्याय          न्यायस्वरूप

222   नेता           जगतरूप यन्त्र को चलाने वाले

223   समीरण     श्वासरूप से प्राणियों से चेष्टा करवाने वाले

224   सहस्रमूर्धा  सहस्र मूर्धा (सिर) वाले

225   विश्वात्मा      विश्व के आत्मा

226   सहस्राक्ष     सहस्र आँखों या इन्द्रियों वाले

227   सहस्रपात्   सहस्र पाद (चरण) वाले

 

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः संप्रमर्दनः

अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः॥ २५

 

228  आवर्तन            संसार चक्र का आवर्तन करने वाले हैं, धर्म की रक्षार्थ जो कालानुसार पृथ्वी पर अवतरित होते हैं

229  निवृत्तात्मा         संसार बंधन से निवृत्त (छूटे हुए) हैं

230  संवृत                आच्छादन करनेवाली अविद्या से संवृत्त (ढके हुए) हैं, जो योगमाया से घिरे हैं

231  संप्रमर्दन           अपने रूद्र और काल रूपों से सबका मर्दन करने वाले हैं, जो दैत्यों का घमंड चूर चूर करने वाले हैं

232  अहः संवर्तक     दिन के प्रवर्तक हैं, जो सूर्य रूप से जगत को प्रकाशित करने वाले हैं

233  वह्नि                   हवि का वहन करने वाले हैं

234  अनिल              अनादि, जो वायु रूप हैं

235  धरणीधर          वराहरूप से पृथ्वी को धारण करने वाले हैं

 

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।

सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः॥ २६ ॥

 

236  सुप्रसाद     जिनकी कृपा अति सुन्दर है, प्रसन्न होने पर जो सब कुछ देने वाले हैं

237  प्रसन्नात्मा   जिनका अन्तः करण रज और तम से दूषित नहीं है, प्रसन्न होने पर जो अपने भक्तो के अपराधों को क्षमा करने वाले है

238  विश्वधृक्    विश्व को धारण करने वाले हैं

239  विश्वभुक्    विश्व का पालन करने वाले हैं

240  विभु          हिरण्यगर्भादिरूप से विविध होते हैं, जो अनेक रूप धारण करने वाले हैं

241  सत्कर्ता     सत्कार करते अर्थात पूजते हैं, जो सत्कर्म करने वाले हैं

242  सत्कृत      पूजितों से भी पूजित

243  साधु         साध्यमात्र के साधक हैं, जो दूसरों के कार्यसाधक है जैसा कि साधु का स्वभाव परोपकार करना होता है

244  जह्नु       अज्ञानियों को त्यागते और भक्तो को परमपद पर ले जाने वाले

245  नारायण   नर से उत्पन्न हुए तत्व नार हैं जो भगवान् के अयन (घर) थे, जल ही जिनका अयन अर्थात घर है

246  नर           नयन कर्ता है इसलिए सनातन परमात्मा नर कहलाता है, जो नर रूप हैं

 

असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः

सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥ २७

 

247  असंख्येय        जिनमे संख्या अर्थात नाम रूप भेदादि नहीं हो

248  अप्रमेयात्मा     जिनका आत्मा अर्थात स्वरुप अप्रमेय है, जिनको मन और वाणी से जानना कठिन है 

249  विशिष्ट            जो सबसे अतिशय (बढे चढ़े) हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं

250  शिष्टकृत्         जो शासन करते हैं, जो आचरण हीनो को भी आचरण सिखाते हैं 

251  शुचि                जो मलहीन है, जो पवित्र हैं

252  सिद्धार्थ           जिनका अर्थ सिद्ध हो, जो सिद्ध मनोरथी हैं 

253  सिद्धसंकल्प    जिनका संकल्प सिद्ध हो, जो संकल्प सिद्ध करने वाले हैं

254  सिद्धिद            कर्ताओं को अधिकारानुसार फल देने वाले, जो सिद्धि दाता है

255  सिद्धिसाधन    सिद्धि के साधक, जो चाा पदाार्थों ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) को देने वााले   है

 

वृषाहि वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।

वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः॥ २८ ॥

 

256  वृषाही       जिनमे वृष (धर्म) जो कि अहः (दिन) है वो स्थित है

257  वृषभ         जो भक्तों के लिए इच्छित वस्तुओं की वर्षा करते हैं

258  विष्णु         सब और व्याप्त रहने वाले, जो विष्णु रूप है

259  वृषपर्वा      धर्म की तरफ जाने वाली सीढ़ी

260  वृषोदर      जिनका उदर मानो प्रजा की वर्षा करता है,  जो धर्म को उदर में धारण किये रहते हैं

261  वर्धन          बढ़ाने और पालना करने वाले,

262  वर्धमान     जो प्रपंचरूप से बढ़ते हैं, भक्तों  द्वारा दी गई वस्तु को अपनी माया से बढाने वाले हैं

263  विविक्त     बढ़ते हुए भी पृथक ही रहते हैं

264  श्रुतिसागर  जिनमे समुद्र के सामान श्रुतियाँ रखी हुई हैं

 

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।

नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः॥ २९ ॥

 

265  सुभुज      जिनकी जगत की रक्षा करने वाली भुजाएं अति सुन्दर हैं

266  दुर्धर        जो मुमुक्षुओं के ह्रदय में अति कठिनता से धारण किये जाते हैं

267  वाग्मी       जिनसे वेदमयी वाणी का प्रादुर्भाव हुआ है

268  महेन्द्र       ईश्वरों के भी इश्वर, जो महान इन्द्र है

269  वसुद        वसु अर्थात धन देते हैं

270  वसु            दिया जाने वाला वसु (धन) भी वही हैं, जो स्वयं धन रूप हैैं

271  नैकरूप     जिनके अनेक रूप हों

272  बृहद्रूप        जिनके वराह आदि बृहत् (बड़े-बड़े) रूप हैं

273  शिपिविष्ट   जो शिपि (पशु) में यज्ञ रूप में स्थित होते हैं

274 प्रकाशन     सबको प्रकाशित करने वाले, जिनसे सारी सृष्टि प्रकाशित होती है

 

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।

ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः॥ ३० ॥

 

275  ओजस्तेजोद्युतिधर  ओज, प्राण और बल को धारण करने वाले हैं

276  प्रकाशात्मा                जिनकी आत्मा  प्रकाश स्वरुप है

277  प्रतापन                      जो अपनी किरणों से धरती को तप्त करते हैं

278  ऋद्ध                          जो धर्म, ज्ञान और वैराग्य से संपन्न हैं

279  स्पष्टाक्षर                    जिनका ओंकाररूप अक्षर स्पष्ट है

280  मन्त्र                          मन्त्रों से जानने योग्य

281  चन्द्रांशु                      मनुष्यों को चन्द्रमा की किरणों के समान आह्लादित करने वाले हैं

282  भास्करद्युति           सूर्य के तेज के समान धर्म वाले या शोभा वाले

 

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।

औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः॥ ३१ ॥

 

283  अमृतांशोद्भव       समुद्र मंथन के समय जिनके कारण चन्द्रमा की उत्पत्ति हुई

284  भानु                     भासित  होने वााले, सूर्य

285  शशबिन्दु              चन्द्रमा के समान प्रजा और औषधियों  का पालन करने वाले

286  सुरेश्वर                  देवताओं के इश्वर

287  औषधम्                संसार रोग के औषध

288  जगत सेतु             लोकों के पारस्परिक असंभेद के लिए इनको धारण करने वाला सेतु

289  सत्यधर्मपराक्रम   जिनके धर्म-ज्ञान और पराक्रमादि गुण सत्य है

 

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।

अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित्॥ ३३ ॥

 

300  युगादिकृत्    युगादि का आरम्भ करने वाले हैं

301  युगावर्त          सतयुग आदि युगों का आवर्तन करने वाले हैं

302  नैकमाय        अनेकों मायाओं को धारण करने वाले हैं

303  महाशन         कल्पांत में संसार रुपी अशन (भोजन) को ग्रसने वाले

304  अदृश्य           समस्त ज्ञानेन्द्रियों के अविषय हैं

305  व्यक्तरूप      स्थूल रूप से जिनका स्वरुप व्यक्त है

306  सहस्रजित्     युद्ध में सहस्रों देवशत्रुओं को जीतने वाले

307  अनन्तजित्    अचिन्त्य शक्ति से समस्त भूतों को जीतने वाले

 

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।

क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः॥ ३४ ॥

 

308  इष्ट                   यज्ञ द्वारा पूजे जाने वाले

309  विशिष्ट            अन्तर्यामी

310  शिष्टेष्ट              विद्वानों के ईष्ट

311  शिखण्डी          शिखण्ड (मयूरपिच्छ) जिनका शिरोभूषण है

312  नहुष                भूतों को या प्राणियों को अपनी माया से संसार के बंधनो से बाँधने वाले

313  वृष                   कामनाओं की वर्षा करने वाले या पूर्ति करने वाले

314  क्रोधहा             साधुओं का क्रोध नष्ट करने वाले

315  क्रोधकृत्कर्ता    क्रोध करने वाले दैत्यादिकों के कर्तन करने वाले हैं

316  विश्वबाहु           जिनके बाहु सब और हैं

317  महीधर             महि (पृथ्वी) को धारण करते हैं

 

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः

अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ३५

 

318  अच्युत         छः भावविकारों से रहित रहने वाले, सृष्टि में सदा विद्यमान रहने वाले

319  प्रथित          जगत की उत्पत्ति आदि कर्मो से प्रसिद्ध, जो अनेक प्रकार की लीलाएं करके प्रसिद्द हैं

320  प्राण            हिरण्यगर्भ रूप से प्रजा को जीवन देने वाले, जो प्राण रूप है

321  प्राणद          देवताओं और दैत्यों को प्राण देने या नष्ट करने वाले हैं, जो भक्त की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं

322  वासवानुज  वासव (इंद्र) के अनुज (वामन अवतार)

323  अपां-निधि  जिसमें अप (जल) एकत्रित रहता है वो सागर हैं, जो समुद्र रूप हैं

324  अधिष्ठानम्  जिनमें  सब भूत स्थित हैं , जो सृष्टि के नियामक हैं

325  अप्रमत्त      कर्मानुसार फल देते हुए कभी चूकते नहीं हैं

326  प्रतिष्ठित     जो अपनी महिमा में स्थित हैं , जो अपनी ही लीला में लीन रहते हैं

 

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः

वसुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ३६

 

327  स्कन्द          स्कंदन करने वाले हैं

328  स्कन्दधर    स्कन्द अर्थात धर्ममार्ग को धारण करने वाले हैं

329  धूर्य             समस्त भूतों के जन्मादिरूप धुर (बोझे) या सृष्टि को धारण करने वाले हैं

330  वरद           इच्छित वर देने वाले हैं

331  वायुवाहन   आवह आदि सात वायुओं को चलाने वाले हैं

332  वासुदेव      जो वासु हैं और देव भी हैं

333  बृहद्भानु     अति बृहत् किरणों से संसार को प्रकाशित करने वाले, जो सूर्य चंद्र रूप से किरणों को धारण करते हैं

334  आदिदेव     सबके आदि हैं और देव भी हैं। प्रथम देव 

335  पुरन्दर        देवशत्रुओं के पूरों (नगर)का ध्वंस करने वाले हैं

 

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः

अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ३७

 

336  अशोक          शोकादि छः उर्मियों से रहित हैं, जिन्हे किसी प्रकार का शोक नहीं है

337  तारण             जो प्रिय भक्तो को संसार सागर से तारने वाले हैं

338  तार                भय से तारने वाले हैं

339  शूर                 पुरुषार्थ करने वाले हैं, जो पराक्रमी हैं

340  शौरि              वासुदेव की संतान, जो शूरवीर हैं

341  जनेश्वर            जन अर्थात सृष्टि के सभी जीवों के इश्वर

342  अनुकूल         सबके आत्मारूप हैं, आत्मारूप से सभी जीवो में व्याप्त हैं

343  शतावर्त          जिनके धर्म रक्षा  के लिए सैंकड़ों अवतार हुए हैं

344  पद्मी                जिनके हाथ में पद्म अर्थात कमल है

345  पद्मनिभेक्षण   जिनके नेत्र पद्म अर्थात कमल के समान हैं

 

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्

महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ३८

 

346  पद्मनाभ       हृदयरूप पद्म की नाभि के बीच में स्थित हैं, जिनकी नाभि कमल नाल के सामान है

347  अरविन्दाक्ष  जिनकी आँख अरविन्द (कमल) के समान है

348  पद्मगर्भ        हृदयरूप पद्म में मध्य में उपासना करने वाले हैं

349  शरीरभृत्     अपनी माया से शरीर धारण करने वाले हैं

350  महर्द्धि         जिनकी विभूति महान है, जो महान सिद्धियों वाले हैं

351  ऋद्ध             प्रपंचरूप, जो माया से विराट हैं

352  वृद्धात्मा       जिनकी देह वृद्ध या पुरातन है, जो पुरातन आत्मा वाले हैं

353  महाक्ष          जिनकी अनेको महान आँखें (अक्षि) हैं

354  गरुडध्वज   जिनकी ध्वजा गरुड़ के चिन्ह वाली है

 

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः

सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ३९

 

355  अतुल                     जिनकी कोई तुलना नहीं है, जो उपमारहित हैं

356  शरभ                     जो नाशवान शरीर में आत्मा रूप से भासते हैं, जो शोभायमान हैं

357  भीम                       जिनसे सब डरते हैं , जो दुष्टो के लिए भयरूप हैं

358  समयज्ञ                  समस्त भूतों में जो समभाव रखते हैं

359  हविर्हरि                  यज्ञों में अग्निरूप से हवि ( हवन सामग्री ) का भाग हरण करते हैं

360  सर्वलक्षणलक्षण्य   परमार्थस्वरूप, जो सब गुणों से युक्त हैं

361  लक्ष्मीवान्               जिनके वक्ष स्थल में लक्ष्मी जी निवास करती हैं, जो लक्ष्मी से युक्त हैं

362  समितिञ्जय             समिति अर्थात युद्ध को जीतते हैं

 

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः

महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ४०

 

363  विक्षर         जिनका क्षर ( क्षय ) ,अर्थात नाश नहीं होता

364  रोहित        अपनी इच्छा से रोहितवर्ण मूर्ति का स्वरुप धारण करने वाले, जिन्होंने मत्स्यावतार धारण किया था

365  मार्ग            जिनसे परमानंद प्राप्त होता है, जो श्रुति आदि के द्वारा ही जाने जा सकते हैं

366  हेतु             संसार के निमित्त और उपादान कारण हैं, जो कारण रूप हैं

367  दामोदर      दाम लोकों का नाम है जिसके वे उदर में हैं, एक बार यशोदा जी ने जिनको रस्सी द्वारा कमर से बाँध दिया था

368  सह             सबको सहन करने वाले हैं, सहनशील हैं

369  महीधर       पर्वतरूप होकर मही ( पृथ्वी ) को धारण करते हैं

370  महाभाग     हर यज्ञ में जिन्हे सबसे बड़ा भाग मिले

371  वेगवान्        तीव्र गति वाले हैं, जो मन के समान गति वाले हैं

372  अमिताशन  संहार के समय सारे विश्व को खा जाने वाले हैं

 

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः

करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ४१

 

373  उद्भव       भव यानी संसार से ऊपर हैं, जो सृष्टि के परे हैं

374  क्षोभण     जगत की उत्पत्ति के समय प्रकृति और पुरुष में प्रविष्ट होकर क्षुब्ध करने वाले

375  देव           जो स्तुत्य पुरुषों से स्तवन किये जाते हैं और सर्वत्र जाते हैं, जो देवस्वरूप हैं

376  श्रीगर्भ      जिनके उदर में संसार रुपी श्री स्थित है

377  परमेश्वर    जो परम है और ईशनशील हैं, महान ईश्वर हैं

378  करणम्    संसार की उत्पत्ति के सबसे बड़े साधन हैं

379  कारणम्   जगत के उपादान और निमित्त, जो कारण रूप हैं

380  कर्ता        स्वतन्त्र, जो कर्ता रूप हैं

381  विकर्ता     विचित्र भुवनों की रचना करने वाले हैं, जो विशेष कार्यो को करने वाले हैं

382  गहन        जिनका स्वरुप, सामर्थ्य या कृत्य नहीं जाना जा सकता , जो अंतर्मुखता के विषय हैं

383  गुह          अपनी माया से स्वरुप को ढक लेने वाले, जो ह्रदय में गुप्त रूप से निवास करने वाले हैं

 

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः

परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ४२

 

384  व्यवसाय       ज्ञानमात्रस्वरूप, जो क्रियारूप हैं

385  व्यवस्थान      जिनमें  सबकी व्यवस्था है, जो सर्वाश्रय हैं

386  संस्थान         परम सत्ता, प्रलय काल में जो सब जीवो के आश्रय कारण हैं

387  स्थानद          ध्रुवादिकों  को उनके कर्मों के अनुसार स्थान देते हैं, जो मुक्ति धाम की प्राप्ति कराने वाले हैं

388  ध्रुव                अविनाशी, जो करता होकर भी स्वरुप में स्थिर रहते हैं

389  परर्धि             जिनकी विभूति श्रेष्ठ है, जो श्रेष्ठ सिद्धियों के स्वामी हैं

390  परमस्पष्ट       परम और स्पष्ट हैं, जो मलरहित और महान हैं

391  तुष्ट                 परमानन्दस्वरूप, जो आनंदरूप हैं

392  पुष्ट                 सर्वत्र परिपूर्ण, जो पूर्णब्रह्म हैं

393  शुभेक्षण         जिनका दर्शन सर्वदा शुभ है, जो सबका शुभ चाहने वाले हैं

 

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः

वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ४३

 

394  राम                   अपनी इच्छा से रमणीय शरीर धारण करने वाले, योगीजन जिस परब्रह्म में रमन करते हैं

395  विराम               जिनमें  प्राणियों का विराम (अंत) होता है, जिनमे जगत का विलय होता है

396  विरज                विषय सेवन में जिनका राग नहीं रहा है, जो रजोगुण से रहित हैं

397  मार्ग                    जिन्हें जानकार मुमुक्षुजन अमर हो जाते हैं, जो ब्रह्ममार्ग को बताने वाले हैं

398  नेय                     ज्ञान से जीव को परमात्वभाव की तरफ ले जाने वाले, जिनका भक्तो के ह्रदय में निवास होता है

399  नय                     नेता, जो भक्तों से प्राप्त अल्पवस्तु भी ग्रहण कर लेते हैं

400  अनय                 जिनका कोई और नेता नहीं है, जो अभक्तों से प्राप्त अधिक वस्तु भी ग्रहण नहीं करते

401  वीर                     विक्रमशाली, जो पराक्रमी हैं

402  शक्तिमतां श्रेष्ठ   सभी शक्तिमानों में श्रेष्ठ

403  धर्म                    समस्त भूतों को धारण करने वाले, जो धर्मस्वरूप हैं

404  धर्मविदुत्तम       श्रुतियाँ और स्मृतियाँ जिनकी आज्ञास्वरूप है, धर्म के जानकारों में जो श्रेष्ठ हैं

 

वैकुन्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः

हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ४४

 

405  वैकुण्ठ      जगत के आरम्भ में बिखरे हुए भूतों को परस्पर मिलाकर उनकी गति रोकने वाले, जो वैकुण्ठ धाम रूप हैं

406  पुरुष         सबसे पहले होने वाले, जो पूर्ण पुरुष हैं

407  प्राण           प्राणवायुरूप होकर चेष्टा करने वाले हैं, जो वेदों के प्राण स्वरुप हैं

408  प्राणद        प्रलय के समय प्राणियों के प्राणों का खंडन करते हैं, जिन्होंने ब्रह्मा को वेद प्रदान किये थे

409  प्रणव         जिन्हें वेद प्रणाम करते हैं, जो प्रणव रूप हैं

410  पृथु             प्रपंचरूप से विस्तृत हैं, जो राजा पृथु के समान हैं

411  हिरण्यगर्भ   ब्रह्मा की उत्पत्ति के कारण, जो श्रेष्ठ बाल रूप हैं

412  शत्रुघ्न          देवताओं के शत्रुओं को मारने वाले हैं, जो शत्रुओ के संहार कर्ता हैं

413  व्याप्त         सब कार्यों को व्याप्त करने वाले हैं, जो सर्व व्यापी हैं

414  वायु             गंध वाले हैं, जो वायु रूप हैं

415  अधोक्षज     जो कभी अपने स्वरुप से नीचे न हो, जो इन्द्रियों के विषय नहीं हैं

 

ऋतुः सुदर्शणः कालः परमेष्ठी परिग्रहः

उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ४५

 

416  ऋतु            ऋतु शब्द द्वारा कालरूप से लक्षित होते हैं, जो ऋतुओ में बसंत ऋतुरूप हैं

417  सुदर्शन       उनके नेत्र अति सुन्दर हैं, जो श्रेष्ठ और दर्शनीय हैं

418  काल           सबकी गणना करने वाले हैं, जो कालरूप हैं

419  परमेष्ठी        हृदयाकाश के भीतर परम महिमा में स्थित रहने के स्वभाव वाले, जो अपने ही धाम में रहने वाले हैं

420  परिग्रह       भक्तों के अर्पण किये जाने वाले पुष्पादि को ग्रहण करने वाले, जो मुमुक्षुओं ( जिज्ञासुओ ) के द्वारा जाने जाते हैं

421  उग्र              जिनके भय से सूर्य भी निकलता है, जो रूद्र रूप हैं

422  संवत्सर       जिनमें सब भूत बसते हैं, जो काल रूप से भली प्रकार व्याप्त है

423  दक्ष             जो सब कार्य बड़ी शीघ्रता से करते हैं, जो निपुण है

424  विश्राम        मोक्ष देने वाले हैं, जो कल्पांत में अंतिम आश्रय हैं

425  विश्वदक्षिण  जो समस्त कार्यों में कुशल हैं, जो प्राणियों के प्रति उदार हैं

 

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्

अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ४६

 

426  विस्तार             जिनमें समस्त लोक विस्तार पाते हैं, जिनमे जगत का विस्तार होता है

427  स्थावरस्स्थाणु   स्थावर और स्थाणु हैं, जो पंचतत्वों ( जल , वायु , धरती , आकाश , अग्नि ) रूप में स्थायी रूप में स्थित हैं

428  प्रमाणम्            संवितस्वरूप, जो प्रमाण रूप है या जो सत्य हैं

429  बीजमव्ययम्     बिना अन्यथाभाव के ही संसार के कारण हैं, जो बीजरूप हैं

430  अर्थ                  सबसे प्रार्थना किये जाने वाले हैं, जो प्रार्थना योग्य हैं

431  अनर्थ                जिनका कोई प्रयोजन नहीं है, जो परमार्थी हैं

432  महाकोश          जिन्हें महान कोष ढकने वाले हैं, जो आनंदमय कोष रूप हैं

433  महाभोग           जिनका सुखरूप महान भोग है, जो सुख राशि हैं

434  महाधन             जिनका भोगसाधनरूप महान धन है, जो भक्त प्रिय हैं

 

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः

नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ४७

 

435  अनिर्विण्ण    जिन्हें कोई निर्वेद (उदासीनता) नहीं है, जो भक्त हित के लिए सदैव सजग रहते हैं

436  स्थविष्ठ         वैराजरूप से स्थित होने वाले हैं, जो अति स्थूल रूप हैं

437  अभू              अजन्मा, जो सत्तात्मक हैं

438  धर्मयूप         धर्म स्वरुप यूप में जिन्हें बाँधा जाता है, जो धर्म यज्ञ के स्तम्भ हैं

439  महामख       जिनको अर्पित किये हुए मख (यज्ञ) महान हो जाते हैं, जो अनेक यज्ञो के कर्ता हैं

440  नक्षत्रनेमि    सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल के केंद्र हैं, जो चन्द्रमा के समान आनंददायी हैं

441  नक्षत्री           चन्द्ररूप, जो शुभ नक्षत्र में देह धारण करने वाले हैं

442  क्षम              समस्त कार्यों में समर्थ, जो क्षमा शील हैं

443  क्षाम             जो समस्त विकारों के क्षीण हो जाने पर आत्मभाव से स्थित रहते हैं, दुखकाल में जो भक्तो के द्वारा स्मरण किए जाते हैं

444  समीहन       सृष्टि आदि के लिए सम्यक चेष्टा करते हैं, जो श्रेष्ठ कार्य साधक हैं

 

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः

सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ४८

 

445  यज्ञ               सर्वयज्ञस्वरूप, जो यज्ञरूप हैं

446  इज्य             जो पूज्य हैं, पूजनीय हैं

447  महेज्य           मोक्षरूप फल देने वाले सबसे अधिक पूजनीय, जो महान पूजनीय हैं

448  क्रतु              तद्रूप, जो एक साथ कई क्रियाओं के कर्ता हैं

449  सत्रम्            जो विधिरूप धर्म को प्राप्त करता है, जो सत्पुरुषों के रक्षक हैं

450  सतां-गति     जिनके अलावा कोई और गति नहीं है, जो सज्जनो या साधुजनो के द्वारा जानने के विषय हैं

451  सर्वदर्शी        जो  प्राणियों के सम्पूर्ण कर्मों को देखते हैं, जो सबको समान भाव से देखते हैं

452  विमुक्तात्मा  स्वभाव से ही जिनकी आत्मा मुक्त है, जो बंधन रहित हैं

453  सर्वज्ञ            जो सर्व है और ज्ञानरूप है, जो सब कुछ जान ने वाले हैं

454  ज्ञानमुत्तमम्  जो प्रकृष्ट, अजन्य, और सबसे बड़ा साधक ज्ञान है, ज्ञानियों में जो श्रेष्ठ ज्ञानी हैं

 

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्

मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ४९

 

455  सुव्रत         जिन्होंने शुभ व्रत लिया है, जो श्रेष्ठ व्रत धारी हैं

456  सुमुख        जिनका मुख सुन्दर है

457  सूक्ष्म          शब्दादि स्थूल कारणों से रहित हैं, जो सूक्ष्मस्वरूप हैं

458  सुघोष        मेघ के समान गंभीर घोष वाले हैं, जो श्रेष्ठ वाणी युक्त हैं

459  सुखद        सदाचारियों को सुख देने वाले हैं, जो श्रेष्ठ सुखदायी हैं

460  सुहृत्         बिना प्रत्युपकार की इच्छा के ही उपकार करने वाले हैं, जो श्रेष्ठ उपकारकर्ता हैं

461  मनोहर       मन को हरने वाले हैं, जो मन को मोहने वाले हैं

462  जितक्रोध   क्रोध को जीतने वाले, जिन्होंने क्रोध को वशीभूत कर लिया है

463  वीरबाहु     अति विक्रमशालिनी बाहु के स्वामी, जो समर्थ भुजाओ वाले हैं

464  विदारण    अधार्मिकों को विदीर्ण करने वाले हैं , जो नरसिंह रूप से हिरण्यकशिपु का वध करने वाले हैं

 

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्

वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ५०

 

465  स्वापन          जीवों को माया से आत्मज्ञानरूप जाग्रति से रहित करने वाले हैं, जो निज भक्तों के लिए धन प्रदाता हैं

466  स्ववश          जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कारण हैं, जो स्वजनों ( भक्तों) के वशीभूत रहते हैं

467  व्यापी            सर्वव्यापी, जो सर्व व्यापक हैं

468  नैकात्मा        जो विभिन्न विभूतियों के द्वारा नाना प्रकार से स्थित हैं, जो सभी जीवों में प्रतिबिम्ब रूप से निवास करते हैं

469  नैककर्मकृत्  जो संसार की उत्पत्ति, उन्नति और विपत्ति आदि अनेक कर्म करते हैं, जो अनेक कर्मों के करने वाले हैं

470  वत्सर             जिनमें सब कुछ बसा हुआ है, जो पुत्र प्रदाता है

471  वत्सल             भक्तों के स्नेही, जो भक्तों से प्रेम करने वाले हैं

472  वत्सी              वत्सों का पालन करने वाले, जो सबको स्नेह करने वाले हैं

473  रत्नगर्भ           रत्न जिनके गर्भरूप हैं, जो गर्भ में रत्न धारण करने वाले हैं या समुद्र रूप हैं

474  धनेश्वर            जो धनों के स्वामी हैं, जो ऐश्वर्यशाली हैं

 

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्

अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ५१

 

475  धर्मगुब्           धर्म का गोपन (रक्षा) करने वाले हैं

476  धर्मकृत्          धर्म की मर्यादा के अनुसार आचरण वाले हैं

477  धर्मी               धर्मों को धारण करने वाले हैं

478  सत्                सत्यस्वरूप परब्रह्म

479  असत्             प्रपंचरूप अपर ब्रह्म

480  क्षरम्             सर्व भूत, जो प्रलय काल में विनाश करता हैं , दुःख और कष्टों का विनाश करने वाले हैं

481  अक्षरम्          कूटस्थ, जो अविनाशी हैं

482  अविज्ञाता      वासना को न जानने वाला, जो ज्ञान स्वरुप हैं

483  सहस्रांशु       जिनके तेज से प्रज्वल्लित होकर सूर्य तपता है , जो हजारों किरणों के धारण कर्ता या सूर्य के समान हैं

484  विधाता         समस्त भूतों और पर्वतों को धारण करने वाले, जो धारण पोषण करने वाले हैं या जो भाग्य लिखने वाले हैं

485  कृतलक्षण     नित्यसिद्ध चैतन्यस्वरूप, जो चेतन स्वरुप हैं

 

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः

आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ५२

 

486  गभस्तिनेमि    जो गभस्तियों (किरणों) के बीच में सूर्यरूप से स्थित हैं, जो सूर्य रूप हैं

487  सत्त्वस्थ           जो समस्त प्राणियों में स्थित हैं, जो सतोगुणों से युक्त हैं

488  सिंह                जो सिंह के समान पराक्रमी हैं

489 भूतमहेश्वर       भूतों के महान इश्वर हैं, जो जीवों के स्वामी हैं

490 आदिदेव          जो सब भूतों का ग्रहण करते हैं और देव भी हैं, जो प्रथम देवरूप हैं

491  महादेव            जो अपने महान ज्ञानयोग और ऐश्वर्य से महिमान्वित हैं, जो महान देव स्वरुप हैं

492  देवेश               देवों के ईश हैं

493  देवभृद्गुरु      देवताओं के पालक इन्द्र के भी शासक हैं, जो देवराज इंद्र के भी उपदेशक हैं

 

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः

शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ५३

 

494  उत्तर               जो संसारबंधन से मुक्त हैं, जो सर्वश्रेष्ठ हैं

495  गोपति             गौओं के पालक, जो गायों के स्वामी हैं

496  गोप्ता              समस्त भूतों के पालक और जगत के रक्षक, जो गायों के रक्षक हैं

497  ज्ञानगम्य         जो केवल ज्ञान से ही जाने जाते हैं, जो ज्ञान के विषय हैं

498  पुरातन           जो काल से भी पहले रहते हैं, जो अति प्राचीन हैं और जो सदैव स्थिर रहने वाले हैं

499  शरीरभूतभृत्  शरीर की रचना करने वाले भूतों के पालक, जो सृष्टि के जीवों का भरण पोषण करने वाले हैं

500  भोक्ता            पालन करने वाले

501  कपीन्द्र            वानरों के स्वामी, सुग्रीव को जिन्होंने वानरों का राजा बनाया था

502  भूरिदक्षिण      जिनकी बहुत सी दक्षिणाएँ रहती हैं, जो सरल स्वभाव वाले हैं

 

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः

विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्त्वतांपतिः ५४

 

503  सोमप              जो समस्त यज्ञों में देवतारूप से सोमपान करते हैं, जो सोमलता रस का पान करने वाले हैं

504  अमृतप            आत्मारूप अमृतरस का पान करने वाले, रामावतार में जिन्होंने यज्ञों के द्वारा देवताओं को तृप्त किया था

505  सोम                 चन्द्रमा (सोम) रूप से औषधियों का पोषण करने वाले, जो चन्द्रमा के समान आनंद दायी हैं

506  पुरुजित्            पुरु अर्थात बहुतों को जीतने वाले, जो अर्जुन के मामा राजा कुन्तिभोज को पराजित करने वाले हैं

507  पुरुसत्तम          विश्वरूप अर्थात पुरु और उत्कृष्ट अर्थात सत्तम हैं, जो पुरुषों में उत्तम हैं

508  विनय               दुष्ट प्रजा को विनय अर्थात दंड देने वाले हैं, जो विनम्र हैं या जो विशेष नीतियों के जानकार हैं

509  जय                   सब भूतों को जीतने वाले हैं, जो जयरूप हैं

510  सत्यसन्ध           जिनकी संधा अर्थात संकल्प सत्य हैं, जो सत्य प्रतिज्ञा वाले हैं

511  दाशार्ह               जो दशार्ह कुल में उत्पन्न हुए, जिन्होंने दर्शाह वंश में जन्म लिया था

512  सात्त्वतां पति     सात्वतों (वैष्णवों) के स्वामी, जो वैष्णवों का योगक्षेम करने वाले हैं

 

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः

आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ५६

 

521  अज              अजन्मा, जो अविनाशी हैं अर्थात जो अनादि काल से ही सृष्टि में व्याप्त हैं

522  महार्ह           मह (पूजा) के योग्य, जो श्रेष्ठ पूजनीय हैं

523  स्वाभाव्य      नित्यसिद्ध होने के कारण स्वभाव से ही उत्पन्न नहीं होते, जो भक्तों के चिंतन योग्य हैं

524  जितामित्र     जो शत्रुओं को जीतने वाले है

525  प्रमोदन        जो अपने ध्यानमात्र से ध्यानियों को प्रमुदित करते हैं, जो सबको प्रमुदित करने वाले हैं

526  आनन्द        आनंदस्वरूप , जो सुखराशि हैं

527  नन्दन          आनंदित करने वाले हैं, जो सबको सुख देने वाले हैं

528  नन्द             सब प्रकार की सिद्धियों से संपन्न, जो ऐश्वर्य शाली हैं

529  सत्यधर्मा      जिनके धर्म ज्ञानादि गुण सत्य हैं, जो सत्यधर्मी हैं

530  त्रिविक्रम      जिनके तीन विक्रम (डग) तीनों लोकों में क्रान्त (व्याप्त) हो गए, जो तीनों लोकों को समभाव से देखते हैं

 

महर्षिः कमिलाचार्यः कृत्ज्ञो मेदिनीपतिः

त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ५७

 

531  महर्षि कपिलाचार्य     जो ऋषि रूप से उत्पन्न हुए कपिल हैं, जो महर्षि कपिल रूपधारी हैं

532  कृतज्ञ                        कृत (जगत) और ज्ञ (आत्मा) हैं, जो किये हुए को जानने वाले हैं

533  मेदिनीपति                मेदिनी (पृथ्वी) के पति या स्वामी

534  त्रिपद                        जिनके तीन पद या चरण हैं

535  त्रिदशाध्यक्ष               जागृत , स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं के अध्यक्ष, जो देवों के अधिष्ठाता हैं

536  महाशृंग                     मत्स्य अवतार, जो महाप्रभुत्व वाले हैं

537  कृतान्तकृत्                कृत (जगत) का अंत करने वाले हैं, जो दुष्कृत्यों का शमन करने वाले हैं

 

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी

गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ५८

 

538  महावराह      महान हैं और वराह रूप धारी हैं

539  गोविन्द          गो अर्थात वाणी से प्राप्त होने वाले हैं, जो गायों को चराने वाले अर्थात ग्वालरूप हैं

540  सुषेण            जिनकी पार्षदरूप सुन्दर सेना है, जो श्रेष्ठ सेना नायक हैं

541  कनकांगदी    जिनके कनकमय (सोने के) अंगद(भुजबन्द) हैं

542  गुह्य               गुहा यानि हृदयाकाश में छिपे हुए हैं, जो परम रहस्यमयी होने के कारण गोपनीय हैं

543  गभीर            जो गंभीर हैं या गंभीर स्वभाव के हैं 

544  गहन             कठिनता से प्रवेश किये जाने योग्य हैं, जो गूढ़ ज्ञान के द्वारा ही जाने जाते हैं

545  गुप्त              जो वाणी और मन के अविषय हैं, जो मन और वाणी के विषय नहीं है

546  चक्रगदाधर   मन रुपी चक्र और बुद्धि रुपी गदा को लोक रक्षा हेतु धारण करने वाले, जो सुदर्शन चक्र और कौमोदकी नामक गदा को धारण करते हैं

 

वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः

वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनः ५९

 

547  वेधा                     विधान करने वाले हैं, जो प्रियजनों के हित साधक हैं

548  स्वांग                  कार्य करने में स्वयं ही अंग हैं, भक्तों को जो अपने समान समझते हैं

549  अजित                अपने अवतारों में किसी से नहीं जीते गए, जो शत्रुओ द्वारा जीते नहीं जा सकते

550  कृष्ण                   कृष्णद्वैपायन, जिनमें कर्षण ( आकर्षण ) गुण है या जो कृष्णा वर्ण के हैं

551  दृढ                       जिनके स्वरुप सामर्थ्यादि की कभी च्युति नहीं होती, जो स्थिर हैं

552  संकर्षणोऽच्युत    जो एक साथ ही आकर्षण  करते हैं और पद च्युत नहीं होते , जो भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं और जो अविनाशी हैं

553  वरुण                  अपनी किरणों का संवरण करने वाले सूर्य हैं, जो वरुण रूप हैं

554  वारुण                 वरुण के पुत्र वसिष्ठ या अगस्त्य, जो नन्द को वरुण लोक से लाने वाले हैं

555  वृक्ष                      वृक्ष के समान अचल भाव से स्थित, जो सहृदय जनो के लिए कल्प वृक्ष के समान हैं

556  पुष्कराक्ष             हृदय कमल में चिंतन किये जाते हैं, जो यशोदा द्वारा धमकाए जाने पर नेत्रों में नीर भर लेते हैं

557  महामन               सृष्टि,स्थिति और अंत ये तीनों कर्म मन से करने वाले, जो उन्नत मन वाले हैं

 

भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः

आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ६०

 

558  भगवान्           सम्पूर्ण छह ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य जिनमें है

559  भगहा              संहार के समय ऐश्वर्यादि का हनन करने वाले हैं

560  आनन्दी           सुखस्वरूप, जो आत्मानंद में लीन रहने वाले हैं

561  वनमाली           वैजयंती नाम की वनमाला धारण करने वाले हैं

562  हलायुध           जो हल को शस्त्र के रूप में धारण करने वाले हैं

563  आदित्य           अदिति के गर्भ से उत्पन्न होने वाले, जो अदिति के पुत्र वामन रूप हैं

564  ज्योतिरादित्य   सूर्यमण्डलान्तर्गत ज्योति में स्थित, जो ज्योतिमान सूर्य से भी अधिक प्रकाश वाले हैं

565  सहिष्णु             शीतोष्णादि द्वंद्वों को सहन करने वाले, जो शरणागत रक्षको में सर्वश्रेष्ठ हैं , सहनशील हैं

566  गतिसत्तम         गति हैं और सर्वश्रेष्ठ हैं

 

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः

दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ६१

 

567  सुधन्वा                  जो इन्द्रियादिमय सुन्दर शारंग धनुष धारण करते हैं

568  खण्डपरशु            जिनका परशु अखंड है, जो परशु नामक अस्त्र धारण करने के कारण परशुराम भी कहलाते हैं

569  दारुण                   सन्मार्ग के विरोधियों या दुष्टों के लिए दुखदायी और दारुण (कठोर) हैं

570  द्रविणप्रद               भक्तों को द्रविण (इच्छित धन) देने वाले हैं

571  दिवःस्पृक्               दिव (स्वर्ग) का स्पर्श करने वाले हैं, जिन्होंने वामनावतार में विराट रूप से स्वर्ग को भी नाप लिया था

572  सर्वदृग्व्यास            सम्पूर्ण ज्ञानों का विस्तार करने वाले हैं, जो व्यासरूप से सर्वदर्शी हैं

573  वाचस्पतिरयोनिज  विद्या के पति और जननी से जन्म न लेने वाले हैं

 

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्

संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ६२

 

574  त्रिसामा           तीन सामों द्वारा सामगान करने वालों से स्तुति किये जाने वाले हैं

575  सामग             जो ब्रह्मा रूप से सामगान या सामवेद का गान करने वाले हैं

576  साम                जो सामवेद रूप ही हैं

577  निर्वाणम्          परमानंदस्वरूप ब्रह्म, जो मोक्ष रूप हैं

578  भेषजम्           संसार रूप रोग की औषध, जो औषधि रूप हैं

579  भृषक्              संसाररूप रोग या भव सागर से छुड़ाने वाली विद्या अर्थात आत्म तत्त्व का उपदेश देने वाले हैं,

580  संन्यासकृत्     मोक्ष के लिए संन्यास की रचना करने वाले हैं

581  सम                  सन्यासियों को ज्ञान के साधन शम का उपदेश देने वाले, जो ज्ञान के साधन रूप हैं

582  शान्त               विषयसुखों में अनासक्त रहने वाले, जो सुखों के प्रति उदासीन हैं अर्थात शांत स्वरुप हैं

583  निष्ठा                प्रलयकाल में प्राणी सर्वथा जिनमे वास करते हैं

584  शान्ति              सम्पूर्ण अविद्या की निवृत्ति

585  परायणम्         पुनरावृत्ति की शंका से रहित परम उत्कृष्ट स्थान हैं, जो मोक्ष धाम हैं

 

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः

गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ६३

 

586  शुभांग       सुन्दर शरीर धारण करने वाले हैं, जिनके अंग सुन्दर हैं

587  शान्तिद      शान्ति देने वाले हैं

588  स्रष्टा          आरम्भ में सब भूतों को रचने वाले हैं, जो सृष्टि के सृजन कर्ता हैं

589  कुमुद         कु अर्थात पृथ्वी में मुदित होने वाले हैं, जो कमल के समान हैं

590  कुवलेशय   कु अर्थात पृथ्वी के वलन करने से जल कुवल कहलाता है उसमे शयन करने वाले हैं,जल में शयन करने वाले

591  गोहित         गौओं के हितकारी हैं

592  गोपति        गो अर्थात भूमि के पति या स्वामी हैं

593  गोप्ता         जगत और भक्तों के रक्षक हैं

594  वृषभाक्ष     वृष अर्थात धर्म जिनकी दृष्टि है, जो धर्मरूप नेत्र वाले हैं

595  वृषप्रिय       जिन्हें वृष अर्थात धर्म प्रिय है

 

अनिर्वर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः

श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ६४

 

596  अनिवर्ती        देवासुरसंग्राम से पीछे न हटने वाले हैं, जो कर्मशील हैं

597  निवृतात्मा       जिनकी आत्मा स्वभाव से ही विषयों से निवृत्त है, जो विषयों से परे हैं

598  संक्षेप्ता          संहार के समय विस्तृत जगत को सूक्ष्मरूप से संक्षिप्त करने वाले हैं, जिन्होंने वेद को संक्षिप्त कर गीता ग्रन्थ में स्थान दिया है

599  क्षेमकृत्          प्राप्त हुए पदार्थ की रक्षा करने वाले हैं, जो सृष्टि के  कल्याणकर्ता हैं

600  शिव              अपने नामस्मरणमात्र से पवित्र और कल्याण करने वाले हैं

601  श्रीवत्सवक्षा     जिनके वक्षस्थल में श्रीवत्स नामक चिन्ह है

602  श्रीवास           जिनके वक्षस्थल में कभी नष्ट न होने वाली श्री वास करती हैं

603  श्रीपति            श्री के पति

604  श्रीमतां वर      ब्रह्मादि श्रीमानों में प्रधान हैं, जो देवो में श्रेष्ठहैं

 

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः

श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ६५

 

605  श्रीद                भक्तों को श्री देते हैं इसलिए श्रीद हैं, जो श्री ( ऐश्वर्य ) प्रदाता हैं

606  श्रीश               जो श्री के ईश हैं

607  श्रीनिवास        जो श्रीमानों में निवास करते हैं, जो शोभा के भण्डार हैं

608  श्रीनिधि          जिनमें  सम्पूर्ण श्रियां एकत्रित हैं, जो अतुलित ऐश्वर्य के स्वामी हैं

609  श्रीविभावन     जो समस्त भूतों को विविध प्रकार की श्री देते हैं , जो कर्मानुसार प्राणियों को फल प्रदान करते हैं

610  श्रीधर              जिन्होंने श्री को छाती में धारण किया हुआ हैं

611  श्रीकर              जो स्मरण कर्ता या भक्तों को श्रीयुक्त करने वाले हैं और ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं

612  श्रेय                  जिनका स्वरुप कभी न नष्ट होने वाले सुख को प्राप्त कराता है, जो श्रिया रूप हैं

613  श्रीमान्            जिनमे श्रियां हैं, जो लक्ष्मी से युक्त हैं

614  लोकत्रयाश्रय   जो तीनों लोकों के एकमात्र आश्रय हैं

 

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः

विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ६६

 

615  स्वक्ष                   जिनकी आँखें कमल के समान सुन्दर हैं

616  स्वङ्ग                  जिनके अंग सुन्दर हैं

617  शतानन्द             जो परमानंद स्वरुप उपाधि भेद से सैंकड़ों प्रकार के हो जाते हैं, जो आनंदमय हैं

618  नन्दि                  परमानन्दस्वरूप , जो आनंद प्रदाता है

619  ज्योतिर्गणेश्वर      ज्योतिर्गणों के इश्वर या स्वामी हैं

620  विजितात्मा        जिन्होंने आत्मा अर्थात मन को जीत लिया है

621  विधेयात्मा           जिनका स्वरुप किसी के द्वारा विधिरूप से नहीं कहा जा सकता, जो किसी के अधीन नहीं हैं

622  सत्कीर्ति             जिनकी कीर्ति सत्य है, जो श्रेष्ठ यशश्वी हैं

623  छिन्नसंशय          जिन्हें कोई संशय नहीं है, जो संशय हीन हैं

 

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः

भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ६७

 

624  उदीर्ण                जो सब प्राणियों से उदार है

625  सर्वतश्चक्षु           जो अपने चैतन्यरूप से सबको देखते हैं, जो सब जगह देखने वाले हैं

626  अनीश               जिनका कोई ईश या स्वामी नहीं है

627  शाश्वत-स्थिर      जो नित्य होने पर भी कभी विकार को प्राप्त नहीं होते, जो देश काल आदि में सदा स्थिर भाव से रहते हैं

628  भूशय                लंका जाते समय समुद्रतट पर भूमि पर सोये थे, जो भूमि पर शयन करने वाले हैं

629  भूषण                जो अपने अवतारों से पृथ्वी को भूषित करते रहे हैं, जो जगत के भूषन रूप हैं

630  भूति                  समस्त विभूतियों के कारण हैं, जो सत्ता रूप हैं

631  विशोक              जो शोक से परे हैं, जिन्हें किसी प्रकार का शोक नहीं होता

632  शोकनाशन       जो स्मरणमात्र  से भक्तों का शोक नष्ट कर दे, जो दुःखो के हर्ता हैं

 

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः

अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ६८

 

633  अर्चिष्मान्      जिनकी अर्चियों (किरणों) से सूर्य, चन्द्रादि अर्चिष्मान हो रहे हैं , जो सूर्यरूप हैं

634  अर्चित            जो सम्पूर्ण लोकों में सबके द्वारा  अर्चित (पूजित) हैं

635  कुम्भ              कुम्भ(घड़े) के समान जिनके उदर में  सब वस्तुएं और सम्पूर्ण सृष्टि स्थित हैं

636  विशुद्धात्मा     तीनों गुणों से अतीत होने के कारण विशुद्ध आत्मा हैं, जिनकी आत्मा निर्विकार हैं

637  विशोधन        अपने स्मरण मात्र से पापों का नाश करने वाले हैं

638  अनिरुद्ध        शत्रुओं द्वारा कभी रोके न जाने वाले, जिनको किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं हैं, जो बाधा रहित हैं

639  अप्रतिरथ        जिनका कोई विरुद्ध पक्ष नहीं है, युद्ध में जिनके सामने कोई नहीं टिकता

640  प्रद्युम्न            जिनका दयुम्न (धन) श्रेष्ठ है, जो प्रद्युम्नरूप हैं

641  अमितविक्रम   जिनका विक्रम या पराक्रम अपरिमित है

 

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः

त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ६९

 

642  कालनेमीनिहा      कालनेमि नामक असुर का वध या हनन करने वाले

643  वीर                       जो शूर हैं , वीर हैं

644  शौरी                     जो शूरकुल में उत्पन्न हुए हैं

645  शूरजनेश्वर             इंद्र आदि शूरवीरों के भी शासक, जो श्रेष्ठ योद्धाओ के नायक हैं

646  त्रिलोकात्मा           तीनों लोकों की आत्मा हैं

647  त्रिलोकेश               जिनकी आज्ञा से तीनों लोक अपना कार्य करते हैं, जो तीनों लोकों के स्वामी हैं

648  केशव                    ब्रह्मा,विष्णु और शिव नाम की शक्तियां केश हैं उनसे युक्त होने वाले, केशी दैत्य को मारने वाले

649  केशिहा                 केशी नामक असुर को मारने वाले

650  हरि                       अविद्यारूप कारण सहित संसार को हर लेते हैं, जो पापों को हरने वाले हैं

 

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः

अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ७०

 

651  कामदेव          कामना किये जाते हैं इसलिए काम हैं और देव भी हैं

652  कामपाल        कामियों की कामनाओं का पालन करने वाले हैं, जो कामनाओ को पूरा करने वाले हैं

653  कामी              पूर्णकाम हैं,  जो कामना रूप हैं

654  कान्त              परम सुन्दर देह वाले हैं, जो ब्रह्म का भी अंत करने वाले हैं

655  कृतागम          जिन्होंने श्रुति,स्मृति आदि आगम(शास्त्र) रचे हैं, जो वेदों के प्रादुर्भाव के कारण हैं

656  अनिर्देश्यवपु   जिनका रूप निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता, जो जाति व चिह्न से रहित देह वाले हैं

657  विष्णु               जिनकी प्रचुर कांति या तेज़ पृथ्वी और आकाश को व्याप्त करके स्थित है

658  वीर                 गति आदि से युक्त हैं, जो श्रेष्ठ वीर हैं

659  अनन्त             देश, काल, वस्तु, सर्वात्मा आदि से अपरिच्छिन्न , जो अनेक गुणों वाले हैं

660  धनञ्जय           अर्जुन के रूप में जिन्होंने दिग्विजय के समय बहुत सा धन जीता था, जो अर्जुन रूप हैं

 

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः

ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ७१

 

661  ब्रह्मण्य           जो तप,वेद,ब्राह्मण और ज्ञान के हितकारी हैं, जो ब्रह्म निष्ठ हैं

662  ब्रह्मकृत्         तपादि के करने वाले हैं, हयग्रीव दैत्य का वध कर जिन्होंने वेदों को उस से प्राप्त किया था

663  ब्रह्मा              ब्रह्मरूप से सबकी रचना करने वाले हैं, जो सृष्टि के रचयिता रूप हैं

664  ब्रहम             बड़े तथा बढ़ानेवाले हैं, जो आत्मज्ञान रूप हैं

665  ब्रह्मविवर्धन   तपादि को बढ़ाने वाले हैं

666  ब्रह्मविद्         वेद तथा वेद के अर्थ को यथावत जानने वाले हैं, जो तत्व या आत्म तत्व के ज्ञाता हैं

667  ब्राह्मण           ब्राह्मण रूप, जो वैदिक धर्म के ज्ञाता और प्रवर्तक हैं

668  ब्रह्मी              ब्रह्म के शेषभूत जिनमे हैं, जो ब्रह्म ज्ञान या तत्व के जानकार हैं

669  ब्रह्मज्ञ            जो अपने आत्मभूत वेदों को जानते हैं, जो जीव रूप से ब्रह्मा को जानने वाले हैं

670  ब्राह्मणप्रिय    जो ब्राह्मणों को प्रिय हैं, ब्राह्मण जिन्हें प्रिय हैं

 

महाक्रमो महाकर्मा महातेजो महोरगः

महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ७२

 

671  महाक्रम       जिनका डग महान है, जो पाद विन्यास ( पैरों को बढ़ाने वाले ) हैं

672  महाकर्मा     जगत की उत्पत्ति जैसे जिनके कर्म महान हैं, जो वृहद धर्म के कर्ता हैं

673  महातेजा      जिनका तेज महान है, जो महान तेजस्वी हैं

674  महोरग        जो महान उरग (वासुकि सर्परूप) है

675  महाक्रतु       जो महान क्रतु (यज्ञ रूप ) है, जो महान यज्ञ करने वाले हैं

676  महायज्वा    महान हैं और लोक संग्रह के लिए यज्ञानुष्ठान करने से यज्वा भी हैं

677  महायज्ञ       महान हैं और यज्ञ हैं, जो महान जप यज्ञ करने वाले हैं

678  महाहवि      महान हैं और हवि हैं, जो महान हवि रूप हैं

 

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः

पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ७३

 

679  स्तव्य           जिनकी सब स्तुति करते हैं लेकिन ये स्वयं किसी की स्तुति नहीं करते, जो स्तुति करने योग्य हैं

680  स्तवप्रिय     जिनकी सभी स्तुति करते हैं, जिन्हें स्तुति ( वंदना ) प्रिय है

681  स्तोत्रम्        वह गुण कीर्तन हैं जिससे उन्ही की स्तुति की जाती है, जो स्तोत्र रूप हैं

682  स्तुति          स्तवन क्रिया, जो गुण कीर्तन करने योग्य हैं

683  स्तोता         सर्वरूप होने के कारण स्तुति करने वाले भी स्वयं हैं

684  रणप्रिय       जिन्हें रण प्रिय है

685  पूर्ण             जो समस्त कामनाओं और शक्तियों से संपन्न हैं, जो पूर्ण कलाओं से युक्त हैं

686  पूरयिता      जो केवल पूर्ण ही नहीं हैं बल्कि सबको संपत्ति से पूर्ण करने भी वाले हैं , जो भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं

687  पुण्य            स्मरण मात्र से पापों का क्षय करने वाले हैं, जो पुण्य रूप हैं

688  पुण्यकीर्ति   जिनकी कीर्ति मनुष्यों को पुण्य प्रदान करने वाली है, जो कीर्तिवान हैं

689  अनामय      जो व्याधियों से पीड़ित नहीं होते, जो रोग रहित हैं

 

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः

वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ७४

 

690  मनोजव     जिनका वेग मन के समान तीव्र है , जो मन की गति के समान वेगवान हैं

691  तीर्थकर      जो चौदह विद्याओं  और वेद विद्याओं के कर्ता तथा वक्ता हैं, जो विष्णुरूप हैं

692  वसुरेता      जो सुवर्ण प्रिय ( तेज़ ) वाले हैं

693  वसुप्रद       जो खुले हाथ से धन देते हैं

694  वसुप्रदो     जो भक्तों को मोक्षरूप उत्कृष्ट फल देते हैं

695  वासुदेव     वासुदेवजी के पुत्र

696  वसु            जिनमें सब भूत बसते हैं, जो वसुरूप हैं

697  वसुमना     जो समस्त पदार्थों में और सर्वत्र सामान्य भाव और समान रूप से वास करने वाले हैं

698  हवि           जो ब्रह्म को अर्पण किया जाता है, जो हवन रूप हैं

 

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः

शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ७५

 

699  सद्गति        जिनकी गति यानी बुद्धि श्रेष्ठ है, जो सद्गति ( मोक्ष ) रूप हैं

700  सत्कृति      जिनकी जगत की उत्पत्ति आदि कृति श्रेष्ठ है, जो उत्तम क्रिया वाले हैं

701  सत्ता           सजातीय, विजातीय भेद से रहित अनुभूति हैं, जो अधिष्ठान रूप हैं

702  सद्भूति     जो अबाधित और बहुत प्रकार से भासित हैं, जो सद्पुरुषों को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं

703  सत्परायण सत्पुरुषों के श्रेष्ठ स्थान हैं, सत्य के प्रति जिनकी निष्ठा है

704  शूरसेन      जिनकी सेना शूरवीर है और हनुमान जैसे शूरवीर उनकी सेना में हैं, जो श्रेष्ठ सेना से युक्त हैं

705  यदुश्रेष्ठ       यदुवंशियों में प्रधान हैं, श्रेष्ठ हैं

706  सन्निवास   विद्वानों के आश्रय है , सत्पुरुषों में जो आवास रूप हैं

707  सुयामुन     जिनके यमुना सम्बन्धी सुन्दर हैं, यमुना के सुन्दर तट पर गोप सखाओं के मध्य विद्यमान रहने वाले

 

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः

दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्ढरोऽथापराजितः ७६

 

708  भूतावास        जिनमें सर्व भूत मुख्य रूप से निवास करते हैं, जो जीवों में आत्मा रूप से निवास करते हैं

709  वासुदेव          जगत को माया से आच्छादित करते हैं और देव भी हैं, जो वसुदेव के पुत्र हैं

710  सर्वासुनिलय   सम्पूर्ण प्राण जिस जीवरूप आश्रय में लीन हो जाते हैं, जो जीवों के अंतिम आश्रय हैं

711  अनल               जिनकी शक्ति और संपत्ति की समाप्ति नहीं है, जो अग्निरूप हैं

712  दर्पहा               धर्मविरुद्ध मार्ग में रहने वालों का दर्प नष्ट करते हैं, प्रतिद्वंदियों के घमंड को समाप्त करने वाले

713  दर्पद                धर्म मार्ग में रहने वालों को दर्प (गर्व) देते हैं

714  दृप्त                 अपने आत्मारूप अमृत का आस्वादन करने के कारण नित्य प्रमुदित रहते हैं, स्वात्मानन्द में लीन रहने वाले

715  दुर्धर                जिन्हें बड़ी कठिनता से ह्रदय में धारण किया जा सकता है

716  अथापराजित   जो किसी से पराजित नहीं होते

 

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्

अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ७७

 

717  विश्वमूर्ति      विश्व जिनकी मूर्ति है, जो विश्व रूप हैं

718  महामूर्ति      जिनकी मूर्ति बहुत बड़ी है, जो सत चित आनंद रूप वाले हैं

719  दीप्तमूर्ति     जिनकी मूर्ति दीप्तमति है, जो प्रकाश रूप हैं

720  अमूर्तिमान्  जिनकी कोई कर्मजन्य मूर्ति नहीं है , जो विग्रह रहित हैं

721  अनेकमूर्ति   अवतारों में लोकों का उपकार करने वाली अनेकों मूर्तियां धारण करते हैं , जो अनेक रूपों वाले हैं

722  अव्यक्त       जो व्यक्त नहीं होते, जो प्रत्यक्ष नहीं होते

723  शतमूर्ति       जिनकी विकल्पजन्य अनेक मूर्तियां हैं, जो सैंकड़ो रूपों वाले हैं

724  शतानन       जो सैंकड़ों मुख वाले है

 

एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम्

लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ७८

 

725  एक                जो सजातीय, विजातीय और बाकी भेदों से शून्य हैं, जो एक रूप हैं

726  नैक               जिनके माया से अनेक रूप हैं

727  सव                वो यज्ञ हैं जिससे सोम निकाला जाता है, जो यज्ञ में सोम रस का पान करने वाले हैं

728  क                  सुखस्वरूप, जो ब्रह्मरूप हैं

729  किम्              जो विचार करने योग्य है, जो पुरुषार्थ रूप हैं

730  यत्                 जिनसे सब भूत उत्पन्न होते हैं, जो भक्तों के हितार्थ सर्वत्र विचरण करने वाले हैं

731  तत्                  जो विस्तार करता है, लीला रचने वाले हैं

732  पदमनुत्तमम्   वह पद हैं और उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है इसलिए अनुत्तम भी हैं, जो श्रेष्ठ स्थल कहे जाते हैं

733  लोकबन्धु        जिनमें सब लोक बंधे रहते हैं, जो लोगों को हित अहित का ज्ञान कराने वाले हैं

734  लोकनाथ        जो लोकों से याचना किये जाते हैं और उनपर शासन करते हैं, जो सृष्टिवासियों के स्वामी हैं

735  माधव             मधुवंश में उत्पन्न होने वाले हैं, जो लक्ष्मी के पति हैं

736  भक्तवत्सल     जो भक्तों के प्रति स्नेहयुक्त हैं और दया भाव रखने वाले हैं

 

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी

वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ७९

 

737  सुवर्णवर्ण      जिनका वर्ण सुवर्ण के समान है

738  हेमांग           जिनका शरीर हेम(सुवर्ण) के समान कांतिमान है

739  वरांग            जिनके अंग वर अर्थात सुन्दर और श्रेष्ठ हैं

740  चन्दनांगदी   जो चंदनों और अंगदों (भुजबन्द) से विभूषित हैं

741  वीरहा           धर्म की रक्षा के लिए दैत्यवीरों का हनन करने वाले हैं

742  विषम           जिनके समान कोई नहीं है

743  शून्य             जो समस्त विशेषों से रहित होने के कारण शून्य के समान हैं, जो धर्मो से रहित हैं

744  घृताशी         जिनकी आशिष घृत यानी विगलित हैं, जो आशीषों से रहित हैं

745  अचल           जो किसी भी तरह से विचलित नहीं होते, जो चलायमान नहीं हैं

746  चल              जो वायुरूप से चलते हैं, जो प्राणी रूप से चलायमान हैं

 

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्

सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ८०

 

747  अमानी         जिन्हें अनात्म वस्तुओं में आत्माभिमान नहीं है, जो अभिमान रहित हैं

748  मानद          जो भक्तों को आदर मान देते हैं, जो भक्तों में अभिमान नहीं आने देते

749  मान्य            जो सबके माननीय पूजनीय हैं, जो सबमे पूजित हैं

750  लोकस्वामी  चौदहों लोकों के स्वामी हैं

751  त्रिलोकधृक्  तीनों लोकों को धारण करने वाले हैं

752  सुमेधा          जिनकी मेधा ( बुद्धि ) सुन्दर और श्रेष्ठ  है

753  मेधज           मेध अर्थात यज्ञ में अन्न ग्रहण करने के लिए उत्पन्न या प्रकट होने वाले हैं

754  धन्य             कृतार्थ हैं, जो पुण्यवान हैं

755  सत्यमेध       जिनकी मेधा सत्य है

756  धराधर        जो अपने सम्पूर्ण अंशों से या शेष रूप से पृथ्वी को धारण करते हैं

 

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ८१

 

757  तेजोवृषः                आदित्यरूप से सदा तेज की वर्षा करते हैं

758  द्युतिधरः              द्युति या कांति को धारण करने वाले हैं

759  सर्वशस्त्रभृतां वरः  समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ

760  प्रग्रहः        भक्तों द्वारा समर्पित किये हुए पुष्पादि या पूजा को भली प्रकार ग्रहण करने वाले हैं

761  निग्रहः       अपने अधीन करके सबका निग्रह करते हैं, जो दुष्टों का संहार करने वाले हैं

762  व्यग्रः         जिनका नाश नहीं होता, जो भक्तों के प्रति तत्पर रहते हैं

763  नैकशृंगः     चार सींगवाले हैं

764  गदाग्रजः    मंत्र से पहले ही प्रकट होते हैं

 

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः

चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ८२

 

765  चतुर्मूर्तिः     जिनकी चार मूर्तियां हैं, जो चार मूर्तिरूप ( विराट , हिरण्यगर्भ , तुरीय, ब्रह्म ) हैं

766  चतुर्बाहुः     जिनकी चार भुजाएं हैं, जो चार भुजाओं में शंख , चक्र , गदा , पद्म धारण किये हैं

767  चतुर्व्यूहः     जिनके चार व्यूह ( शरीर पुरुष , छंद पुरुष , वेद पुरुष व महापुरुष ) हैं

768  चतुर्गतिः     जिनके चार आश्रम, चार वर्णों और चारों वेदों ( साम , अथर्व , यजुर , ऋग ) की गति है

769  चतुरात्मा    जिनका मन चतुर है,जो चार अन्तः करण वाले हैं अर्थात जिनके(मन ,बुद्धि ,अहंकार,चित्त)राग द्वेष से रहित हैं

770  चतुर्भावः     जिनसे धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष पैदा होते हैं,जो चार अवस्थाओं  ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ,संन्यास)में निमग्न हैं

771  चतुर्वेदविद्  चारों वेदों को जानने वाले

772  एकपात्      जिनका एक पाद है, जो जगत रुपी एक पैर वाले हैं

 

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः

दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ८३

 

773  समावर्तः     संसार चक्र को भली प्रकार घुमाने वाले हैं, जो सृष्टि क्रम को चलाने वाले है                 

774  निवृत्तात्मा   जिनका मन विषयों से निवृत्त है, जो विषयों से परे हैं

775  दुर्जयः          जो किसी से जीते नहीं जा सकते

776  दुरतिक्रमः   जिनकी आज्ञा का उल्लंघन सूर्यादि भी नहीं कर सकते , जिनको भेद पाना दुर्लभ है

777  दुर्लभः          दुर्लभ भक्ति से प्राप्त होने वाले हैं, जो कठिन भक्ति से ही मिल पाते हैं

778  दुर्गमः          कठिनता से जाने जाते हैं

779  दुर्गः             कई विघ्नों से आहत हुए पुरुषों द्वारा और विघ्नों को दूर करने पर भी जो कठिनता से प्राप्त हो पाते हैं

780  दुरावासः     जिन्हे बड़ी कठिनता से चित्त में बसाया जाता है, जो ह्रदय में कठिनता से व्यापते हैं

781  दुरारिहा       दुष्ट मार्ग में चलने वालों को और दुष्प्रवृत्ति वाले लोगों का का विनाश करने वाले हैं

 

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः

इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ८४

 

782  शुभांगः         जो शुभ अंगों वाले हैं

783  लोकसारंगः  लोकों के सार हैं

784  सुतन्तुः          जिनका तंतु ( माया, प्रपंच )  – यह विस्तृत जगत सुन्दर हैं

785  तन्तुवर्धनः     उसी तंतु ( माया, प्रपंच ) की वृद्धि करने वाले हैं

786  इन्द्रकर्मा       जिनका कर्म इंद्र के कर्म के समान ही है

787  महाकर्मा        जिनके कर्म महान हैं

788  कृतकर्मा        जिन्होंने धर्म रूप कर्म किया है

789  कृतागमः        जिन्होंने वेदरूप आगम बनाया है

 

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः

अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ८५

 

790  उद्भवः       जिनका जन्म नहीं होता,आविर्भाव या अवतरण होता है,जो प्रकट होते हैं, जो सृष्टि की उत्पत्ति के कारण हैं

791  सुन्दरः        विश्व से बढ़कर सौभाग्यशाली हैं , जो शोभनीय हैं , अति सुन्दर

792  सुन्दः          शुभ उंदन (आर्द्रभाव) करते हैं, जो करुणाकर हैं

793  रत्ननाभः     जिनकी नाभि रत्न के समान सुन्दर है

794  सुलोचनः    जिनके लोचन ( नेत्र ) सुन्दर हैं

795  अर्कः           ब्रह्मा आदि पूजनीयों के भी पूजनीय हैं

796  वाजसनः     याचकों को वाज (अन्न) देते हैं

797  शृंगी             प्रलय समुद्र में सींगवाले मत्स्यविशेष का रूप ले कर पृथ्वी को धारण किया था

798  जयन्तः        शत्रुओं को अतिशय से जीतने वाले हैं, जो विजयशील हैं

799  सर्वविज्जयी जो सर्ववित हैं और जयी हैं , जो सबको जीतने वाले हैं

 

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः

महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ८६

 

800  सुवर्णबिन्दुः         जिनके अवयव ( अंग ) सुवर्ण के समान हैं

801  अक्षोभ्यः              जो राग द्वेषादि विषय विकारोंऔर देवशत्रुओं से क्षोभित नहीं होते

802  सर्ववागीश्वरेश्वरः  ब्रह्मादि समस्त वागीश्वरों के भी इश्वर हैं

803  महाहृदः              एक बड़े सरोवर समान हैं, जो महान तीर्थ रूप हैं

804  महागर्तः              जिनकी माया गर्त (गड्ढे) के समान दुस्तर है

805  महाभूतः              तीनों काल से अनवच्छिन्न (विभाग रहित) स्वरुप हैं,जो जीवों में सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण रूप हैं

806  महानिधिः           जो महान हैं और निधि भी हैं, जो श्रेष्ठ सम्पत्तिवान हैं

 

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः

अमृतांशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ८७

 

807  कुमुदः       कु (पृथ्वी) को उसका भार उतारते हुए उसे मुदित ( आनंदित ) करते हैं

808  कुन्दरः      कुंद या कुंदरू पुष्प के समान शुद्ध या श्रेष्ठ फल देते हैं

809  कुन्दः        कुंद के समान सुन्दर अंगवाले हैं, जो कुंद मालाधारी हैं

810  पर्जन्यः      पर्जन्य (मेघ) के समान कामनाओं को वर्षा करने वाले और तापनाशक हैं

811  पावनः        स्मरणमात्र से पवित्र करने वाले हैं

812  अनिलः      जो इल (प्रेरणा करने वाला)से रहित हैं,जिसे किसी प्रेरणा की कोई आवश्यकता नहीं,वायु के समान वेग वाले

813  अमृतांशः   अमृत का भोग या पान करने वाले हैं

814  अमृतवपुः   जिनका शरीर मरण से रहित है, जो अमर हैं

815  सर्वज्ञः        जो सब कुछ जानते हैं

816  सर्वतोमुखः  सब ओर नेत्र, शिर और मुख वाले हैं

 

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः

न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ८८

 

817  सुलभः        केवल समर्पित भक्ति से सुखपूर्वक मिल जाने वाले हैं

818  सुव्रतः         जो सुन्दर व्रत(भोजन) करते हैं, श्रेष्ठ व्रतधारी

819  सिद्धः         जिनकी सिद्धि दूसरे के अधीन नहीं है, जो सिद्ध रूप हैं

820  शत्रुजित्    देवताओं के शत्रुओं को जीतने वाले,जिन्होंने षड्विकारों (काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मात्सर्य) को जीत लिया है

821  शत्रुतापनः  देवताओं के शत्रुओं को तपानेवाले हैं

822  न्यग्रोधः      जो नीचे की ओर उगते हैं और सबके ऊपर विराजमान हैं

823  उदुम्बरः     अम्बर से भी ऊपर हैं

824  अश्वत्थः       श्व अर्थात कल भी रहनेवाला नहीं है, पीपल स्वरुप

825  चाणूरान्ध्रनिषूदनः चाणूर नामक अन्ध्र जाति के वीर को मारने वाले हैं

 

सहस्रर्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः

अमूर्तिरनधोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ८९

 

826  सहस्रार्चिः     जिनकी सहस्र अर्चियाँ (किरणें) हैं

827  सप्तजिह्वः     उनकी अग्निरूपी सात जिह्वाएँ (काली,कराली,मनोजवा,सुलोहिता,सुधूम्रवर्ण,स्फुर्लिंगिनी,विश्वरूचि)हैं

828  सप्तैधाः        जिनकी सात ऐधाएँ हैं अर्थात दीप्तियाँ या समिधाएं हैं

829  सप्तवाहनः   सात घोड़े(सूर्य की सात किरणें)जिनके वाहन हैं

830  अमूर्तिः         जो मूर्तिहीन हैं , जो निराकार हैं

831  अनघः           जिनमें अघ (दुःख) या पाप नहीं है , पापरहित हैं

832  अचिन्त्यः       सब प्रमाणों के अविषय हैं, जो चिंतन से भी परे के विषय हैं

833  भयकृत्         भक्तों का भय काटने वाले हैं, जो दुष्टों के लिए भय रूप हैं

834  भयनाशनः    धर्म का पालन करने वालों और भक्तजनो का भय नष्ट करने वाले हैं

 

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्

अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ९०

 

835  अणु      जो अत्यंत सूक्ष्म हैं

836  बृहत्     जो महान से भी अत्यंत महान हैं, जो वर्धमान हैं अर्थात वृद्धि को प्राप्त होने वाले हैं

837  कृश     जो अस्थूल हैं, जो कृश रूप हैं

838  स्थूल     जो सर्वात्मक हैं, जो अविद्या आदि में स्थूल रूप हैं

839  गुणभृत्   जो सत्व, रज और तम गुणों के अधिष्ठाता हैं

840  निर्गुण    जो गुणधर्म से रहित हैं , जो सतोगुण आदि से परे हैं

841  महान्     जो अंग, शब्द, शरीर और स्पर्श से रहित हैं और महान हैं, जो सबके द्वारा पूजित हैं

842  अधृत    जो किसी से भी धारण नहीं किये जाते

843  स्वधृत   जो स्वयं अपने आपसे ही धारण किये जाते हैं

844  स्वास्य   जिनका ताम्रवर्ण मुख अत्यंत सुन्दर है, जो वेद रुपी श्वास से शोभित मुख वाले हैं

845  प्राग्वंश   जिनका वंश सबसे पहले हुआ है, जिनकी प्रथम उत्पत्ति हुई है

846  वंशवर्धन अपने वंशरूप प्रपंच को बढ़ाने अथवा नष्ट करने वाले हैं

 

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः

आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ९१

 

847  भारभृत्       अनंतादिरूप ( शेष नागावतार) से पृथ्वी का भार उठाने वाले हैं

848  कथित       सम्पूर्ण वेदों में जिनका कथन है, जो सर्वश्रेष्ठ कहे गए हैं

849  योगी           जो योग विद्या में पारंगत हैं

850  योगीश       जो योगियों के भी ईश्वर( स्वामी ) हैं

851  सर्वकामद    जो सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हैं

852  आश्रम         जो संसार रुपी जंगल में भ्रमण करने वाले जीवों के लिए आश्रम के समान हैं

853  श्रमण           जो समस्त अविवेकियों और भक्त विरोधियों को को दुःख देने वाले हैं

854  क्षाम            जो कल्प के अंत में सम्पूर्ण प्रजा ( सृष्टि जीवों )को क्षाम अर्थात क्षीण ( स्वयं में लीन )कर लेते हैं

855  सुपर्ण           जो संसारवृक्षरूप हैं और जिनके छंद रूप सुन्दर पत्ते हैं, जो वेदरूपी श्रेष्ठ पत्तों के समान हैं

856  वायुवाहन     जिनके भय से वायु चलती है, जो वायु के भी प्रेरक हैं

 

धनुर्धरो धर्नुवेदो दण्डो दमयिता दमः

अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ९२

 

857  धनुर्धरः           जिन्होंने राम के रूप में महान धनुष धारण किया था

858  धनुर्वेदः          जो दशरथकुमार धनुर्वेद जानते हैं

859  दण्डः              जो दमन करनेवालों के लिए दंड हैं , जो दंड देने वाले हैं

860  दमयिता         जो यम और राजा के रूप में प्रजा का दमन करते हैं

861  दमः                 दण्डकार्य और उसका फल दम, जो दम रूप हैं

862  अपराजितः      जो शत्रुओं से पराजित नहीं होते

863  सर्वसहः           समस्त कर्मों में समर्थ हैं, जो सबको सहने वाले हैं

864  नियन्ता            सबको अपने अपने कार्य में नियुक्त करते हैं , जो सृष्टि के नियमनकर्ता हैं

865  अनियमः          जिनके लिए कोई नियम नहीं है, जो नियम आदि से आबद्ध नहीं हैं

866  अयमः               जिनके लिए कोई यम अर्थात मृत्यु नहीं है, जो अविनाशी हैं या मृत्यु धर्म से रहित हैं

 

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः

अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ९३

 

867  सत्त्ववान्             जिनमें  शूरता-पराक्रम आदि सत्व हैं

868  सात्त्विकः            जिनमें  सत्वगुण प्रधानता से स्थित है, जो शुद्ध सात्विक रूप हैं

869  सत्यः                   जो सत्य स्वरुप हैं

870  सत्यधर्मपरायणः जो सत्य हैं और धर्मपरायण भी हैं , जो सत्य धर्म में तत्पर रहने वाले हैं

871  अभिप्रायः             प्रलय के समय संसार जिनके सम्मुख जाता है जो पुरुषार्थ की कामना वालों द्वारा अभिलिषित हैं

872  प्रियार्हः                 जो प्रिय ईष्ट वस्तु निवेदन करने योग्य है

873  अर्हः                      जो पूजा के साधनों से पूजनीय हैं, जो पूजने के योग्य हैं

874  प्रियकृत्                जो स्तुतिआदि के द्वारा भजने वालों का प्रिय करते हैं, जो भक्तो के लिए सुखकारी हैं

875  प्रीतिवर्धनः            जो भजने वालों की प्रीति भी बढ़ाते हैं, जो अपने प्रति भक्तों का प्रेम वर्धन करने वाले हैं

 

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः

रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ९४

 

876  विहायसगतिः  जिनकी गति अर्थात आश्रय आकाश है, जिनकी आकाश में गमन करने की शक्ति हैं

877  ज्योतिः            जो स्वयं ही प्रकाशित होते हैं, जो ज्योति स्वरुप हैं

878  सुरुचिः           जिनकी रुचि सुन्दर है, जो कांति युक्त हैं

879  हुतभुक्           जो अग्नि रूप से यज्ञ की आहुतियों को भोगते हैं

880  विभुः              जो सर्वत्र विराजमान हैं और तीनों लोकों के प्रभु हैं, जो सर्व व्यापक हैं

881  रविः                जो शृंगारादि रसों को ग्रहण करते हैं

882  विरोचनः         जो विविध प्रकार या विशेष प्रकार से सुशोभित होते हैं

883  सूर्यः                जो श्री(शोभा) को जन्म देते हैं, जो आकाश चारी सूर्य रूप हैं

884  सविता            सम्पूर्ण जगत की (उत्पत्ति) करने वाले हैं या जगतोत्पत्ति के कारणरूप हैं

885  रविलोचनः      रवि या सूर्यदेव जिनका लोचन अर्थात नेत्र रूप हैं

 

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः

अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ९५

 

886  अनन्तः           जिनमें  नित्य,सर्वगत और देशकालपरिच्छेद का अभाव है, जो विभूतियों से व्याप्त हैं

887  हुतभुक्           जो हवन में आहुति रूप से प्राप्य पदार्थो को भोगने वाले या सेवन करने वाले हैं

888  भोक्ता            जो जगत का पालन करते हैं, जो खाद्य पदार्थो का सेवन करने वाले हैं

889  सुखदः             जो भक्तों को मोक्षरूप सुख देते हैं, सुख दाता हैं

890  नैकजः             जो धर्मरक्षा के लिए बारबार जन्म लेते हैं , जो भक्तों से सुशोभित हैं

891  अग्रजः              जो सबसे आगे ( पहले )उत्पन्न होता है, हिरण्यगर्भ रूप से जो सृष्टि में प्रथम आये

892  अनिर्विण्णः       जिन्हें सर्वकामनाएँ प्राप्त होने के कारण अप्राप्ति का खेद नहीं है

893  सदामर्षी           साधुओं और सहृदय लोगो को के लिए क्षमा शील हैं

894  लोकाधिष्ठानम्  जिनके आश्रय से तीनों लोक स्थित हैं, जो तीनों लोकों के अधिष्ठाता हैं

895  अद्भुतः            जो अपने स्वरुप, शक्ति, व्यापार और कार्य में अद्भुत है

 

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः

स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ९६

 

896  सनात्              काल भी जिनका एक विकल्प ही है, सृष्टि में जो सनातन काल से व्याप्त हैं

897  सनातनतमः     जो ब्रह्मादि से भी अत्यंत सनातन हैं, ब्रह्मादि देवताओं के भी आदि कारण हैं

898  कपिलः             जो देवहूति के पुत्र कपिल मुनि के रूप में जन्म लेने वाले हैं

899  कपिः                जो सूर्यरूप में जल को अपनी किरणों से पीते हैं

900  अव्ययः             प्रलयकाल में जगत में विलीन होते हैं, जो अविनाशी हैं

901  स्वस्तिदः           भक्तों को स्वस्ति अर्थात मंगल देते हैं, जो कल्याण रूप हैं

902  स्वस्तिकृत्        जो स्वस्ति ( मंगल )ही करते हैं

903  स्वस्ति               जो परमानन्दस्वरूप हैं

904  स्वस्तिभुक्        जो स्वस्ति भोगते हैं और भक्तों की स्वस्ति की रक्षा करते हैं, जो सहृदजनो के पालनकर्ता हैं

905  स्वस्तिदक्षिणः    जो स्वस्ति करने में समर्थ हैं, जो शीघ्र कल्याण करने वाले हैं

 

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः

शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ९७

 

906  अरौद्रः              कर्म, राग और कोप जिनमे ये तीनों रौद्र नहीं हैं, जो अरौद्र रूप हैं

907  कुण्डली            सूर्यमण्डल के समान कुण्डल धारण किये हुए हैं, जो कुंडली के धारण करता हैं

908  चक्री                 सम्पूर्ण लोकों की रक्षा के लिए मनस्तत्त्वरूप सुदर्शन चक्र धारण किया है

909  विक्रमी             जिनका डग तथा शूरवीरता समस्त पुरुषों से विलक्षण है, जो पराक्रमी हैं

910  ऊर्जितशासनः  जिनका श्रुति-स्मृतिस्वरूप शासन अत्यंत उत्कृष्ट है

911  शब्दातिगः          जो शब्द से कहे नहीं कहे जा सकते

912  शब्दसहः            समस्त वेद तात्पर्यरूप से जिनका वर्णन करते हैं

913  शिशिरः              जो तापत्रय से तपे हुओं के लिए विश्राम का स्थान हैं, सृष्टि के सन्तापनाशक हैं

914  शर्वरीकरः          ज्ञानी-अज्ञानी दोनों की शर्वरीयों (रात्रि) के करने वाले हैं, मुक्ति और भोग पदार्थो के प्रदाता हैं

 

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः

विद्धत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ९८

 

915  अक्रूरः        जिनमे क्रूरता नहीं है, जो सहज प्रकृति के हैं

916  पेशलः        जो कर्म, मन, वाणी और शरीर से सुन्दर हैं

917  दक्षः             बढ़ा-चढ़ा,शक्तिमान तथा शीघ्र कार्य करने वाला ये तीनों दक्ष जिनमे है, जो कार्य करने में कुशल हैं

918  दक्षिणः       जो सहृदय हैं

919  क्षमिणांवरः जो क्षमा करने वाले योगियों आदि में श्रेष्ठ हैं, क्षमावानों में जो श्रेष्ठ हैं

920  विद्वत्तमः     जिन्हे सब प्रकार का ज्ञान है और किसी को नहीं है , विद्वानों में जो श्रेष्ठ हैं

921  वीतभयः      जिनका संसारिकरूप भय बीत(निवृत्त हो) गया है, जो भय रहित हैं

922  पुण्यश्रवणकीर्तनः  जिनका श्रवण और कीर्तन पुण्यकारक है,जो नाम सुमिरन और गुणगान से पुण्य वृद्धि करने वाले हैं

 

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः

वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ९९

 

923  उत्तारणः         संसार सागर से पार उतारने वाले हैं, जो मुक्तिदाता हैं

924  दुष्कृतिहा       पापनाम की दुष्क्रितयों का हनन करने वाले हैं, जो दुष्टों का विनाश करने वाले हैं

925  पुण्यः              अपनी स्मृतिरूप वाणी से सबको पुण्य का उपदेश देने वाले हैं

926  दुःस्वप्ननाशनः  दुःस्वप्नों को नष्ट करने वाले हैं

927  वीरहा            संसारियों को मुक्ति देकर उनकी गतियों का हनन करने वाले हैं

928  रक्षणः            तीनों लोकों की रक्षा करने वाले हैं, जो भक्तों के रक्षक हैं

929  सन्तः             सन्मार्ग पर चलने वाले संतरूप हैं

930  जीवनः           प्राणरूप से समस्त प्रजा को जीवित रखने वाले हैं, जो जीवन दाता हैं

931  पर्यवस्थितः      विश्व को सब ओर से व्याप्त करके स्थित है, जो सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त हैं

 

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः

चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः १००

 

932  अनन्तरूपः   जिनके रूप अनंत हैं, जो अनेक रूपों से सृष्टि में व्याप्त हैं

933  अनन्तश्रीः      जिनकी श्री अपरिमित है , जो अपार संपत्ति से युक्त हैं

934  जितमन्युः      जिन्होंने मन्यु (मन) को वशीभूत कर क्रोध आदि को जीता है

935  भयापहः       पुरुषों का संस्कारजन्य भय नष्ट करने वाले हैं, भय को नष्ट करने वाले

936  चतुरश्रः        न्याययुक्त , जो कर्मानुसार फल प्रदान करते हैं

937  गभीरात्मा     जिनका मन गंभीर है , जो गंभीर स्वभाव वाले हैं

938  विदिशः        जो विविध प्रकार के फल देते हैं, जो प्रिय भक्तों को फल प्रदान करते हैं

939  व्यादिशः      इन्द्रादि को विविध प्रकार की आज्ञा देने वाले हैं

940  दिशः           सबको उनके कर्मों का फल देने वाले हैं

 

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः

जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः १०१

 

941  अनादिः            जिनका कोई आदि नहीं है

942  भूर्भूवः             भूमि के भी आधार है

943  लक्ष्मीः             पृथ्वी की लक्ष्मी अर्थात शोभा हैं

944  सुवीरः              जो विविध प्रकार से सुन्दर स्फुरण करते हैं, जो श्रेष्ठ वीर हैं

945  रुचिरांगदः        जिनकी अंगद(भुजबन्द) कल्याणस्वरूप हैं, सुन्दर बाजूबंद आदि के धारण करता

946  जननः               जीवों को उत्पन्न करने वाले हैं

947  जनजन्मादिः     जन्म लेनेवाले जीवों की उत्पत्ति के आदि कारण हैं

948  भीमः                भय के कारण स्वरुप हैं, जो भीम रूप हैं

949  भीमपराक्रमः    जिनका पराक्रम असुरों के भय का कारण होता है, जो भीषण पराक्रमी हैं

 

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः

ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः १०२

 

950  आधारनिलयः  जो पंचभूतों (पृथ्वी,आकाश,वायु,जल,अग्नि) के भी आधार हैं

951  अधाता             जिनका कोई धाता(बनाने वाला) नहीं है, कोई आधार नहीं हैं

952  पुष्पहासः         पुष्पों के हास (खिलने)के समान जिनका प्रपंचरूप से विकास होता है

953  प्रजागरः           प्रकर्षरूप से जागने वाले हैं, जो सब विषयों के ज्ञाता हैं

954  ऊर्ध्वगः           सबसे ऊपर हैं, जो वैकुण्ठ धाम में गमन करने वाले हैं

955  सत्पथाचारः      जो स्वयं भी सत्य मार्ग या सत्पथ का अनुसरण करते हैं

956  प्राणदः             जो मरे हुओं को जीवित कर सकते हैं, जो प्राण दाता हैं

957  प्रणवः              जिनके वाचक ॐ कार का नाम प्रणव है, जो प्रणव स्वरुप हैं

958  पणः                जो व्यवहार करने वाले हैं, जो भक्तों से व्यवहारशील हैं

 

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः

तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः १०३

 

959  प्रमाणम्              जो स्वयं प्रमाणरूप हैं, जो साक्षीरूप हैं

960  प्राणनिलयः         जिनमे प्राण अर्थात इन्द्रियां लीन होती है, जो जीवमात्र के प्राण रूप हैं

961  प्राणभृत्               जो अन्नरूप से प्राणों का पोषण करते हैं, जगत के जीवों की प्राण रक्षा करते हैं

962  प्राणजीवनः          प्राण नामक वायु से प्राणियों को जीवित रखते हैं , जो जीवो के जीवनधार हैं

963  तत्त्वम्                  तथ्य, अमृत, सत्य ये सब शब्द जिनके वाचक हैं , जो तत्त्व रूप हैं

964  तत्त्वविद्               तत्व ( आत्म तत्त्व ) अर्थात स्वरुप को यथावत जानने वाले हैं

965  एकात्मा                जो एक आत्मा हैं

966  जन्ममृत्युजरातिगः जो न जन्म लेते हैं न मरते हैं, जो जन्म , मृत्यु , ज़रा आदि विकारों से परे हैं

 

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः

यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः १०४

 

967  भूर्भुवःस्वस्तरुः   भू,भुवः और स्वः जिनका सार है उनका होमादि करके प्रजा तरती है

968  तारः                  संसार सागर से तारने वाले हैं, जो भक्तों के उद्धार कर्ता हैं

969  सविताः             सम्पूर्ण लोक के उत्पन्न करने वाले हैं, जो जीवों के पिता स्वरुप हैं

970  प्रपितामहः         पितामह ब्रह्मा के भी पिता है

971  यज्ञः                   यज्ञरूप हैं

972  यज्ञपतिः            यज्ञों के स्वामी हैं

973  यज्वा                जो यजमान रूप से स्थित हैं, जो यज्ञकर्ता हैं

974  यज्ञांगः              यज्ञ जिनके अंग हैं

975  यज्ञवाहनः          फल हेतु यज्ञों का वहन करने वाले हैं, जो यज्ञों के फलदाता हैं

 

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः

यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव १०५

 

976  यज्ञभृद्         यज्ञ को धारण कर उसकी रक्षा करने वाले हैं

977  यज्ञकृत्         जगत के आरम्भ और अंत में यज्ञ करते हैं

978  यज्ञी             अपने आराधनात्मक यज्ञों के शेषी हैं, यज्ञ कर्ताओं में जो मुख्य हैं

979  यज्ञभुक्        यज्ञ को भोगने वाले हैं

980  यज्ञसाधनः   यज्ञ जिनकी प्राप्ति का साधन है

981  यज्ञान्तकृत्   यज्ञ के फल की प्राप्ति कराने वाले हैं

982  यज्ञगुह्यम्     यज्ञ द्वारा प्राप्त होने वाले, यज्ञ में जिन्हें फलरूप से विद्वान ही जान पाते हैं

983  अन्नम्           जो अनन्तस्वरूप हैं

984  अन्नादः         अन्न को खाने वाले हैं, जो अन्न प्रदान कर्ता हैं

 

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः

देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः १०६

 

985  आत्मयोनिः     आत्मा ही योनि है इसलिए वे आत्मयोनि है, जो आत्मरूप से सृष्टि के कारण रूप हैं

986  स्वयंजातः        निमित्त कारण भी वही हैं

987  वैखानः            जिन्होंने वराह रूप धारण करके पृथ्वी को खोदा था

988  सामगायनः     सामगान करने वाले है, जो सामवेद के गायक हैं

989  देवकीनन्दनः  देवकी के पुत्र

990  स्रष्टा                सम्पूर्ण लोकों के रचयिता हैं

991  क्षितीशः           क्षिति अर्थात पृथ्वी के ईश (स्वामी) हैं

992  पापनाशनः      पापों का नाश करने वाले हैं

 

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः

रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः १०७

 

993    शंखभृत्         जिन्होंने पांचजन्य नामक शंख धारण किया हुआ है

994    नन्दकी           जो नन्दक नामक तलवार धारण करते हैं

995    चक्री               जिनकी आज्ञा से संसारचक्र चल रहा है

996    शार्ङ्गधन्वा       जिन्होंने शारंग नामक धनुष धारण किया है

997    गदाधरः           जिन्होंने कौमोदकी नामक गदा धारण किया हुआ है

998    रथांगपाणिः     जिनके हाथ में रथांग अर्थात चक्र है

999    अक्षोभ्यः          जिन्हे क्षोभित नहीं किया जा सकता

1000  सर्वप्रहरणायुधः जो सभी आयुधों के धारण कर्ता हैं

 

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री नन्दकी

श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु १०८

श्री वासुदेवोऽभिरक्षतु नम इति

 

हे भगवान् नारायण हमारी रक्षा कीजिये ,वही विष्णु भगवान् जिन्होंने वनमाला पहनी है ,जिन्होंने गदा, शंख, खडग और चक्र धारण किया हुआ है वही विष्णु हैं और वही वासुदेव हैं।

 

 फल श्रुति

 

उत्तरन्यासः

 

भीष्म उवाच –

भीष्म बोले

 

इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।

नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १ ॥

 

इस प्रकार महात्मा केशव के कीर्तनीय एक हजार दिव्य नामों का इस स्तोत्र में गुणगान किया गया है।

 

य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।

नाशुभं प्राप्नुयात्किंचित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ २ ॥

 

जो भगवान विष्णु के हज़ार नामो को नित्य सुनता है या जो गुणगान करता है वह इस लोक में या परलोक में श्रेष्ठ फलों को भोगता है । उसे जीवन में और मृत्यु के बाद भी कभी अशुभता नहीं देखनी पड़ती

 

वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।

वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ ३ ॥

 

सहस्रनाम का श्रवण करने से ब्राह्मण वेदांत का जानने वाला  , क्षत्रिय विजयी , वैश्य धन से संपन्न और शूद्र सुख पाता है।

 

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।

कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम् ॥ ४ ॥

 

सहस्रनाम का पाठ करने से धर्मार्थी धर्म प्राप्त करता है , अर्थार्थी अर्थ प्राप्त करता है , कामना वालों की कामना पूर्ती होती है , पुत्रार्थी पुत्र प्राप्त करता है तथा राजा इक्षुक प्रजा को प्राप्त करता है .

 

भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।

सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ ५ ॥

 

जो भक्तिमान पुरुष सदा उठकर पवित्र और तद्गत चित्त से भगवान वासुदेव के इस सहस्रनाम का कीर्तन करता है ।

 

यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।

अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ६ ॥

 

( जो विष्णु सहस्रनाम का नित्य पाठ करता है ) वो महान यश , जाति में प्रधानता , अचल लक्ष्मी , और मोक्ष प्राप्त करता है .

 

न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।

भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ ७ ॥

 

( जो विष्णु सहस्रनाम रोज पढता या सुनता है ) उसे कहीं भय नहीं होता, वह पराक्रम और तेज़ प्राप्त करता है तथा निरोग ( रोगरहित ), कांतिमान ( शोभायुक्त ) , बल , रूप और गुणों से संपन्न होता है ।

 

रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।

भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ ८ ॥

 

( विष्णु सहस्रनामम रोज सुनने या पाठ करने से ) रोगी रोग से , बंधा हुआ बंधन से , भयभीत भय से और आपत्तिग्रस्त आपत्ति से छूट जाता है।

 

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।

स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ ९ ॥

 

जो प्राणी भक्तिभाव से भगवान पुरुषोत्तम की सहस्रनामों से सदैव स्तुति करता है वह दुःखों से मुक्त हो जाता है ।

 

वासुदेवाश्रये मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।

सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १० ॥

 

जो मनुष्य भगवान वासुदेव का शरणागत होकर उनमें आसक्ति रखता है वह पापमुक्त हो कर सनातन ब्रह्म को प्राप्त करता है ।

 

न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।

जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ ११ ॥

 

वासुदेव के भक्तों का कहीं भी अशुभ नहीं होता तथा उन्हें जन्म , मृत्यु, ज़रा और रोगों का भी भय नहीं रहता ।

 

इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।

युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १२ ॥

 

जो श्रद्धा भक्ति से इस स्तोत्र का पाठ करता है वह आत्मसुख , शान्ति , लक्ष्मी , बुद्धि, स्मृति , कीर्ति वाला होता है ।

 

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।

भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३ ॥

 

पुरुषोत्तम भगवान के पुण्यात्मा भक्तों को क्रोध , मात्सर्य ( दूसरों के गुण में दोष दृष्टि रखना), लोभ और अशुभ बुद्धि नहीं होती।

 

द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।

वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १४ ॥

 

भगवान वासुदेव के बल पराक्रम से ही द्यु लोक ( स्वर्ग ), चन्द्रमा , सूर्य , नक्षत्र समूह , आकाश , दिशा , पृथ्वी , समुद्र स्थिर हैं ।

 

सुसुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।

जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १५ ॥

 

देवता, राक्षस, गन्धर्व, किन्नर आदि चराचर जगत भगवान कृष्ण के वशीभूत हैं ।

 

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।

वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १६ ॥

 

पांच ज्ञानेन्द्रियाँ , पांच कर्मेन्द्रियाँ , मन , बुद्धि , सत्व , तेज़ , बल , धृति , क्षेत्र , क्षेत्रज्ञ आदि सभी भगवन वासुदेव के ही रूप हैं ।

 

सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते ।

आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १७ ॥

 

सब शास्त्रों में आचार ( शौच , स्नान , संध्या , वंदन आदि को ) सर्वोपरि कहा गया है क्यों कि आचार से धर्म और धर्म से भगवान अच्युत   फल प्रदान करते हैं।

 

ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।

जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १८ ॥

 

ऋषि , पितर , देवता , महाभूत , धातु  , जंगम  , स्थावर जगत की उत्पत्ति भगवान् नारायण से ही है ।

 

योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च ।

वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्व जनार्दनात् ॥ १९ ॥

 

योग, ज्ञान , सांख्य , विद्या , शिल्पादि तथा कर्म  , वेद , शास्त्र विज्ञान की उत्पत्ति भगवान् जनार्दन से ही हुई है।

 

एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।

त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २० ॥

 

भगवान् विष्णु ही जीवों की आत्मा , सृष्टि के भोगकर्ता व शाश्वत हैं। वह महत तत्त्व से उत्पन्न और अनेक जीवों , तीनों लोकों को रच कर उसका उपभोग करते हैं।

 

इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।

पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ २१ ॥

 

भगवान् विष्णु के इस स्तोत्र की रचना महर्षि वेद व्यास ने की है। जो मनुष्य इसको श्रेय और सुख की प्राप्ति के लिए पढता है या पढ़ने की  इच्छा मात्र करता है ।

 

विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् ।

भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ २२ ॥

न ते यान्ति पराभवम् ॐ नम इति ।

 

जो जीव विश्वेश्वर, अजन्मा और संसार की उत्पत्ति तथा उसके लय के स्थान देव देव पुण्डरीकाक्ष को भजते हैं उनका कभी पराभव नहीं  होता अर्थात कभी दुःखों को प्राप्त नहीं होता ।

 

अर्जुन उवाच –

 

पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम ।

भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ २३ ॥

 

अर्जुन ने कहा – हे कमल के पत्तों जैसे विशाल नयन या आंखों वाले, हे नाभि में कमल वाले, सभी देवताओं में श्रेष्ठ, जन की रक्षा करने वाले , प्यार करने वाले भक्तों के रक्षक बनिये ।

 

श्रीभगवानुवाच –

 

यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव ।

सोहऽमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ २४ ॥

 

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-हे पाण्डव (हे अर्जुन), जो मेरे सहस्रनाम से स्तोत्र या स्तुति करने की इच्छा रखता है, वह विष्णु , मैं एक श्लोक से ही स्तुत हो जाता हूँ । इस बात पर कोई शंका नहीं ।

 

व्यास उवाच –

 

वासनाद्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् ।

सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ २५ ॥

श्री वासुदेव नमोऽस्तुत ॐ नम इति ।

 

तीनों लोकों का अस्तित्त्व अर्थात इनमें सर्वभूतों का (सजीव एवं निर्जीव ) वास, हे वसुदेवनन्दन वासुदेव ! आपके इन जीवों में वास के कारण है । आपको नमन है !

 

पार्वत्युवाच –

 

केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् ।

पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ २६ ॥

 

पार्वती ने पुछा : स्वामी मैं आपसे वह साधन जानना चाहती हूँ जिसके द्वारा ग्यानी जान आसानी से प्रति दिन भगवान् विष्णु के हजार नाम का पाठ कर सके।

 

ईश्वर उवाच –

 

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।

सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥२७ ॥

श्रीरामनाम वरानन ॐ नम इति ।

 

ईश्वर बोले ( शिव जी बोले )- हे पार्वती , यह *राम* नाम सभी आपदाओं को हरने वाला, सभी सम्पदाओं को देने वाला दाता है, सारे संसार को विश्राम/शान्ति प्रदान करने वाला है। इसीलिए मैं इसे बार बार प्रणाम करता हूँ। एक बार राम नाम का जाप, सम्पूर्ण विष्णु सहस्त्रनाम या विष्णु के 1000 नामों के जाप के समतुल्य है ( बराबर है )।

 

Vishnu Sahasranama Hindi Lyrics

 

ब्रह्मोवाच –

 

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये

सहस्रपादक्षिशिरोरुबाहवे ।

सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते

सहस्रकोटि युगधारिणे नमः ॥ २८ ॥

सहस्रकोटि युगधारिणे ॐ नम इति ।

 

ब्रह्मा जी बोले , ”  सहस्रों रूप , सहस्रों सर , सहस्रों पैर, सहस्रों हाथ , सहस्रों नेत्र ,सहस्रों भुजाओं वाले अनंत प्रभु को मेरा नमस्कार है। उन सनातन शाश्वत पुरुष को नमस्कार है जिनके सहस्र नाम हैं और जिन्होंने इस सृष्टि को सहस्र कोटि युगों से धारण किया हुआ है।

 

सञ्जय उवाच –

 

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ २९ ॥

 

संजय बोले – जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है – ऐसा मेरा मत है।

 

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श्रीभगवानुवाच –

 

अनन्यश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ३० ॥

 

जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मुझ में निरन्तर लगे हुए उन भक्तों का योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा) मैं वहन करता हूँ।

 

आर्ताः विषण्णाः शिथिलाश्च भीताः

घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।

संकीर्त्य नारायणशब्दमात्रं

विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्तु ॥ ३२ ॥

 

जो लोगआपदाओं से घिरे हुए हैं , जो हताश , निराश, परेशान और दुखी  हैं , जो भयभीत हैं , जो भयंकर रोगों से ग्रस्त हैं , वे लोग भगवान् विष्णु के नारायण नाम उच्चारण या जाप करने से अपने कष्टों से मुक्त हो जाते हैं और प्रसन्न हो जाते हैं।

 

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा

बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात् ।

करोमि यद्यत् सकलं परस्मै

नारायणायेति समर्पयामि ॥ ३३ ॥

 

हे नारायण ! मेरे शरीर, मन, वचन, इन्द्रिय, बुद्धि और आत्मा से सोच समझकर या अज्ञानतावश (अपनी प्रकृति अनुरूप) जो भी हो रहा है, वो मैं सर्वस्व आपके श्री चरणोंमें समर्पित करता हूं !

 

 

॥ इति श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

॥ ॐ तत् सत् ॥

 

 

 

Vishnu Sahasranama Hindi Lyrics

 

 

 

 

 

 

 

 

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